नयी दिल्ली, 06 फरवरी (कड़वा सत्य) उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए स्नातक पाठ्यक्रमों के लिए कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (सीएलएटी) 2025 के नतीजों से संबंधित सभी लंबित याचिकाओं को दिल्ली उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने का गुरुवार को आदेश दिया।
मुख्य न्यायाधीश खन्ना और न्यायमूर्ति पी वी कुमार और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने एकरूपता सुनिश्चित करने और सभी उच्च न्यायालयों में परस्पर विरोधी फैसलों से बचने के लिए यह निर्देश पारित किया।
पीठ ने निर्देश देते हुए कहा, “तीन मार्च को दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष (संबंधित याचिकाओं को) सूचीबद्ध करें। इस आदेश के सात दिनों के भीतर प्रत्येक उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार को (संबंधित लंबित याचिकाओं के) कागजात दिल्ली उच्च न्यायालय को भेजने चाहिए।”
यह निर्णय राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों के (एनएलयू) कंसोर्टियम द्वारा सीएलएटी से संबंधित विवादों के लिए एकीकृत सुनवाई की मांग करने वाली याचिका के बाद लिया गया, जो वर्तमान में दिल्ली, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा के उच्च न्यायालयों में लंबित हैं।
न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की अगुवाई वाली दिल्ली उच्च न्यायालय की एकल न्यायाधीश पीठ ने 17 वर्षीय आदित्य की ओर से दायर याचिका को 20 दिसंबर को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया था।
सीएलएटी अभ्यर्थी याचिकाकर्ता ने राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए परीक्षा के प्रश्नपत्र में त्रुटियों का आरोप लगाया है।
न्यायमूर्ति सिंह ने चिह्नित पाँच प्रश्नों में से दो में स्पष्ट त्रुटियाँ पाईं। इस आधार पर परिणामों को संशोधित करने का निर्देश दिया।
इस निर्णय को राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों के कंसोर्टियम और आदित्य दोनों ने खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी।
कंसोर्टियम ने तर्क दिया कि एकल न्यायाधीश ने विशेषज्ञों द्वारा तय किए गए उत्तरों में हस्तक्षेप करके सीमा लांघी है, जबकि आदित्य ने तीन अतिरिक्त प्रश्नों में सुधार की मांग की। उनका तर्क था कि उनमें स्पष्ट त्रुटियाँ हैं।
यह मुद्दा तब और बढ़ गया जब कंसोर्टियम ने विरोधाभासी निर्णयों को रोकने के लिए याचिकाओं को एक उच्च न्यायालय के अंतर्गत समेकित करने की आवश्यकता का हवाला देते हुए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
गौरतलब है कि यह विवाद इस पाठ्यक्रम के स्नाकोत्तर (सीएलएटी-पीजी) परीक्षा तक भी फैला हुआ है, जहां गलत उत्तर कुंजी को लेकर विवाद वर्तमान में मध्य प्रदेश और बॉम्बे उच्च न्यायालयों में चल रहा है।
अशोक
कड़वा सत्य