हरेन्द्र प्रताप की विशेष रिपोर्ट
नई दिल्ली, 5 फरवरी। एक मेले ने दिल्ली में व्यवस्था की पोल खोल दी। एन एस आई सी परिसर में पांच फरवरी से आयोजित दिल्ली कला मेला के पहले ही दिन हजारों लोग सड़कों पर कैद हो गये। दो घंटे में दो किलोमीटर का सफर लोगों ने गाड़ियों से पूरा किया। हजारों लोग सड़क से भागकर मेट्रो की ओर लपके। वहां भी लोगों ने जबरदस्त भीड़ को झेला। यह स्थिति दोपहर से लेकर रात तक दिल्ली की प्रशासनिक कुव्यवस्था के विकराल रूप का दर्शन कराती रही। कम सैलरी पा रहे और ठेके पर नौकरी कर रहे डीटीसी के चालक एवं परिचालक की स्थिति और भी दयनीय दिखी। उनकी बस बमुश्किल रुक – रुक कर रेंग रही थी। रास्ते में फंसे एंबुलेंस के लिए सबसे बुरा वक्त रहा। ट्रैफिक पुलिस व्यवस्था को ठीक करते हुए कहीं नहीं दिखाई दी।

दिल्ली कला मेला अभी चार दिन और है। इतनी घनी आबादी वाले ओखला – गोविंदपुरी के क्षेत्र में मेला के आयोजन की अनुमति कैसे दी गई, यह अपने आप में जांच का विषय है। मेले में आने वाले दर्शकों ने सड़क पर ही अपनी गाड़ियां खड़ी कर रखी थीं। दिल्ली में सड़क पर पार्किंग आम बात है और आधी से अधिक सड़क पर गाड़ियों का स्थाई घर बन चुका है। इस वजह से मोहल्लों में प्रवेश करने वाली देवी बस को रोजाना सड़क के दानवों से मुकाबला करना पड़ रहा है।
सार्वजनिक बस में आज यात्रा कर रहे एक यात्री ने बताया कि उन्हें बदरपुर से नेहरू प्लेस तक आने में पांच घंटे लग गए। घंटों जाम की गिरफ्त में रहने के कारण दिल्ली की दस से बीस किलोमीटर तक के दायरे में हर प्रकार की सवारी परेशान रही। यदि यही हाल लगातार रहा तो किसी बड़े हादसे या कांड से दिल्ली को बचाना मुश्किल होगा। सड़क पर पार्किंग एक विकराल समस्या है। शालीमार बाग से लेकर बदरपुर और पटपड़गंज से लेकर नांगलोई तक गाड़ियों के डर से सड़क सिकुड़ गई है और कहीं गायब हो गई है या गली बन कर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है।







