मुंबई एयरपोर्ट पर सुरक्षा जांच के दौरान जब्त किए गए 35 किरपान अब सिख समुदाय के प्रतिनिधियों को लौटा दिए गए हैं। इस कदम का स्वागत तो हुआ है, लेकिन इसके साथ ही एयरपोर्ट सुरक्षा नियमों और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर बहस फिर तेज हो गई है।
ये किरपान अमृतधारी सिख यात्रियों से सुरक्षा जांच के दौरान लिए गए थे। अधिकारियों के मुताबिक, ये निर्धारित एविएशन साइज या कैरिज नियमों के अनुरूप नहीं थे। किरपान सिख धर्म के पांच ककारों में से एक है और अमृतधारी सिखों के लिए यह उनकी धार्मिक पहचान का अहम हिस्सा माना जाता है।

समुदाय की पहल से वापसी
महाराष्ट्र स्थित ‘सत श्री अकाल वेलफेयर ट्रस्ट’ के सचिव सरदार पुरन सिंह बंगा ने बताया कि इन पवित्र वस्तुओं की वापसी के लिए प्रयास किए गए थे। उनका कहना है कि किरपान को महज एक वस्तु की तरह नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह आस्था से जुड़ा प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि कई बार यात्री सुरक्षा जांच के दौरान किरपान वहीं छोड़ देते हैं और बाद में वे सामान आधिकारिक रिकॉर्ड में पड़ा रहता है। ट्रस्ट अब कस्टम अधिकारियों के साथ समन्वय कर ऐसे धार्मिक सामान की पहचान कर रहा है। सत्यापन के बाद इन्हें संबंधित परिवारों या गुरुद्वारा समितियों को सौंपा जाएगा। जहां वापसी संभव न हो, वहां धार्मिक परंपरा के अनुसार सम्मानजनक तरीके से निस्तारण किया जाएगा।
अन्य धार्मिक वस्तुओं की भी वापसी
ट्रस्ट के अनुसार, कस्टम अधिकारियों ने बताया है कि हाल में अन्य समुदायों से जुड़े धार्मिक सामान भी लौटाए गए हैं। इनमें कुरान की प्रतियां, बाइबिल और ज़मज़म पानी की बोतलें शामिल हैं।
विवाद क्यों बना रहता है?
हालांकि किरपान की वापसी को सकारात्मक कदम माना जा रहा है, लेकिन सिख संगठनों का कहना है कि एयरपोर्ट पर सुरक्षा जांच के दौरान कई बार धार्मिक प्रतीकों को लेकर भ्रम की स्थिति बनती है।
कुछ संगठनों का आरोप है कि यात्रियों से कभी-कभी ‘कड़ा’ भी उतारने के लिए कहा जाता है। सिख चिंतक एडवोकेट हरजीत सिंह ग्रेवाल का कहना है कि एयरपोर्ट स्टाफ के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश और संवेदनशीलता प्रशिक्षण जरूरी है, ताकि सुरक्षा नियमों और संविधान में दिए गए धार्मिक अधिकारों के बीच संतुलन बना रहे। उनके अनुसार, अमृतधारी यात्रियों को कई बार किरपान या खंडा लॉकेट ले जाने से रोका गया है। ऐसे मामलों को केंद्र सरकार के सामने भी उठाया गया है।
असली सवाल
मुद्दा केवल 35 किरपानों की वापसी का नहीं है। सवाल यह है कि क्या एयरपोर्ट सुरक्षा व्यवस्था धार्मिक प्रतीकों को लेकर एक समान और स्पष्ट नीति लागू कर पा रही है?एक ओर एविएशन सुरक्षा नियम हैं, दूसरी ओर संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार। दोनों के बीच संतुलन कैसे बने — यही बहस का केंद्र है।
फिलहाल किरपानों की वापसी को राहत के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन सिख संगठनों का कहना है कि भविष्य में ऐसी स्थितियां न बनें, इसके लिए स्पष्ट और समान नियम जरूरी हैं।







