पश्चिम बंगाल की राजनीति में सांस्कृतिक प्रतीकों का इस्तेमाल हमेशा से अहम रहा है। कवि, विद्वान और साहित्यकार बंगाल की पहचान का हिस्सा हैं। ऐसे में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंगाली विद्वानों के नामों के आगे पीछे अपने शब्द जोड़ने की कोशिश की, तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तीखी प्रतिक्रिया दी। The Telegraph की रिपोर्ट के अनुसार, ममता ने मोदी को चेताया कि बंगाल की सांस्कृतिक धरोहर को राजनीतिक रंग देने की कोशिश न करें।
यह विवाद केवल नामों के प्रयोग का नहीं है, बल्कि बंगाल की अस्मिता और चुनावी राजनीति का भी है। मोदी का स्वभाव है कि वे कहीं भी, किसी भी मंच पर अपनी शैली में बोलते हैं। यही वह मोदी हैं जिन्होंने एक बार चुनावी सभा में “दीदी ओ दीदी” कहकर ममता का मज़ाक उड़ाया था। उनकी भाषा और अंदाज़ अक्सर विरोधियों को चुभते हैं, लेकिन भाजपा के लिए यह जनसंपर्क का तरीका भी है।
ममता की चेतावनी के पीछे कारण साफ है। बंगाल में भाजपा लगातार अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है और इसके लिए वह स्थानीय सांस्कृतिक प्रतीकों का इस्तेमाल करती है। विद्वानों और कवियों के नामों को अपने अंदाज़ में प्रस्तुत करना भाजपा की रणनीति का हिस्सा है—यह दिखाने के लिए कि वे बंगाल की परंपरा से जुड़ रहे हैं। लेकिन ममता इसे राजनीतिक हस्तक्षेप मानती हैं। उनके लिए यह बंगाल की अस्मिता पर हमला है।
क्या यह चुनाव से जुड़ा है? बिल्कुल। बंगाल में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच मुकाबला केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भी है। भाजपा बंगाल की सांस्कृतिक धरोहर को अपने विमर्श में शामिल कर मतदाताओं को आकर्षित करना चाहती है। वहीं ममता इसे अपनी पहचान और बंगाल की परंपरा की रक्षा का सवाल बना रही हैं। यही कारण है कि उन्होंने मोदी को चेताया कि विद्वानों के नामों के साथ छेड़छाड़ न करें।
भाजपा की रणनीति अक्सर विवादों को गर्म करने की रही है। चाहे “दिदी ओ दिदी” का नारा हो या विद्वानों के नामों का प्रयोग, उद्देश्य यही है कि जनता का ध्यान खींचा जाए और विपक्ष को असहज किया जाए। ममता की प्रतिक्रिया भी इसी रणनीति का हिस्सा है—वह भाजपा को चुनौती देती हैं कि बंगाल की अस्मिता से खिलवाड़ न करें।
इस पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण यही बताता है कि बंगाल की राजनीति में सांस्कृतिक प्रतीकों का इस्तेमाल अब और तेज़ होगा। भाजपा इसे चुनावी हथियार बनाएगी और तृणमूल कांग्रेस इसे अपनी अस्मिता की रक्षा का मुद्दा। सवाल यह है कि जनता इसे कैसे देखेगी—क्या वे इसे सांस्कृतिक सम्मान मानेंगे या राजनीतिक हस्तक्षेप?
2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने बंगाल में उल्लेखनीय बढ़त हासिल की थी। उस चुनाव में भाजपा ने सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल कर मतदाताओं को आकर्षित किया और तृणमूल कांग्रेस को चुनौती दी। वहीं 2021 के विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी ने भाजपा की रणनीति को मात दी और सत्ता में वापसी की। इस दौरान “दिदी ओ दिदी” जैसे नारों ने भाजपा को चर्चा में रखा, लेकिन ममता ने इसे अपमानजनक बताते हुए जनता की सहानुभूति हासिल की।
अब 2024 के लोकसभा चुनावों की ओर बढ़ते हुए यह विवाद फिर से महत्वपूर्ण हो गया है। भाजपा बंगाल में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए सांस्कृतिक प्रतीकों का इस्तेमाल कर रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस इसे अपनी अस्मिता की रक्षा का सवाल बना रही है। ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी दोनों ही भाजपा पर आरोप लगा रहे हैं कि वह बंगाल की सांस्कृतिक धरोहर को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है। अभिषेक ने हाल ही में कहा कि भाजपा बंगाल की परंपरा को समझे बिना उसे अपने चुनावी एजेंडे में शामिल कर रही है, जो राज्य की अस्मिता के खिलाफ है।
अंततः यह विवाद केवल नामों का नहीं, बल्कि बंगाल की पहचान और चुनावी राजनीति का है। मोदी की शैली और ममता की चेतावनी दोनों ही अपने अपने पक्ष को मजबूत करने की कोशिश हैं। लेकिन असली प्रश्न यही है: क्या बंगाल की सांस्कृतिक धरोहर राजनीति का उपकरण बनेगी, या जनता इसे अपनी अस्मिता की रक्षा का सवाल मानकर खड़ी होगी?







