सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए पहुंचने वाला मरीज डॉक्टर के साथ-साथ उन मेडिकल उपकरणों पर भी भरोसा करता है जिनसे उसका इलाज होता है। लेकिन पिछले एक साल में देश के अलग-अलग राज्यों से सामने आए मामलों ने इस भरोसे को झकझोर दिया है। सरकारी दस्तावेज बताते हैं कि सार्वजनिक खरीद के जरिए अस्पतालों तक पहुंचे कुछ क्रिटिकल केयर उपकरणों में गुणवत्ता की खामियां तब सामने आईं, जब वे अस्पतालों में उपयोग के लिए भेजे जा चुके थे।
5 जनवरी 2026 को राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन (आर एम एस सी) ने एक औपचारिक नोटिस जारी कर फ्रांस की बहुराष्ट्रीय कंपनी वायगन एस.ए.एस की पूर्ण स्वामित्व वाली भारतीय इकाई, वायगन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा आपूर्ति किए गए सीई-मार्क्ड पीआईसीसी कैथेटरों के कई बैच वापस करने और बदलने के निर्देश दिए। यह कार्यवाही विषय विशेषज्ञों द्वारा की गई जांच के बाद की गई, जिसमें पाया गया कि ये उपकरण राज्य निविदाओं में निर्धारित फ्लो रेट मानकों पर खरे नहीं उतरते। गुणवत्ता नियंत्रण के कार्यकारी निदेशक द्वारा हस्ताक्षरित और आरएमएससी के प्रबंध निदेशक द्वारा अनुमोदित इस नोटिस में संबंधित बैचों को चिकित्सा संस्थानों में उपयोग या वितरण के लिए अनुपयुक्त घोषित किया है और सभी बैचों के पूरे स्टॉक को गोदामों से हटाने और उनकी जगह तुरंत मानक अनुरूप सामग्री उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।
राज्य प्राधिकरण की यह कार्रवाई इस बात पर सवाल उठाती है कि उपकरणों के अस्पतालों की आपूर्ति श्रृंखला में प्रवेश करने के बाद उनकी निगरानी किस प्रकार की जाती है। राजस्थान के मामले में राज्य प्राधिकरण ने खामियों की पहचान होने के बाद कदम उठाया, लेकिन किसी राष्ट्रीय स्तर की चेतावनी या व्यापक समीक्षा का कोई संकेत सामने नहीं आया।
पीआईसीसी लाइनों का उपयोग आमतौर पर कैंसर उपचार, लंबे समय तक एंटीबायोटिक थेरेपी और क्रिटिकल केयर में किया जाता है, जहां सुरक्षित दवा आपूर्ति के लिए फ्लो रेट की सटीकता अत्यंत आवश्यक होती है। फ्लो रेट में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी इन्फ्यूजन की सुरक्षा और उपचार के परिणामों को प्रभावित कर सकती है। इन मामलों से यह चिंता भी पैदा होती है कि कहीं इसी तरह की समस्याएं अन्य स्थानों पर बिना पकड़े रह गई हों।
राजस्थान से पहले पश्चिम बंगाल में एक अत्यंत गंभीर मामला सामने आया था। दिसंबर 2024 में पश्चिम बंगाल सरकार ने पुष्टि की थी कि कोलकाता मेडिकल कॉलेज सहित कई प्रमुख सरकारी अस्पतालों में निम्न गुणवत्ता के ऑक्सिमीट्री सीवीसी कैथेटर आपूर्ति किए गए थे। स्वास्थ्य सेवा निदेशालय और सेंट्रल मेडिकल स्टोर्स द्वारा जारी आधिकारिक आदेशों में निर्माता द्वारा बिना अनुमति के निम्न गुणवत्ता वाले डिवाइस बदलने और गुणवत्ता नियंत्रण में लापरवाही दर्ज की गई थी।
इस जांच के परिणामस्वरूप संबंधित वितरक को प्रतिबंधित किया गया और फ्रांसीसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को सीएमएस निविदाओं में भाग लेने से दो वर्षों के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया। पश्चिम बंगाल सरकार के आदेश में यह भी कहा गया कि इस घटना ने “स्वास्थ्य प्रणाली की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया है।”
गंभीर निष्कर्षों के बावजूद, अन्य राज्यों में समान आपूर्तियों की समीक्षा के लिए कोई सार्वजनिक निर्देश सामने नहीं आया। स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि भले ही मेडिकल उपकरणों की आपूर्ति श्रृंखला राष्ट्रीय स्तर पर काम करती हो, लेकिन नियामक कार्यवाही अब भी बिखरी हुई और मुख्य रूप से राज्य-स्तर पर सीमित हैं।
यह तथ्य कि दोनों मामलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमाणित (सीई-मार्क्ड) उपकरण शामिल थे जो चिंता की एक और परत जोड़ता है। ये उपकरण न तो अनधिकृत थे और न ही बिना मंजूरी के, बल्कि मौजूदा नियामक प्रणालियों के तहत उपयोग के लिए स्वीकृत थे। ऐसे में, यदि इस तरह की मंजूरी के बावजूद अलग-अलग राज्यों में कम समय के अंतराल में गुणवत्ता संबंधी खामियां सामने आती हैं, तो यह किसी एक खरीद प्रक्रिया की समस्या नहीं, बल्कि एक व्यापक चेतावनी का संकेत देता है।
ये मामले सवाल खड़े करता है कि मंजूरी मिलने के बाद उपकरणों की सुरक्षा की निगरानी कैसे की जाती है। जहां मानक और मंजूरियां केंद्रीय स्तर पर तय की जाती हैं, वहीं अस्पतालों की आपूर्ति श्रृंखला में प्रवेश करने के बाद निगरानी कमजोर पड़ती हुई नजर आती है। राजस्थान और पश्चिम बंगाल, दोनों मामलों में राज्य प्राधिकरणों ने तब हस्तक्षेप किया जब खामियां सामने आ चुकी थीं, और राज्यों से बाहर किसी व्यापक समीक्षा का कोई सार्वजनिक संकेत नहीं मिला।
खासतौर पर सरकारी अस्पतालों पर निर्भर मरीजों के लिए ऐसी निगरानी संबंधी खामियां लगभग अदृश्य रहती हैं। उन्हें यह जानने का बहुत कम अवसर मिलता है कि उपकरणों की खरीद और निगरानी कैसे की जाती है, और इलाज शुरू होने के बाद उनकी सुरक्षा पर सवाल उठाने की गुंजाइश भी सीमित होती है। जब गुणवत्ता संबंधी चिंताएं केवल बाद में जारी किए गए प्रशासनिक आदेशों के जरिए सामने आती हैं, तो इससे स्वास्थ्य प्रणाली में भरोसा कमजोर होने का खतरा पैदा होता है।
दोनों मामलों में राज्य सरकारों ने खामी सामने आने के बाद कार्रवाई की। लेकिन यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि ऐसे जोखिमों की पहचान पहले कौन करेगा, उपकरणों के मरीजों तक पहुंचने से पहले। साथ ही यह भी सवाल बना हुआ है कि देश के एक हिस्से में सामने आई चेतावनियां क्या अन्य हिस्सों तक साझा की जा रही हैं और उन पर कार्रवाई हो रही है या नहीं। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब राज्य खरीद एजेंसियों ने अपने-अपने सरकारी अस्पतालों के मरीजों की सुरक्षा की, तो निजी अस्पतालों में भर्ती देश के लगभग 75 प्रतिशत मरीजों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है। उन्हें चेतावनी कौन देगा। निजी अस्पतालों को सतर्क कौन करेगा। इस पर केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) को जवाब देना होगा।







