अमित पांडे: संपादक
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर दावा किया है कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संभावित युद्ध को रोका, जो उनके अनुसार परमाणु स्तर तक पहुँच सकता था। ट्रंप ने कहा कि उन्होंने आठ युद्धों को रोका और उनमें से छह केवल “टैरिफ” की धमकी से समाप्त हुए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष इतना गंभीर था कि दस विमान गिराए गए और हालात परमाणु युद्ध तक पहुँच सकते थे। ट्रंप का यह बयान न केवल अमेरिका की विदेश नीति की शैली को उजागर करता है बल्कि दक्षिण एशिया की राजनीति और सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
भारत ने मई 2025 में “ऑपरेशन सिंदूर” शुरू किया था, जो अप्रैल 22 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में था, जिसमें 26 नागरिकों की मौत हुई थी। इस ऑपरेशन का उद्देश्य पाकिस्तान और पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में आतंकी ढाँचों को निशाना बनाना था। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा और हवाई झड़पों में कई विमान गिराए गए। ट्रंप का दावा है कि उन्होंने इस स्थिति को नियंत्रित किया और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने उन्हें “कम से कम एक करोड़ लोगों की जान बचाने वाला” बताया।
यहाँ सवाल यह है कि क्या वास्तव में अमेरिकी हस्तक्षेप ने युद्ध को रोका या यह केवल ट्रंप की राजनीतिक बयानबाज़ी है। भारत ने लगातार यह कहा है कि किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं हुई और यह मामला द्विपक्षीय स्तर पर ही सुलझाया गया। यह विरोधाभास बताता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में “क्रेडिट लेने” की होड़ कितनी तीव्र है।
ट्रंप का बयान यह भी दर्शाता है कि अमेरिका किस तरह आर्थिक दबाव (टैरिफ) को कूटनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है। यह रणनीति कई बार सफल भी रही है, लेकिन दक्षिण एशिया जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इसे लागू करना कितना व्यावहारिक है, यह बहस का विषय है। भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष केवल सीमा विवाद नहीं है, बल्कि इसमें आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता और ऐतिहासिक शत्रुता जैसे कारक भी शामिल हैं। ऐसे में केवल आर्थिक दबाव से युद्ध रोकना संभव नहीं लगता।
सांख्यिकीय दृष्टि से देखें तो भारत और पाकिस्तान दोनों के पास परमाणु हथियार हैं। भारत के पास लगभग 160 परमाणु वारहेड हैं जबकि पाकिस्तान के पास 170 के आसपास। दोनों देशों के पास मिसाइल और डिलीवरी सिस्टम भी हैं जो कुछ ही मिनटों में बड़े शहरों को निशाना बना सकते हैं। इस पृष्ठभूमि में ट्रंप का “न्यूक्लियर वॉर” का दावा पूरी तरह से काल्पनिक नहीं है, लेकिन यह अतिशयोक्ति भी हो सकती है।
राजनीतिक विश्लेषण यह कहता है कि ट्रंप का बयान अमेरिकी चुनावी राजनीति से भी जुड़ा है। वे बार-बार यह दिखाना चाहते हैं कि उनकी नीतियाँ वैश्विक स्तर पर शांति स्थापित करने में कारगर रही हैं। उन्होंने मई 2025 से अब तक 80 से अधिक बार यह दावा किया है कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्ध को रोका। यह संख्या स्वयं बताती है कि यह मुद्दा उनके लिए एक “पॉलिटिकल टूल” बन चुका है।
भारत के लिए यह बयान चुनौतीपूर्ण है क्योंकि वह हमेशा से यह कहता आया है कि किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार्य नहीं है। यह उसकी विदेश नीति का मूल सिद्धांत रहा है। पाकिस्तान, दूसरी ओर, अक्सर अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग करता है। ऐसे में ट्रंप का दावा पाकिस्तान की राजनीतिक रणनीति से मेल खाता है, लेकिन भारत की स्थिति को कमजोर करने वाला प्रतीत होता है।
इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा पहलू यह है कि दक्षिण एशिया में युद्ध की संभावना हमेशा से वैश्विक चिंता का विषय रही है। यदि कभी परमाणु हथियारों का इस्तेमाल होता है तो इसका असर केवल भारत और पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे एशिया और विश्व पर पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ बार-बार चेतावनी देती रही हैं कि दोनों देशों को संवाद और कूटनीति के रास्ते पर चलना चाहिए।
निष्कर्षतः, ट्रंप का दावा चाहे वास्तविकता हो या राजनीतिक बयानबाज़ी, यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि भारत-पाकिस्तान संबंध कितने संवेदनशील हैं। दस विमानों का गिरना, ऑपरेशन सिंदूर का जवाब, और परमाणु हथियारों की मौजूदगी—ये सब मिलकर एक खतरनाक तस्वीर पेश करते हैं। अमेरिका का हस्तक्षेप हो या न हो, असली ज़िम्मेदारी भारत और पाकिस्तान की है कि वे अपने मतभेदों को बातचीत से सुलझाएँ। ट्रंप का बयान भले ही चुनावी राजनीति का हिस्सा हो, लेकिन यह हमें याद दिलाता है कि दक्षिण एशिया में शांति की राह कितनी कठिन और जटिल है।













