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समान अवसर केंद्र और निगरानी तंत्र: समावेशन या नौकरशाही का विस्तार

News Desk by News Desk
January 28, 2026
in अभी-अभी
समान अवसर केंद्र और निगरानी तंत्र: समावेशन या नौकरशाही का विस्तार
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अमित पांडे: संपादक

भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों में समता और समावेशन को सुनिश्चित करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 2026 में जो नए विनियम जारी किए हैं, वे एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ की तरह सामने आए हैं। इन विनियमों का मूल उद्देश्य यह है कि किसी भी छात्र, शिक्षक या कर्मचारी के साथ धर्म, जाति, नस्ल, लिंग, जन्मस्थान या दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव न हो और हर व्यक्ति को समान अवसर मिले। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए आयोग ने हर संस्थान में समान अवसर केंद्र स्थापित करने की अनिवार्यता रखी है। इस केंद्र के अंतर्गत समता समिति, समता समूह और समता दूत जैसी संरचनाएँ होंगी जो परिसर में भेदभाव की घटनाओं पर नजर रखेंगी और समावेशन को बढ़ावा देंगी।

यह विचार अपने आप में आकर्षक है क्योंकि यह वंचित समूहों को शैक्षणिक और सामाजिक सहयोग दिलाने का माध्यम बन सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्था वास्तव में जीवंत और प्रभावी होगी या केवल नौकरशाही का विस्तार बनकर रह जाएगी। छोटे महाविद्यालयों के पास संसाधनों की कमी होती है, वहाँ ऐसे केंद्र स्थापित करना कठिन होगा। यदि यह केवल कागजी अनुपालन बनकर रह गया तो इसका उद्देश्य ही निष्फल हो जाएगा।

समता समिति में ओबीसी, एससी, एसटी, महिलाएँ और दिव्यांगजन का प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया गया है। यह प्रावधान सामाजिक न्याय की दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे निर्णय-प्रक्रिया में हाशिए पर रहे समूहों की आवाज़ शामिल होगी। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह प्रतिनिधित्व कहीं केवल औपचारिकता न बन जाए। यदि समिति के सदस्य केवल प्रतीकात्मक रूप से शामिल किए जाएँ और उनके पास वास्तविक शक्ति न हो तो यह व्यवस्था टोकनिज़्म का शिकार हो जाएगी।

इसी तरह समता समूह और समता दूत की अवधारणा भी बहस का विषय है। संस्थान को निगरानी के लिए समता समूह बनाने होंगे और हर इकाई में एक समता दूत नियुक्त करना होगा। यह व्यवस्था भेदभाव रोकने के लिए जमीनी निगरानी का काम कर सकती है। लेकिन क्या इससे शैक्षणिक स्वतंत्रता प्रभावित होगी? क्या यह निगरानी संस्कृति पैदा करेगी जिससे शिक्षक और छात्र असहज महसूस करेंगे? और क्या छात्र दूतों को शिकायत दर्ज करने पर प्रतिशोध से बचाया जा सकेगा? ये प्रश्न गंभीर हैं।

विनियमों में यह भी कहा गया है कि समान अवसर केंद्र को एनजीओ, मीडिया, पुलिस और विधिक सेवा प्राधिकरण से जुड़ना होगा। इससे पीड़ितों को कानूनी और सामाजिक सहयोग मिलेगा। लेकिन क्या इससे संस्थानों की स्वायत्तता प्रभावित होगी? क्या मीडिया की भागीदारी से समाधान होगा या विवादों का राजनीतिकरण होगा? यह भी एक बड़ा प्रश्न है।

शिकायत दर्ज करने वाले व्यक्ति को प्रतिशोध से बचाना अनिवार्य किया गया है। यह प्रावधान पीड़ितों को साहस देगा। लेकिन संस्थागत पदानुक्रम में यह कितना लागू हो पाएगा, यह देखना होगा। अक्सर शिकायतकर्ता को ही दोषी ठहराने की प्रवृत्ति होती है। यदि इस प्रावधान को सख्ती से लागू किया जाए तो यह कैंपस संस्कृति में बड़ा बदलाव ला सकता है।

हर संस्थान को छह महीने में रिपोर्ट प्रकाशित करनी होगी जिसमें छात्रों और कर्मचारियों की जनसांख्यिकीय संरचना होगी। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और समाज को संस्थान की स्थिति पता चलेगी। लेकिन क्या छात्रों और कर्मचारियों की जानकारी सार्वजनिक करना उचित है? क्या इससे डेटा का दुरुपयोग नहीं होगा? क्या यह संस्थानों की रैंकिंग और प्रतिस्पर्धा को अस्वस्थ दिशा में नहीं ले जाएगा?

इन सभी प्रावधानों का उद्देश्य सराहनीय है। लेकिन वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या ये संरचनाएँ जीवंत और सशक्त होंगी या केवल नौकरशाही औपचारिकता बनकर रह जाएंगी। यदि इन्हें संसाधन, स्वतंत्रता और जवाबदेही दी जाए तो यह भारतीय उच्च शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती हैं। अन्यथा, यह केवल कागज़ी ढाँचा बनकर रह जाएंगी।

Tags: Academic Governance IndiaCampus Discrimination PolicyEqual Opportunity CentreHigher Education IndiaInclusion in EducationUGC Equity RulesUGC Regulations 2026
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