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संगीतकार नहीं अभिनेता बनना चाहते थे जयदेव

News Desk by News Desk
January 6, 2024
in मनोरंजन
संगीतकार नहीं अभिनेता बनना चाहते थे जयदेव
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पुण्यतिथि 06 जनवरी 

मुंबई, 06 जनवरी (कड़वा सत्य) अपने संगीतबद्ध गीतों के जरिये श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाले संगीतकार जयदेव अभिनेता बनना चाहते थे।

03 अगस्त 1919 को लुधियाना में जन्में जयदेव का रूझान बचपन के दिनो से ही फिल्मों की ओर था।जयदेव अभिनेता के रूप मे अपनी पहचान बनाना चाहते थे।अपने सपने को पूरा करने के लिये वह 15 वर्ष की उम्र मे ही घर से भागकर फिल्म नगरी मुंबई आये जहां उन्हें बतौर बाल कलाकार वाडिया फिल्मस निर्मित आठ फिल्मों में अभिनय करने का मौका मिला। इस बीच जयदेव ने कृष्णाराव और जर्नादन राव से संगीत की शिक्षा भी ली।कुछ वर्षो के बाद जयदेव अपने पिता की बीमारी के कारण मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को छोड़ वापस अपने घर लुधियाना आ गये।

पिता की अकस्मात मृत्यु के बाद परिवार और बहन की देखभाल की सारी जिम्मेदारी जयदेव के उपर आ गयी।अपनी बहन की शादी के बाद वर्ष 1943 में वह लखनऊ चले गये और वहां उन्होंनें उस्ताद अली अकबर खान से संगीत की शिक्षा हासिल की।बचपन से ही मजबूत इरादे वाले जयदेव अपने सपनों को साकार करने के लिये एक नये जोश के साथ फिर मुंबई पहुंचे।वर्ष 1951 में जयदेव को नवकेतन के बैनर तले निर्मित बनी फिल्म आंधिया में सहायक संगीतीकार काम करने का मौका मिला ।इसके बाद जयदेव ने महान संगीतकार एस.डी.बर्मन के सहायक के रूप में भी काम किया।

इस बीच जयदेव ने अपना संघर्ष जारी रखा ।शायद नियति को यह मंजूर था कि जयदेव संगीतकार ही बने इसलिये फिल्मककार चेतन आंनद ने उन्हें अपनी ही फिल्म जोरू का भाई में संगीतकार के रूप मे काम करने का मौका दिया। इस फिल्म के जरिये पहचान बनाने मे वह भले ही सफल नही हो पाये लेकिन एक संगीतकार के रूप मे उन्होनें अपने सिने करियर का सफर शुरू कर दिया। इसके बाद चेतन आंनद की ही निर्मित फिल्म अंजली की कामयाबी के बाद जयदेव बतौर संगीतकार फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गये। वर्ष 1961 में प्रदर्शित नवकेतन के बैनर तले निर्मित फिल्म हमदोनों की कामयाबी के बाद जयेदव बतौर संगीतकार सफलता के शिखर पर जा पहुंचे। यूं तो फिल्म हमदोनो में उनके संगीत से सजे सारे गाने हिट साबित हुये लेकिन फिल्म का यह गीत अल्लाह तेरो नाम श्रोताओं के बीच आज भी लोकप्रिय है।

वर्ष 1963 में सुनील दत्त के बैनर अजंता आर्टस निर्मित फिल्म मुझे जीने दो जयदेव के सिने करियर की एक और अहम फिल्म साबित हुआ। इस फिल्म में जयदेव ने फिल्म हम दोनो के बाद एक बार फिर से गीतकार साहिर लुधियानवी के साथ मिलकर काम किया और रात भी है कुछ भींगी भींगी ,तेरे बचपन को जवानी जीने की दुआये देती हूँ जैसे सुपरहिट गीत की रचना कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया ।श्रोताओं को हमेशा कुछ नया देने के उद्देश्य से वह अपनी फिल्मों के संगीतबद्ध गीतों में प्रयोग किया करते थे और ऐसा ही प्रयोग उन्होंने वर्ष 1963 में प्रदर्शित फिल्म किनारे किनारे में भी किया। फिल्म किनारे किनारे के माध्यम से उन्होंने अभिनेता देवानंद पर फिल्माये गानों के पार्श्वगायन के लिये तलत महमूद,मोहम्मद रफी, मन्ना डे और मुकेश की आवाज का इस्तेमाल किया ।सत्तर के दशक में जयदेव की फिल्में व्यावसायिक तौर पर सफल नही रही ।इसके बाद निर्माता .निर्देशकों ने जयदेव की ओर से अपना मुख मोड़ लिया, लेकिन वर्ष 1977 मे प्रदर्शित फिल्म घरौंदा और वर्ष 1979 मे प्रदर्शित फिल्म गमन में उनके संगीतबद्ध गीत की कामयाबी के बाद जयदेव एक बार फिर से अपनी खोयी हुई लोकप्रियता पाने में सफल हो गये ।

जयदेव को मिले सम्मानों पर यदि नजर डालें तो उन्हें उनके संगीतबद्ध गीतों के लिये तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।फिल्मी गीतों के अलावा जयदेव ने गैर फिल्मी गीतो को भी संगीतबद्ध किया।इनमें प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला के गीत भी शामिल हैं। अपने संगीतबद्ध गीतों से श्रोताओं के दिलों में खास पहचान बनाने वाले संगीतकार जयदेव 06 जनवरी 1987 को इस दुनिया को अलविदा कह गये ।

प्रेम

Tags: JaidevmesmerizedMumbaithe audiencethe composerthe songs composedwanted to become an actorअभिनेता बनना चाहते थेजयदेवमंत्रमुग्धमुंबईश्रोताओंसंगीतकारसंगीतबद्ध गीतों
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