अमित पांडे: संपादक
प्रयागराज की विशेष POCSO अदालत ने ज्योतिष पीठ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य स्वामी मुकुंदानंद गिरी पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है। आरोप है कि उनके गुरुकुल में बीस बच्चों का यौन शोषण हुआ। यह मामला केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति, धार्मिक बिरादरी और सत्ता के समीकरणों के बीच एक नए तनाव का संकेत भी देता है।
गौर करने वाली बात यह है कि यह विवाद अचानक नहीं उठा। पिछले तीन महीनों से प्रयागराज में इस मुद्दे पर कानूनी और सामाजिक हलचल जारी थी। शाकुंभरी पीठाधीश्वर आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज ने जनवरी में ही अदालत में याचिका दायर की थी और फरवरी में दो बच्चों को पेश कर आरोपों को पुष्ट करने की कोशिश की। अदालत ने अब जाकर पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है, जिससे यह मामला औपचारिक रूप से जांच के दायरे में आ गया है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कोई साधारण संत नहीं हैं। वे पहले भी राजनीतिक मंचों पर मुखर रहे हैं। हरिशंकर तिवारी की मूर्ति अनावरण में मुख्य अतिथि बने, प्रवचन दिए और कई बार सरकार की नीतियों पर खुलकर टिप्पणी की। उन पर लाठीचार्ज भी हुआ था और वे अक्सर राजनीतिक विमर्श में हस्तक्षेप करते रहे हैं। ऐसे में उनके खिलाफ दर्ज मुकदमा केवल व्यक्तिगत आरोप नहीं, बल्कि सत्ता और संतों के बीच टकराव का रूप लेता दिख रहा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं एक महंत रहे हैं और धार्मिक बिरादरी से उनका गहरा जुड़ाव है। लेकिन अब जब एक शंकराचार्य पर गंभीर आरोप लगे हैं, तो यह सवाल उठता है कि सरकार इस मामले को कैसे संभालेगी। एक ओर कानून और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि आरोपों की निष्पक्ष जांच हो, दूसरी ओर धार्मिक बिरादरी की संवेदनशीलता है, जो ऐसे मामलों को अक्सर ‘संतों पर हमला’ मानकर प्रतिक्रिया देती है।
धार्मिक बिरादरी इस घटना को किस नजर से देखेगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। शंकराचार्यों की जमात आम तौर पर एकजुट होकर अपने पद और परंपरा की रक्षा करती है। लेकिन बच्चों के शोषण जैसे आरोपों पर चुप्पी साधना मुश्किल होगा। यदि बिरादरी इसे राजनीतिक षड्यंत्र मानती है तो सरकार पर दबाव बढ़ेगा। यदि वे जांच का समर्थन करते हैं तो यह धार्मिक नेतृत्व में एक नई पारदर्शिता का संकेत होगा।
विपक्ष भी इस मामले को भुनाने की कोशिश करेगा। पहले किसान आंदोलन ने सरकार को झकझोरा था और अब यह मामला धार्मिक छवि पर चोट के रूप में देखा जा सकता है। भक्तों का बल और संतों का प्रभाव सरकार के लिए चुनौती बनेगा। यह टकराव केवल एक बाबा और एक मुख्यमंत्री के बीच नहीं है, बल्कि सत्ता, धर्म और समाज के बीच संतुलन का प्रश्न है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को मानने वाले केशव प्रसाद मौर्य जैसे बड़े नेता भी हैं, लेकिन अब मामला अदालत तक पहुँच चुका है। आरोप गंभीर हैं और जांच लंबी होगी। इस परिनति से यह साफ है कि धार्मिक नेतृत्व और राजनीतिक सत्ता के बीच रिश्ते अब पहले जैसे सहज नहीं रहे।
अंततः सवाल यही है: क्या सरकार इस मामले को केवल कानूनी प्रक्रिया मानकर आगे बढ़ाएगी, या धार्मिक बिरादरी और राजनीतिक दबाव के बीच कोई समझौता करेगी? और सबसे बड़ा प्रश्न—क्या बच्चों के अधिकार और न्याय को प्राथमिकता मिलेगी, या फिर संत और सत्ता के समीकरण हावी रहेंगे?







