नयी दिल्ली, 04 फरवरी (कड़वा सत्य) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी कर केंद्र और राज्य सरकारों को बिना क्षतिपूर्ति उपाय किए हुए वन क्षेत्रों को कम करने से रोका।
न्यायमूर्ति बी आर गवाई और के विनोद चंद्रन की पीठ 2023 के वन संरक्षण कानून में संशोधनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई कर रही थी।
पीठ ने जोर देकर कहा, “हम ऐसी किसी भी चीज की अनुमति नहीं देंगे जिससे वन क्षेत्र में कमी आए। अगले आदेश तक, केंद्र या किसी भी राज्य द्वारा ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाएगा जिससे ऐसी कमी हो, जब तक कि क्षतिपूर्ति भूमि प्रदान नहीं की जाती।”
केंद्र का प्रतिनिधित्व करने वाली अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को आश्वासन दिया कि चार मार्च को अगली सुनवाई से पहले स्थिति रिपोर्ट के साथ तीन सप्ताह के अंदर आवेदनों का जवाब दाखिल किया जाएगा।
दिया गया है कि संशोधनों में भूमि को या तो जंगल के रूप में अधिसूचित करने या सरकारी दस्तावेजों में दर्ज करने की आवश्यकता करके “वन” की कानूनी परिभाषा को सीमित कर दिया गया है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह लगभग 1.99 लाख वर्ग किलोमीटर वन भूमि को संरक्षण सुरक्षा उपायों से बाहर करता है।
पिछले अंतरिम आदेश में, अदालत ने आदेश दिया था कि संरक्षित क्षेत्रों के बाहर वन भूमि पर चिड़ियाघर या सफारी स्थापित करने के किसी भी प्रस्ताव को उच्चतम न्यायालय की मंजूरी की आवश्यकता होगी।
अदालत ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे केंद्र सरकार को वन भूमि विवरण प्रदान करें, जिसे पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय प्रकाशित करेगा।
पीठ ने टी एन गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत संघ मामले में 1996 के ऐतिहासिक फैसले में “वन” परिभाषा के पालन पर बल दिया।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि 2023 के संशोधनों ने इस व्यापक परिभाषा को कमजोर कर दिया, जिससे वन संरक्षण कमजोर हो गया।
केंद्र ने 27 मार्च, 2023 को वन (संरक्षण) संशोधन विधेयक पेश किया और तब से इसे रद्द करने की मांग को लेकर संवैधानिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
कड़वा सत्य