हरेन्द्र प्रताप
आजकल संस्कृत और संस्कृति चर्चा में हैं और देवनागरी लापता हो रही है। विश्व हिन्दी दिवस का आज उत्साह अवश्य है लेकिन देवनागरी लिपि को बचाने और बढ़ाने का प्रयास कहीं नहीं है। विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर भारत में महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक पिछले कई दिनों से कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। विदेश में म्यांमार से लेकर मारिशस तक में हिन्दी का गुणगान आज विशेष रूप से किया जा रहा है। आज ही के दिन दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला भी आरंभ हो चुका है।
मेला में विदेशी भागीदारी भी हो रही है और इस बार कतर तथा स्पेन आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं। इसमें भी हिन्दी दिखाई दे रही है। हां, सब कुछ अधिक औपचारिक और वास्तविक सच्चाई को झूठलाता प्रतीत हो रहा है। मुख्य अतिथि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान भारतीय नेताओं की ख्याति के अनुरूप आज दो घंटे विलम्ब से पहुंचे। जाहिर है कि ठंड, प्रदूषण और सियासी कोहरे का असर इस मौसम में दिल्ली में कुछ ज्यादा ही रहता है।
इसलिए माननीय मंत्री जी भी मेले में कुछ परेशान दिखे। उद्घाटन के अवसर पर दिखाई गई राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की लघु सरकारी फिल्म में लेखक शशि थरूर अधिक चमकते दिखाई दिए। धर्मेन्द्र प्रधान जी ने अपना लिखित भाषण एक सांस में पढ़ दिया। स्पेन और कतर के माननीय अतिथियों ने संक्षिप्त भाषण दिया। पुस्तकों के माध्यम से भारतीय सेना के तीनों अंगों की साहसिक प्रस्तुति इस मेले में सबसे आकर्षक नवाचार है।

दिल्ली के प्रगति मैदान में आज का दिन वैसे तो विश्व पुस्तक मेला के नाम था लेकिन आकर्षण का केंद्र बने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ! उन्हें सुनने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी थी और वे हिन्दी में अपेक्षाकृत अधिक सारगर्भित एवं सामयिक भाषण दे रहे थे। वे प्रगति मैदान में स्वामी विवेकानंद की स्मृति में आयोजित एक अलग कार्यक्रम को गर्मजोशी से संबोधित कर रहे थे। धर्मेन्द्र प्रधान के विलंब से आने का पूरा लाभ अजीत डोभाल के कार्यक्रम को मिला !
सवाल है कि विश्व हिन्दी दिवस पर संस्कृत और संस्कृति की स्मृति अचानक क्यों हुई ?
दरअसल अभी कुछ दिन पहले कुछेक मुस्लिम भाई यह चिंता प्रकट कर रहे थे कि भारत में संस्कृत को राष्ट्र भाषा या राजभाषा बनाने की अफवाह गर्म है। यह आश्चर्यजनक अफवाह है ! सच तो यह है कि भारत में संपूर्ण देवनागरी लिपि ही खतरे में है। सरकार, नागरिक और सोशल मीडिया तीनों मिलकर हिन्दी और विशेषकर देवनागरी लिपि को लगातार खतरा पहुंचा रहे हैं।
गौर से देखने पर विश्व पुस्तक मेला भी इसी सच को उद्घाटित करता प्रतीत हो रहा है। हंस प्रकाशन के स्टॉल पर पहले ही दिन जब ग़ज़लकार मृत्युंजय गोविन्द की नई-नवेली पुस्तक ” पत्थरों का शहर ” दिखाई पड़ी और उनके कुछेक प्रशंसकों ने व्हाट्सएप पर उन्हें बधाई भेजने का प्रयास किया तो व्हाट्सएप ने अंग्रेजी के कांग्रेचुलेशन की तर्ज़ पर हिन्दी के शब्द बधाई के लिए कोई डिजिटल उपहार या इमोजी स्वत: प्रस्तुत नहीं किया ! विदेशी सोशल मीडिया का यह दोहरा व्यवहार हिन्दी के प्रयोग को हतोत्साहित करता है। व्हाट्सएप ने यह भी ध्यान नहीं रखा कि आज विश्व हिन्दी दिवस है !

विश्व हिन्दी दिवस पर हिन्दी वालों, हिन्दुस्तानियों और विदेश में रह रहे तमाम हिन्दी प्रेमियों को विशेष रूप से सबसे पहले आज यह चिंतन करना चाहिए कि हम हिन्दी को बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं या इसकी लिपि को इसकी विदाई के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं और हिंग्लिश के विकसित होने का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं ! विश्व हिन्दी दिवस और विश्व पुस्तक मेला का आयोजन यदि इसी तरह होता रहा और हम अपने देश में भारतीय भाषाओं की आपसी खींचतान तथा कवि गोष्ठियों में ही उलझे रहे तो सन् 2047 में संस्कृत नहीं, हिंग्लिश भारत की जनभाषा के रूप में राज करती नजर आएगी और आने वाले कल में हिन्दी की स्थिति बीते कल की संस्कृत जैसी हो जाएगी जो सिर्फ पूजा – पाठ और काव्य – कथा की भाषा बनकर यदा – कदा प्रयोग में सुनाई देगी। और, इसका नुकसान सिर्फ अकेले हिन्दी की देवनागरी लिपि को नहीं होगा बल्कि उन सभी भारतीय भाषाओं को होगा जो देवनागरी लिपि में प्रयोग में लाई जाती हैं।
यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि हिन्दी से अधिक खतरा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की एक अन्य प्रमुख भारतीय भाषा उर्दू को है। इसलिए सभी हिन्दुस्तानियों को भारतीय भाषाओं और भारतीय संस्कृति को सहेजने और उसे नया विस्तार देने का प्रयास मिल कर करना चाहिए और अफवाहों से सचेत रहना चाहिए।
संस्कृति भी इन दिनों खतरे में है और सिर्फ नुमाइशी बनती जा रही है। विश्व पुस्तक मेला भी इसकी गवाही दे रहा है। पुस्तक संस्कृति विलुप्त हो रही है और विभिन्न अपसंस्कृतियों के कारनामों के बीच मुफ्तखोरी की संस्कृति बेहिसाब बढ़ती जा रही है। फ़्री बस में बैठ कर फ्री टिकट वाले मेले में पहुंच कर भी यदि हम पुस्तक सहित अन्य चीजों को फ्री में लेने के लिए उमड़ पड़ें तो यह देश, संस्कृति और हिन्दी के लिए कहीं से भी लाभकारी नहीं है। मेले में पहले ही दिन फ्री में कई दिलचस्प नजारे देखने को मिले। उद्घाटन मंच से मेहमानों के जाते ही उनके बचे – खुचे मेवों को लेने के लिए अनेक लोग मंच पर चढ़ गये। जब दिल्ली का यह हाल है तो बाकी जगह क्या हो रहा होगा !
संस्कृति के मामले में इसी मेले में हमें मेहमान भागीदार कतर और स्पेन तथा अन्य देशों से सीखना चाहिए। वे अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति हमसे अधिक संवेदनशील और सतर्क हैं। क्यों ? इसका उत्तर आप इस मेले में और विश्व हिन्दी दिवस के अब तक के आयोजनों में ढूंढ सकते हैं।









