श्रीनाथ दीक्षित, वरिष्ठ संवाददाता, दिल्ली
एक अच्छे और सुढृढ़ पी.आर.ओ. या जनसम्पर्क अधिकारी की यही पहचान होती है कि वह अपने कार्य के दौरान विभिन्न मीडिया के पत्रकारों के साथ एक अच्छा तालमेल का सामंजस्य बैठाकर चले! ऐसा कहना है भारतीय ट्रेड प्रोमोशन ऑर्गेनाइज़ेशन (आई.टी.पी.ओ.) के सीनियर मैनेजर – कॉर्पोरेट कम्यूनिकेशन, श्री संजय वशिष्ट का!
प्रस्तुत हैं इस फ़ील्ड में उनके कैरियर से जुड़े कुछ ख़ास पलों के बारे में श्रीनाथ दीक्षित से हुई एक ख़ास मुलाक़ात के कुछ मुख्य अंश:
- पी.आर.ओ. जैसे महत्वपूर्ण पद पर आपके शुरुआती दौर के बारे में कुछ बताएँ……
मेरा शुरू से ही शौक़ था कि मैं अपनी भारतीय पारम्परिक और सांस्कृतिक धरोहर के विस्तार के लिए कुछ कार्य करूँ! इसके लिए मैं भारत देश के विभिन्न प्रदेशों की पारम्परिक सांस्कृतिक और लोककथाओं के बारे में पढ़ता रहता था! तो, इन अद्भुत संस्कृतियों के बारे में जानने के लिए जैसे मैं बहुत ही उत्सुक और बेचैन रहता था! फिर थोड़ा कंसन्ट्रेट करने के बाद मुझे पता चला कि मैं अपने इस सपने को किसी सरकारी संस्था में एक पी.आर.ओ. के पद पर नियुक्त होकर ही पूरा कर सकता हूँ।
- तो, इसके लिए आपने कहीं से कोई प्रॉफ़ैशनल डिग्री या कोर्स किया?
जी! हाँ! एक साइंस ग्रेजुएट होने के बावजूद भारतीय संस्कृति के विस्तार की अपनी इस जिज्ञासा को पूरा करने के लिए मैंने पहले तो, मास कम्यूनिकेशन में मास्टर्स की डिग्री ली। और फिर, उसके बाद पब्लिक रिलेशन्स कोर्स में एक डिप्लोमा भी लिया।
- आई.टी.पी.ओ. जैसी संस्था में अपने शुरुआती सफ़र पर थोड़ी रौशनी डालें…...
मेरा शुरू से ही यह सपना था कि मैं आई.टी.पी.ओ. जैसी प्रतिष्ठित संस्था में नौकरी करूँ! साथ ही भारतीय संस्कृति का पूरे विश्व में विस्तार करने की मेरी इस भावना और चाहत को एक ऊँची उड़ान भरने के लिए आई.टी.पी.ओ. जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से पंख मिले। इस संस्थान में जब मेरा सिलेक्शन हुआ; तो, मानो जैसे मुझे अपने सभी सपने पूरे होते साफ़ नज़र आ रहे थे! क्योंकि, अपने इस उद्देश्य को एक आधिकारिक रूप से ही मैं पूरा कर सकता था! यहाँ आकर मेरा दृष्टिकोण और भी ज़्यादा साफ़ हो गया; क्योंकि, अब मैं अपने भारत देश की इस वृहद् संस्कृति का विस्तार अच्छे-से कर सकता था! साथ ही देश में व्यापार को भी आगे बढ़ाने और उसे एक नया आयाम देने के लिए हमारे छोटे-बड़े, सभी कारोबारी भाइयों को एक वृहद् मंच भी उपलब्ध करवा सकता था!
यहाँ आयोजित होने वाले विभिन्न समारोहों के दौरान आने वालीं विभिन्न कठिनाइयों को आप कैसे संभालते हैं?
देखिए! कठिनाइयाँ कोई ऐसी चीज़ नहीं होतीं, जिन्हें आप संभाल ना सकें! यह तो पूर्णतयः आपकी स्किल्स पर निर्भर करता है कि आप किसी भी परेशानी या कठिनाई की स्थिति में किस तरह संयम से काम लेते हैं। और, वैसे भी एक जनसम्पर्क अधिकारी की यह मेन ड्यूटी भी होती है कि वह बड़ी-से-बड़ी कठिनाइयों को अपने लेवल पर सॉल्व कर ले और वरिष्ठ अधिकारियों तक उन समस्याओं को पहुँचने भी ना दे। तो, ऐसे में बड़े ही संयम के साथ मैं अपनी टीम के साथ मिलकर किसी भी समस्या को प्यार और आराम से निपटाने की कोशिश करता हूँ और उसमें सफ़ल भी होता हूँ!
साथ ही यहाँ आने वाले विभिन्न मीडिया के साथियों के भी स्वागत और उनकी विभिन्न प्रकार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए हम तत्पर रहते हैं!
- इस फ़ील्ड में अपना कैरियर बनाने वाले युवाओं के लिए आप कोई संदेश देना चाहेंगे?
जी! बिल्कुल! जनसम्पर्क क्षेत्र एक बहुत अच्छा और सुनहरा भविष्य है! साथ ही यह थोड़ा चैलेंजिंग भी हो जाता है; क्योंकि, इसमें आपको अपने ऑफ़िस के अधिकारीयों और मीडिया के बंधुओं के साथ एक अच्छे तालमेल का सामसजस्य बैठाना अति-आवश्यक होता है। साथ ही समय-समय पर संस्थान की होने वाली सभी गतिविधियों को प्रैस और मीडिया के माध्यम से आम जनता तक पहुँचाने का कार्यभार भी अपने कँधों पर ही होता है। इसके अलावा समाज में अपने संस्थान की एक अच्छी और उच्चकोटि की छवि बनाने का कार्यभार भी आपके ही कँधों पर होता है!
आज के समय में यह एक बहुत तेजी से उभरता क्षेत्र है! तो, अगर आपके अंदर भी वह पैशन, वह जुनून; तो, आप भी बन सकते हैं एक सफ़ल जनसम्पर्क अधिकारी! साथ ही मीडिया और प्रैस में आपकी अच्छी पकड़ खोल सकती है आपके लिए सफ़लता के द्वार!







