अमित पांडे: संपादक
यूजीसी के समता संवर्धन विनियम, 2026 ने भारतीय उच्च शिक्षा में दो बड़े द्वंद्वों को उजागर किया है—योग्यता बनाम प्रतिनिधित्व और पारदर्शिता बनाम स्वायत्तता। ये द्वंद्व केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि दार्शनिक और सामाजिक भी हैं।
समता समिति में ओबीसी, एससी, एसटी, महिलाएँ और दिव्यांगजन का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि निर्णय-प्रक्रिया में हाशिए पर रहे समूहों की आवाज़ शामिल हो। यह सामाजिक न्याय का मूल है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि समिति में चयन शैक्षणिक उत्कृष्टता और अनुभव के आधार पर होना चाहिए। यदि पहचान को प्राथमिकता दी जाए तो क्या दक्षता प्रभावित होगी? क्या हम समान अवसर और समान परिणाम के बीच अंतर समझ पा रहे हैं? यह बहस भारतीय शिक्षा व्यवस्था की आत्मा को छूती है।
दूसरा द्वंद्व पारदर्शिता बनाम स्वायत्तता का है। विनियम कहते हैं कि हर संस्थान को छह महीने में रिपोर्ट प्रकाशित करनी होगी जिसमें छात्रों और कर्मचारियों की जनसांख्यिकीय संरचना होगी। इससे समाज को पता चलेगा कि संस्थान वास्तव में समावेशी हैं या नहीं। यह जवाबदेही का आधार है। लेकिन क्या संस्थानों को अपनी नीतियाँ और डेटा सार्वजनिक करने के लिए बाध्य करना उनकी स्वतंत्रता का हनन नहीं है? क्या इससे संस्थान राजनीतिक दबाव में नहीं आ जाएँगे? पारदर्शिता और स्वायत्तता के बीच संतुलन कैसे बने, यह सबसे बड़ा प्रश्न है।
दार्शनिक स्तर पर यह बहस और भी गहरी है। क्या शिक्षा केवल ज्ञान और योग्यता का क्षेत्र है या यह सामाजिक न्याय का भी मंच है? क्या संस्थानों की स्वतंत्रता को सीमित करके हम वास्तव में समावेशन ला सकते हैं? क्या प्रतिनिधित्व और पारदर्शिता को सशक्तिकरण का साधन बनाया जा सकता है, न कि केवल औपचारिकता?
संभावित समाधान यही है कि समिति में प्रतिनिधित्व और योग्यता दोनों को संतुलित किया जाए। पहचान के साथ-साथ उत्कृष्टता को भी महत्व दिया जाए। रिपोर्टिंग में गोपनीयता और पारदर्शिता का संतुलन बनाया जाए। डेटा को सार्वजनिक किया जाए परंतु व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा की जाए। संस्थानों को स्वायत्तता दी जाए परंतु जवाबदेही भी सुनिश्चित की जाए।
भारतीय उच्च शिक्षा का भविष्य इस द्वंद्व पर निर्भर करेगा। यदि हम योग्यता और प्रतिनिधित्व को संतुलित कर पाएँ, और पारदर्शिता और स्वायत्तता को साथ-साथ चला पाएँ, तो यह विनियम शिक्षा को केवल ज्ञान का क्षेत्र नहीं बल्कि सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का मंच बना देंगे। अन्यथा, यह द्वंद्व संस्थानों को नौकरशाही और राजनीतिक दबाव में उलझा देगा।









