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Home संपादकीय

स्मार्ट सिटी का नया मॉडल: मौत और दूषित पानी

News Desk by News Desk
January 17, 2026
in संपादकीय
स्मार्ट सिटी का नया मॉडल: मौत और दूषित पानी
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अमित पांडे: संपादक

इंदौर, जिसे सरकार ने बार-बार देश का सबसे स्वच्छ और स्मार्ट शहर बताया है, आज एक ऐसे घाव से कराह रहा है जो पूरे शहरी विकास मॉडल की पोल खोल देता है। भगीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने से हुई मौतों ने यह साबित कर दिया कि चमकदार इमारतें और प्रचारित स्वच्छता सर्वेक्षण केवल दिखावा हैं। जब बुनियादी अधिकार—स्वच्छ पेयजल—ही नागरिकों को नहीं मिल रहा, तो यह स्मार्ट सिटी नहीं, बल्कि मौत का शहर है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर इस त्रासदी को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया। उनका कहना था कि सरकार ने केवल तात्कालिक ‘बैंड-एड’ लगाया है, जो कुछ दिनों तक काम करेगा, लेकिन जैसे ही ध्यान हटेगा, हालात फिर पुराने हो जाएंगे। यह टिप्पणी केवल इंदौर तक सीमित नहीं थी; उन्होंने इसे पूरे देश के शहरी मॉडल की विफलता बताया।

स्थानीय लोगों का दावा है कि 24 मौतें हुई हैं, जबकि सरकार ने हाई कोर्ट में दिए गए अपने स्टेटस रिपोर्ट में केवल सात मौतों को स्वीकार किया है। महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज की ‘डेथ ऑडिट’ रिपोर्ट ने 15 मौतों को इस प्रकोप से किसी न किसी रूप में जुड़ा पाया। प्रशासन ने मानवीय आधार पर 21 मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये की सहायता राशि दी है। यह विरोधाभासी आंकड़े ही इस त्रासदी की गंभीरता और शासन की संवेदनहीनता को उजागर करते हैं।

यह कोई पहली घटना नहीं है। मध्य प्रदेश में पहले भी कई बार दूषित पानी से बीमारियां फैली हैं। 2009 में भोपाल में हैजा और डायरिया के मामलों ने सैकड़ों लोगों को प्रभावित किया था। 2014 में उज्जैन में दूषित पानी से दर्जनों मौतें हुई थीं। इन घटनाओं के बावजूद जल आपूर्ति व्यवस्था में सुधार के ठोस कदम नहीं उठाए गए। यही कारण है कि आज भी नालियों और पाइपलाइनों के मिलन से दूषित पानी घरों तक पहुंच रहा है।

स्मार्ट सिटी मिशन, जिसे 2015 में बड़े वादों के साथ शुरू किया गया था, का दावा था कि 100 शहरों को आधुनिक बनाया जाएगा। इंदौर को सबसे आगे दिखाया गया। लेकिन इस चमकदार छवि के पीछे पानी की गुणवत्ता और वितरण व्यवस्था की वास्तविकता छिपी रही। राष्ट्रीय स्तर पर भी आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल लगभग 1.5 लाख लोग जलजनित बीमारियों से मरते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टों में बार-बार कहा गया है कि सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता ही स्वास्थ्य सुरक्षा की पहली शर्त है।

राहुल गांधी ने इस मुद्दे को राजनीतिक जवाबदेही से जोड़ा। उनका कहना था कि सरकार केवल प्रचार में व्यस्त है, जबकि वास्तविक जिम्मेदारी निभाने से बच रही है। उन्होंने कहा कि जब लोग मर रहे हैं और परिवार टूट रहे हैं, तब भाजपा नेता जिम्मेदारी से बचने में लगे हैं। यह रवैया असंवेदनशील है और अस्वीकार्य है। उन्होंने पीड़ितों को न्याय दिलाने और दोषियों को सजा दिलाने की बात कही।

यहां सवाल केवल इंदौर का नहीं है। देश के कई शहरों में जल संकट और दूषित पानी की समस्या गंभीर है। दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में भी पानी की गुणवत्ता पर सवाल उठते रहे हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्टों में बार-बार कहा गया है कि शहरी नदियों और जलस्रोतों में प्रदूषण का स्तर खतरनाक है। ऐसे में स्मार्ट सिटी का दावा तब तक खोखला रहेगा जब तक सबसे बुनियादी जरूरत—स्वच्छ पानी—सुनिश्चित नहीं की जाती।

इंदौर की घटना ने यह भी दिखाया कि प्रशासनिक आंकड़े और जमीनी हकीकत में कितना अंतर है। जहां स्थानीय लोग 24 मौतों का दावा कर रहे हैं, वहीं सरकार केवल सात मौतों को मान रही है। यह अंतर केवल संख्याओं का नहीं, बल्कि संवेदनशीलता का है। जब सरकार मृतकों की संख्या कम करके दिखाती है, तो यह पीड़ित परिवारों के दर्द को नकारने जैसा है।

इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सबक यही है कि शहरी विकास केवल चमकदार इमारतों और डिजिटल ऐप्स से नहीं होता। विकास का असली पैमाना यह है कि आम नागरिक को सुरक्षित पानी, स्वच्छ हवा और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं मिलें। यदि यह नहीं हो रहा, तो स्मार्ट सिटी का दावा केवल एक राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगा।

इंदौर की त्रासदी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत के शहरी मॉडल में सबसे बड़ी कमी बुनियादी सेवाओं की उपेक्षा है। जब तक सरकारें प्रचार से आगे बढ़कर जिम्मेदारी नहीं निभातीं, तब तक ऐसी घटनाएं बार-बार होंगी। यह केवल इंदौर की नहीं, बल्कि पूरे देश की चेतावनी है कि स्मार्ट सिटी का नया मॉडल बिना पीने के पानी के नहीं चल सकता।

Tags: Dirty Water DeathsIndore Water CrisisRahul Gandhi IndoreSmart City ModelUrban Development IndiaWater Contamination News
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