अमित पांडे: संपादक
भारतीय राजनीति में संसद अक्सर वह मंच रही है जहाँ सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव राष्ट्रीय विमर्श को दिशा देता है। 2 फरवरी को लोकसभा में जो हुआ, वह इसी परंपरा का एक नया अध्याय है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि उन्हें पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित किताब से उद्धरण देने की अनुमति नहीं दी जा रही है क्योंकि उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। यह विवाद केवल एक उद्धरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक संस्थाओं की पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही जैसे बड़े प्रश्नों को सामने लाता है।
राहुल गांधी का कहना था कि नरवणे ने अपनी किताब में 2020 के भारत-चीन संघर्ष के दौरान प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री के साथ हुई बातचीत दर्ज की है। यह वही संघर्ष था जब गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों ने अभूतपूर्व साहस दिखाया और 20 जवान शहीद हुए। उस समय चीन के साथ सीमा पर तनाव चरम पर था और देश में यह बहस चल रही थी कि क्या भारत की भूमि पर अतिक्रमण हुआ है। सरकार लगातार यह कहती रही कि एक इंच जमीन नहीं खोई गई, लेकिन विपक्ष और कई विश्लेषक इस दावे पर सवाल उठाते रहे।
इतिहास पर नज़र डालें तो भारत-चीन सीमा विवाद कोई नया नहीं है। 1962 का युद्ध भारतीय स्मृति में आज भी गहरे अंकित है, जब तैयारी की कमी और राजनीतिक नेतृत्व की गलतियों ने देश को भारी नुकसान पहुँचाया। उसके बाद से हर सरकार ने सीमा सुरक्षा को प्राथमिकता दी है, लेकिन 2020 की घटनाओं ने यह सवाल फिर से जीवित कर दिया कि क्या राजनीतिक नेतृत्व ने सेना को पर्याप्त दिशा और समर्थन दिया। राहुल गांधी का आरोप इसी ऐतिहासिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री ने निर्णय लेने से बचते हुए जिम्मेदारी दूसरों पर डाल दी।
लोकसभा में जब उन्होंने यह मुद्दा उठाना चाहा तो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा सांसदों ने कड़ा विरोध किया। उनका तर्क था कि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है, इसलिए उससे उद्धरण देना नियमों के खिलाफ है। स्पीकर ओम बिरला ने भी राहुल गांधी को रोक दिया और अंततः सदन को बार-बार स्थगित करना पड़ा। विपक्ष का कहना है कि जिस सामग्री का हवाला दिया जा रहा है, वह एक लेख में प्रकाशित हो चुकी है, इसलिए उसे उद्धृत करना नियमों के अंतर्गत आता है।
यह विवाद केवल संसदीय नियमों का नहीं है, बल्कि यह पारदर्शिता और जवाबदेही का प्रश्न भी है। यदि पूर्व सेना प्रमुख ने वास्तव में राजनीतिक नेतृत्व पर सवाल उठाए हैं तो उसे सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनने से रोकना लोकतांत्रिक भावना के विपरीत है। सेना और राजनीतिक नेतृत्व के बीच संबंध हमेशा संवेदनशील रहे हैं। सेना का काम सुरक्षा सुनिश्चित करना है, जबकि राजनीतिक नेतृत्व का काम दिशा और नीति तय करना। यदि इस संतुलन में कहीं कमी रही है तो उसे सामने आना चाहिए ताकि भविष्य में सुधार हो सके।
डेटा पर गौर करें तो भारत में कृषि के बाद सबसे अधिक रोजगार देने वाला क्षेत्र रक्षा है। लगभग 14 लाख सक्रिय सैनिक और 21 लाख से अधिक पूर्व सैनिक देश की सुरक्षा और सामाजिक संरचना का हिस्सा हैं। उनके मनोबल और नेतृत्व पर भरोसा बनाए रखना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। 2020 के संघर्ष के बाद भारत ने रक्षा बजट में उल्लेखनीय वृद्धि की। 2021-22 में रक्षा बजट लगभग 4.78 लाख करोड़ रुपये था, जो 2025-26 तक बढ़कर 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया। यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि सरकार ने सैन्य तैयारी को प्राथमिकता दी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीतिक नेतृत्व ने संकट के समय सही निर्णय लिए।
राहुल गांधी का यह आरोप कि प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने सेना को “लेट डाउन” किया, गंभीर है। यदि यह केवल राजनीतिक बयानबाज़ी है तो इसे तथ्यों से परखा जाना चाहिए। लेकिन यदि पूर्व सेना प्रमुख की किताब में वास्तव में ऐसा दर्ज है तो उसे दबाना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करेगा। लोकतंत्र में सेना की भूमिका गैर-राजनीतिक होती है, लेकिन उसका अनुभव और दृष्टिकोण राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के लिए महत्वपूर्ण है।
इस पूरे विवाद का एक और पहलू है—लोकसभा में विपक्ष की आवाज़ को दबाने का आरोप। संसद का उद्देश्य ही है कि सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी बात रखें और जनता तक सच्चाई पहुँचे। यदि विपक्ष को बोलने से रोका जाता है तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। राहुल गांधी ने कहा कि उन्हें केवल दो-तीन पंक्तियाँ पढ़नी थीं, लेकिन सरकार डर रही है। यह डर यदि वास्तविक है तो यह पारदर्शिता की कमी को दर्शाता है।
अतीत में भी ऐसे उदाहरण रहे हैं जब सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के विचार विवाद का कारण बने। जनरल वी.के. सिंह के समय भी सरकार और सेना के बीच मतभेद सार्वजनिक हुए थे। लेकिन लोकतंत्र की ताकत यही है कि ऐसे मतभेदों को दबाने के बजाय सामने लाया जाए और उनसे सीख ली जाए।
निष्कर्षतः यह विवाद केवल राहुल गांधी और भाजपा के बीच राजनीतिक टकराव नहीं है। यह उस बड़े प्रश्न का हिस्सा है कि भारत में राष्ट्रीय सुरक्षा पर विमर्श कितना खुला और पारदर्शी है। यदि सेना प्रमुख की किताब में राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका पर सवाल हैं तो उन्हें सामने आना चाहिए। इससे न केवल जनता को सच्चाई पता चलेगी बल्कि भविष्य में नीति निर्माण भी बेहतर होगा। लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि कठिन सवाल पूछे जाएँ और जवाबदेही तय हो।








