मालवा की धरती भारतीय सभ्यता की गौरवगाथाओं से भरी है। यहाँ कौटिल्य ने विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध सामर्थ्य को संगठित किया, और कालिदास ने ‘मालविकाग्निमित्रम्’ जैसी रचनाओं से इस भूमि की सांस्कृतिक गरिमा को अमर कर दिया। आज यही मालवा इंदौर के रूप में देश की सबसे स्वच्छ नगरी कहलाती है। लेकिन विडंबना यह है कि इसी नगरी में दूषित जल से दस से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई और हजारों अस्पतालों में भर्ती हैं। क्या यह केवल एक दुर्घटना है, या फिर यह प्रशासनिक लापरवाही का नग्न सच है?
भारत सरकार ने ‘हर घर जल’ और ‘स्वच्छ जल योजना’ को अमृतकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया। आँकड़े चमकते हैं—2019 में जहाँ केवल 16 प्रतिशत ग्रामीण घरों में नल से जल पहुँचता था, वहीं अब यह आँकड़ा 80 प्रतिशत से अधिक हो गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल नल का होना ही पर्याप्त है? यदि उस नल से बहने वाला जल दूषित है, तो क्या यह उपलब्धि नागरिकों के जीवन की रक्षा करती है या केवल राजनीतिक भाषणों को सजाती है?
इंदौर की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाइपलाइनें यदि रिसाव से ग्रस्त हों, यदि सीवेज और पेयजल की लाइनें एक-दूसरे से मिल जाएँ, तो आँकड़े और डैशबोर्ड केवल दिखावे बन जाते हैं। तब यह पूछना ज़रूरी हो जाता है—क्या सरकारें आँकड़ों की राजनीति कर रही हैं, या नागरिकों के जीवन की सुरक्षा की राजनीति?
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने त्वरित कार्रवाई और जाँच का आश्वासन दिया। लेकिन क्या आश्वासन ही पर्याप्त है, जब लोग मर रहे हैं? भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय ने इसे “छोटी सी घटना” कहकर टालने का प्रयास किया। क्या दस से अधिक मौतें और हजारों बीमार नागरिक केवल ‘छोटी सी घटना’ हैं? क्या यह बयान पीड़ित परिवारों के लिए अपमानजनक नहीं है? और क्या यह जनता के आक्रोश को और नहीं बढ़ाता?
यह वही भाजपा है जो लंबे समय से मध्यप्रदेश की सत्ता में है और जिसने विकास के नारों को saffron प्रयोगशाला बना दिया है। लेकिन जब सबसे बुनियादी अधिकार—स्वच्छ जल—ही सुरक्षित नहीं है, तो विकास के दावे खोखले क्यों न प्रतीत हों? क्या यह अमृतकाल का सपना है, या फिर केवल चुनावी नारा?
संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार की गारंटी देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार स्पष्ट किया है कि जीवन का अधिकार केवल अस्तित्व तक सीमित नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन और स्वच्छ पर्यावरण को भी शामिल करता है। यदि नागरिकों को दूषित जल मिलता है, तो क्या यह सीधे-सीधे जीवन के अधिकार का उल्लंघन नहीं है? क्या सरकारें इस उल्लंघन की जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं?
मालवा की पहचान केवल इतिहास और साहित्य तक सीमित नहीं है। इंदौर ने लगातार आठ वर्षों तक देश की सबसे स्वच्छ नगरी का दर्जा पाया। लेकिन यही शहर आज दूषित जल से जूझ रहा है। क्या यह विरोधाभास नहीं बताता कि सतही स्वच्छता और वास्तविक स्वास्थ्य सुरक्षा में गहरी खाई है? क्या यह खाई अमृतकाल के सपनों को निगल नहीं रही?
भारत सरकार ने अमृतकाल को 2047 तक के विकास का सपना बताया है। लेकिन यदि आज के भारत में नागरिकों को स्वच्छ जल तक नहीं मिल रहा, तो अमृतकाल का सपना अधूरा क्यों न कहा जाए? जलापूर्ति योजनाएँ केवल पाइपलाइन और आँकड़ों तक सीमित क्यों रहनी चाहिए? गुणवत्ता नियंत्रण और निगरानी तंत्र को मज़बूत क्यों नहीं किया जाता? स्थानीय प्रशासन को जवाबदेह क्यों नहीं बनाया जाता? और नागरिक समाज को जागरूक क्यों नहीं किया जाता कि जल केवल उपलब्ध हो, बल्कि शुद्ध भी हो?
इंदौर की दूषित जल त्रासदी ने मालवा की सांस्कृतिक गरिमा और अमृतकाल के सपनों पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि विकास केवल आँकड़ों और नारों से नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन की वास्तविक सुरक्षा से मापा जाता है। मालवा की प्यास केवल जल की उपलब्धता की नहीं, बल्कि उसकी शुद्धता की है। यदि अमृतकाल का सपना साकार करना है, तो सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि हर नागरिक को सुरक्षित, स्वच्छ और जीवनदायी जल मिले। तभी मालवा की धरती अपने गौरवशाली इतिहास के अनुरूप वर्तमान और भविष्य को भी उज्ज्वल बना सकेगी।








