नयी दिल्ली, 24 सितंबर (कड़वा सत्य) भारतीय निर्यातकों के शीर्ष संगठन फियो ने सरकार से उस योजना को पांच साल तक बढ़ाने की मांग की है जिसके तहत निर्यातकों को कर्ज पर बजट से ब्याज सहायता दी जाती है ताकि प्रतिस्पर्धी वैश्विक बाजार में भारत का माल प्रतिस्पर्धा में मजबूती से टिका रह सके।
सरकार ने देश में कर्ज महंगा होने के मद्देनजर भारतीय लघु एवं मझोले विनिर्माता निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा क्षमता बनाए रखने के लिए वित्त वर्ष 2015-16 से निर्यात कर्ज पर पांच साल के लिए “ब्याज समतुल्यीकरण योजना” लागू की थी जिसे बाद में बढ़ाया जाता रहा, लेकिन इस योजना की अवधि समाप्त हो गयी है। सरकार ने पिछले महीने इस योजना को 30 सितंबर तक के लिए बढ़ा दिया था।
विदेश व्यापार महानिदेशालय ने इस योजना पर प्रति आयात निर्यात कोड (आईसईसी) पर इस योजना के तहत ब्याज सहायता की अधिकतम सीमा पांच करोड़ रुपये निर्धारित कर दी है। इस योजना में पहले विनिर्माता निर्यातकों को निर्यात माल के लदान पूर्व और लदान पश्चात की अवधि में कार्यशील पूंजी की जरूरत के कर्ज पर दो से तीन प्रतिशत की दर से ब्याज सहायता प्रदान करती थी।
फियो के अध्यक्ष अश्विनीकुमार ने मंगलवार को यहां कहा, “हम सरकार से निर्यात क्षेत्र के कारोबारी माहौल में निरंतरता और स्थिरता प्रदान करने के लिए सतत आधार पर ब्याज समतुल्यीकरण योजना को फिर से शुरू करने का आग्रह करें।”
फियो के महानिदेशक डॉ. अजय सहाय ने कहा, “हमने ब्याज समतुल्यीकरण योजना को पांच साल तक बढ़ाने का सरकार से आग्रह किया है। यदि यह योजना नहीं बढ़ी तो हम कुछ बाजारों को खो देंगे और कुछ आर्डर चले जाएंगे।”
डॉ. सहाय ने कहा कि छोटे और मझोले निर्यातकों के लिए कर्ज की उपलब्धता और उसकी लागत एक बहुत बड़ी चुनौती बना हुआ है। उन्हेंने कहा, ‘कोविड के बाद विदेशी बाजारों में भी कर्ज महंगा हुआ है पर हमें भारत में रिजर्व बैंक की रेपो दर और अमेरिका नीति गत दर के बीच इस समय दिख रहे कम अंतर के आधार पर यह नहीं सोचना चाहिए कि निर्यातकों को अब ब्याज सहायता की जरूरत नहीं रह गयी है। भारत और दूसरे प्रतिस्पर्धी बाजारों में व्यावसायिक कर्ज की दरों में अब भी बड़ा फर्क है।”
उन्होंने कहा कि सरकार ने निर्यातकों को गिरवी के बिना कर्ज दिलाने के लिए भारतीय क्रेडिट ग्रारंटी कार्पोरेशन के माध्यम से गारंटी दिलाने की योजना चला रही है पर बैंक छोटे मझोले निर्यातकों से 50 प्रतिशत तक कैश गारंटी की मांग करते हैं।
डॉ. सहाय यह भी कहा कि पिछले दो साल से बैंकों की ओर से प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को दिए जाने वाले कर्ज में निर्यात क्षेत्र को मिला कर्ज 40 प्रतिशत घट कर पिछले वित्त वर्ष के दौरान लगभग 11,800 करोड़ रुपये ही रहा। उन्होंने कहा कि जरूरत इस बात की भी है कि प्राथमिकता क्षेत्र के लिए कर्ज में निर्यात क्षेत्र के कर्ज का अलग से तय हो और उसे पूरा किया जाए।
उन्होंने कहा कि भारत ने कहा कि पिछले एक दशक में भारत के निर्यात में साल दर साल औसतन 8.5 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है। वर्ष 2030 तक देश से 2000 अरब डालर के निर्यात का लक्ष्य है जिसमें एक हजार अरब डालर वस्तु और एक हजार अरब डालर सेवा निर्यात होगा।
पिछले वर्ष भारत का कुल निर्यात 750 अरब डालर के स्तर का था।
उन्होंने कहा कि इसके लिए निर्यात में सालाना 12 प्रतिशत से अधिक की दर से वृद्धि की जरूरत होगी। उन्होंने कहा, “वैश्विक चुनौतियों के बावजूद यह लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। सरकार ने इस दिशा में उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना जैसे कई महत्वपूर्ण नीतिगत कद उठाए हैं। वैश्विक उत्पादन श्रृंखला नया आकार ले रही है तथा दुनिया अब चीन के अलावा एक अन्य बाजार को स्रोत के रूप में देखना चाहती है। चीन में पर्यावरण संबंधी नियमों के चलते कारखाने तटीय क्षेत्रों से विस्थापित हो रहे हैं , एक शिशु नीति से उपभोक्ता मांग कम हो रही है और श्रम की लागत बढ़ रही है। इसका लाभ भातर को हो सकता है।”
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कड़वा सत्य