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Home संपादकीय

आधुनिक दीपावली का आर्थिक अपराधशास्त्र

News Desk by News Desk
October 19, 2025
in संपादकीय
आधुनिक दीपावली का आर्थिक अपराधशास्त्र
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हरेन्द्र प्रताप

आधुनिक दीपावली का रूप बदल गया है। दीपावली बहुत सारे आम लोगों के लिए आज भी एक महत्वपूर्ण त्योहार है जिसका बेसब्री से साल भर इंतजार किया जाता है। विशेष कर बच्चों का उत्साह देखते बनता है ! खास लोगों के लिए दीपावली का खास महत्व है ! वे हर साल दीपावली को त्योहार के साथ – साथ व्यापार बना देते हैं। इसे वे नैतिक तरीके से रिश्वत देने – लेने का जरिया बना लेते हैं। इस बहाने खुलेआम उपहार की आड़ में रिश्वत के महोत्सव का आयोजन किया जाता है ! संयोगवश भारत में दीपावली के आगे – पीछे ही केंद्र सरकार के केंद्रीय सतर्कता आयोग के द्वारा सतर्कता सप्ताह मनाया जाता है। उदाहरण के तौर पर इस वर्ष 2025 में अनेक सरकारी विभागों एवं मंत्रालयों में 27 अक्टूबर से 2 नवंबर तक सतर्कता सप्ताह आयोजित किया जा रहा है। अनेक भ्रष्ट अधिकारियों द्वारा खानापूर्ति करने का यह बेमिसाल आयोजन है। विरले ईमानदार अधिकारी इसे बड़ी शिद्दत से व्यावहारिक तौर पर आयोजित कर एक स्पष्ट संदेश देते हैं। लेकिन दीपावली में उपहारों की विभीषिका में प्रायः इसका आयोजन हास्यास्पद बन कर रह जाता है ! अनेक ” सप्ताह ” या ” पखवाड़ा ” की तरह यह आयोजन भी महज औपचारिक रह जाता है !

बिजनेस वर्ग और भ्रष्ट अधिकारियों के विशाल वर्ग के गंठजोड़ ने दीपावली का कायाकल्प कर दिया है। इसे आर्थिक अपराध का प्रमुख त्योहार बना दिया गया है ! सारे सरकारी कंडक्ट रूल्स इस त्योहार के सामने फेल हो जाते हैं !

दीपावली से ठीक पहले और बाद में कुछेक छापे अवश्य पड़ते हैं। यह भी सालाना रस्म अदायगी है। करोड़ों की नकदी, ज्वेलरी और अन्य कीमती सामान की बरामदगी की इक्का-दुक्का घटनाओं से मीडिया के द्वारा सनसनी पैदा की जाती है, फिर सब कुछ शांति से बेरोकटोक चलता रहता है।

दीपावली वास्तव में खास लोगों के लिए उपहारावली बन चुकी है ! अकेले एक दीपावली में उपहार का कारोबार अरबों नहीं, खरबों रुपए का है। इतनी धनराशि आती कहां से है और इतनी धनराशि जाती कहां है ? यह देखने – परखने वाला कोई नहीं है। वास्तव में इस धनराशि का बड़ा हिस्सा सरकार का है यानि जनता की गाढ़ी कमाई का हिस्सा है। सरकारी धन हड़पने के चक्कर में बिजनेस वर्ग उसी का एक छोटा सा टुकड़ा हड्डी के एक टुकड़े की तरह अधिकारियों के सामने खूबसूरत पैक में फेंक देता है और वे उसे लपकने के लिए दौड़ पड़ते हैं। मतलब रिश्वत भी कोई अपनी जेब से नहीं, जनता की जेब यानि सरकारी जेब से चुराये धन से देता है और अपने बिल में या काम में एडजस्ट कर लेता है !

उपहार का देना – पावना सुनियोजित तरीके से कार्यान्वित किया जाता है। सरकारी अधिकारी और कर्मचारी इस दौरान अपनी सारी छुट्टी एवं टूर रद्द कर सुबह से देर शाम तक अपनी सीट पर आसीन रहते हैं। क्या पता कब कौन सा उपहार द्वार पर दस्तक दे जाए ! अन्य अधिकारियों या कर्मचारियों में उपहार बांटना न पड़ जाए, इसलिए अनेक वरिष्ठ अधिकारी उपहार के स्वागत के लिए घर में ही विशेष व्यवस्था कर लेते हैं ! पड़ोसी नज़र रखते हैं कि उधर ज्यादा मिला या इधर ! पड़ोसी ही कई बार भांडा भी फोड़ दिया करते हैं ! उधर उपहार देने वाले तीन महीने पहले से तैयारी आरंभ कर देते हैं। पिछले साल की सूची को वे संशोधित करते हैं। इस साल किस व्यक्ति से कितना और अधिक लाभ मिल सकता है और पिछले साल किसने कितना काम दिया या दिलाया, यह उपहार की कीमत तय करने का मुख्य आधार बनता है। दृश्य और अदृश्य उपहार की गुणवत्ता इसी से तय की जाती है। बेहद महत्वपूर्ण व्यक्ति को अदृश्य उपहार दिये जाते हैं जबकि अन्य लोगों को दृश्य उपहार से संतुष्ट कर दिया जाता है। अधिकारी – कर्मचारी आपस में भी एक – दूसरे को उपहार देते हैं। दीपावली से बेहतर बहाना उपहार के लिए और क्या हो सकता है ! अच्छे विभाग, अच्छी सीट और अच्छी विदेश यात्रा के एवज में ” एहसान ” चुकाने का जब सुअवसर आया है तो फिर कौन इसे चूकना पसंद करेगा ! स्थाई और अस्थाई कर्मचारियों के बीच भी उपहारों का आदान-प्रदान दिलचस्प है। अस्थाई कर्मचारी यदि एक्स्ट्रा सेवा घर पर देते हैं तो फिर तो उपहार की दृष्टि से यह और भी महत्वपूर्ण है।

वैसे, दीपावली के आर्थिक अपराधशास्त्र में एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि बहुत बड़ी संख्या में ठेके पर काम करने वाले कर्मचारियों को दीपावली के दिन भी काम करना पड़ता है।
उन्हें घर से लेकर दफ्तर तक सबकी विशेष सफाई करनी पड़ती है ! दीपावली के बाद जमा हुई गंदगी प्रकाश पर्व के अंधेरे की कहानी को बयां करती है।

दिलचस्प तथ्य यह है कि सरकारी क्षेत्र और गैर-सरकारी क्षेत्र दोनों मिलकर उपहारों में भी घोटाला करते हैं। लेने वाले अनेक बार सबका हिस्सा खुद गटक जाते हैं और बांटने वाले बचा-खुंचा या बचाया हुआ माल आपस में बांट लेते हैं ! देने वाले को भनक भी नहीं लगती है।

अपवाद स्वरूप इस घोर कलयुग में भी कुछेक अधिकारी कोई भी उपहार स्वीकार नहीं करते हैं। ऐसी स्थिति में उनके नाम से निकला उपहार उन्हीं के नाम पर बांटने वाले के घर पहुंच जाता है ! उपहार की दुनिया में वापसी के सारे द्वार स्थाई रूप से बंद कर दिये जाते हैं। आप लीजिए या नहीं लीजिए, रिकार्ड पर आपका नाम चढ़ जाता है !

चमत्कारी दीपक और अनेक परिवारों के कुलदीपक दीपावली के अनेक पहलुओं को रोशन करते हैं। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम को आर्थिक रूप से जहां मिट्टी का दीपक भी सुदृढ़ करता है, वहीं विदेशी मोह और प्रलोभन आत्मनिर्भरता के नारों एवं इरादों पर कुठाराघात करता है। पर्यावरण से जुड़े अर्थशास्त्र का भी दीपावली में पौ बारह हो जाता है। छठ पर्व पर यमुना नदी की लोकतांत्रिक चिंता और दीपावली पर पर्यावरण की शास्त्रीय चिंता भारतीय अर्थव्यवस्था तथा अर्थशास्त्र को अत्यधिक चिंतित कर देती है !

Tags: Bribery in GovernmentDeepawali AnalysisDiwali CorruptionEconomic Crime in IndiaFestival EconomyGift Culture IndiaHarendra Pratap EditorialMSME EthicsVigilance Week
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