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सामरिक संतुलन की नई परिभाषा: मोदी–पुतिन शिखर वार्ता का वैश्विक महत्व

News Desk by News Desk
November 29, 2025
in देश
सामरिक संतुलन की नई परिभाषा: मोदी–पुतिन शिखर वार्ता का वैश्विक महत्व
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रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत आगमन केवल एक औपचारिक वार्षिक शिखर सम्मेलन नहीं है, बल्कि यह उस भू-राजनीतिक क्षण का प्रतीक है जब नई दिल्ली और मॉस्को अपने रिश्तों को पुनर्परिभाषित करने की स्थिति में खड़े हैं। 4 और 5 दिसंबर को होने वाली 23वीं वार्षिक शिखर बैठक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच केवल द्विपक्षीय समीकरणों की समीक्षा नहीं करेगी, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन की दिशा में एक निर्णायक संकेत भी होगी।

भारत और रूस के बीच ‘विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त सामरिक साझेदारी’ का स्वरूप पिछले कुछ वर्षों में कई उतार–चढ़ाव से गुज़रा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने इस साझेदारी को नए आयाम दिए हैं। वाशिंगटन का पाकिस्तान के साथ बढ़ता समीपत्व और भारत के प्रति कभी गर्म तो कभी ठंडा रुख ने नई दिल्ली को यह सोचने पर मजबूर किया है कि उसे अपनी विदेश नीति में संतुलन की नई रेखाएँ खींचनी होंगी। यही कारण है कि रूस और चीन के साथ रिश्तों को पुनः प्राथमिकता देने की रणनीति अब स्पष्ट रूप से सामने आ रही है।

सितंबर 2025 में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान मोदी और पुतिन की मुलाकात ने इस दिशा में एक नया अध्याय खोला था। दोनों नेताओं ने 45 मिनट तक कार में बैठकर बातचीत की और मोदी ने इसे ‘गहन और सार्थक संवाद’ बताया। यह दृश्य केवल व्यक्तिगत समीपता का प्रतीक नहीं था, बल्कि यह संकेत था कि भारत और रूस अपने रिश्तों को सहजता और आत्मीयता के साथ आगे बढ़ाना चाहते हैं।

इस आगामी यात्रा में रक्षा सहयोग सबसे प्रमुख मुद्दा होगा। ब्रह्मोस मिसाइलों की क्षमता विस्तार, सुखोई-30MKI लड़ाकू विमानों का उन्नयन, एस-400 वायु रक्षा प्रणाली की लंबित आपूर्ति और भारत में संभावित रूप से सुखोई-57E स्टेल्थ जेट का निर्माण—ये सभी विषय भारत–रूस रक्षा साझेदारी की गहराई को दर्शाते हैं। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने स्पष्ट किया है कि भारत मॉस्को से लंबित डिलीवरी पर ठोस जवाब चाहता है। एस-400 प्रणाली पहले ही पाकिस्तान के विमानों को 300 किलोमीटर अंदर तक गिराने में सक्षम साबित हुई है, जिसे भारतीय सेना ने ‘गेम–चेंजर’ कहा है। ऐसे में समय पर आपूर्ति और तकनीकी सहयोग भारत की सामरिक क्षमता को और मज़बूत करेगा।

रूस भी इस यात्रा को अत्यंत महत्वपूर्ण मान रहा है। क्रेमलिन के वरिष्ठ सलाहकार यूरी उशाकोव ने इसे ‘भव्य और फलदायी’ बताया है। यह वार्षिक बैठक केवल परंपरा नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच उस समझौते का हिस्सा है जिसमें हर वर्ष व्यापक चर्चा का संकल्प लिया गया था। इस बार की बैठक इसलिए भी अहम है क्योंकि वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका की नीतियाँ लगातार अस्थिरता पैदा कर रही हैं। ट्रंप के बयान, जिनमें उन्होंने भारत–पाकिस्तान संघर्ष में मध्यस्थता का दावा किया, नई दिल्ली के लिए अपमानजनक रहे हैं। ऐसे में रूस के साथ रिश्तों को मज़बूत करना भारत के लिए सामरिक गरिमा और स्वतंत्रता का प्रश्न बन गया है।

भारत–रूस संबंध केवल रक्षा तक सीमित नहीं हैं। परमाणु ऊर्जा, वाणिज्यिक विमानन, आर्थिक सहयोग और तकनीकी साझेदारी भी इस यात्रा के एजेंडे में शामिल हैं। कई द्विपक्षीय समझौते होने की संभावना है जो दोनों देशों के दीर्घकालिक रिश्तों को नई ऊर्जा देंगे। भारत के लिए यह अवसर है कि वह रूस के साथ अपने आर्थिक और तकनीकी सहयोग को उस स्तर तक ले जाए जहाँ वह अमेरिकी दबाव से स्वतंत्र होकर अपनी नीतियाँ तय कर सके।

इस यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—रणनीतिक संकेत। जब अमेरिका पाकिस्तान के साथ अपने रिश्तों को मज़बूत कर रहा है और चीन एशिया में अपनी पकड़ बढ़ा रहा है, तब भारत और रूस का समीप आना वैश्विक शक्ति संतुलन में नई रेखाएँ खींचेगा। यह केवल द्विपक्षीय सहयोग नहीं बल्कि एक व्यापक संदेश है कि एशिया की राजनीति अब केवल वाशिंगटन की इच्छाओं पर निर्भर नहीं रहेगी।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा पुतिन के सम्मान में आयोजित भोज इस यात्रा को औपचारिक गरिमा देगा, लेकिन असली महत्व उन वार्ताओं का होगा जो मोदी और पुतिन के बीच होंगी। यह वार्ता भारत–रूस संबंधों को न केवल मज़बूत करेगी बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति को भी सुदृढ़ करेगी।

इस यात्रा को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह केवल दो नेताओं की मुलाकात नहीं है। यह उस ऐतिहासिक रिश्ते की पुनर्पुष्टि है जिसने दशकों तक भारत को सामरिक स्वतंत्रता दी है। जब अमेरिका प्रतिबंधों की धमकी देता है और चीन अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है, तब भारत–रूस साझेदारी एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभरती है।

पुतिन की यह यात्रा भारत के लिए अवसर है कि वह अपनी विदेश नीति को नए सिरे से परिभाषित करे। यह अवसर है कि भारत अपनी सामरिक स्वतंत्रता को मज़बूत करे और वैश्विक शक्ति संतुलन में अपनी भूमिका को स्पष्ट करे। मोदी–पुतिन शिखर वार्ता केवल द्विपक्षीय सहयोग का मंच नहीं है, बल्कि यह उस भू-राजनीतिक क्षण का प्रतीक है जब भारत और रूस मिलकर दुनिया को यह संदेश दे रहे हैं कि एशिया की राजनीति अब नए संतुलन की ओर बढ़ रही है।

इस यात्रा का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह भारत को अपनी सामरिक और आर्थिक नीतियों में आत्मनिर्भरता की ओर ले जाएगी। रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी और आर्थिक समझौते भारत को उस स्थिति में पहुँचाएँगे जहाँ वह वैश्विक दबावों से स्वतंत्र होकर अपनी राह तय कर सके। यही इस यात्रा का सबसे बड़ा संदेश है—सामरिक संतुलन की नई परिभाषा।

Tags: Global Geopolitics India RussiaIndia Russia Strategic PartnershipModi Putin Meeting IndiaModi Putin Summit 2025Russia India Defence CooperationS-400 Delivery IndiaSCO 2025 India RussiaSu-30MKI UpgradeSu-57E India Talks
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