विशेष संवाददाता
WAPCOS के प्रोजेक्ट मैनेजर पंकज दुबे की कथित ₹10 लाख की रिश्वत की किश्त जो कई करोड़ का मामूली हिस्सा लेते हुए CBI द्वारा की गई नाटकीय गिरफ्तारी ने PSU कंसल्टेंसी तंत्र में हलचल मचा दी है — और इस कार्रवाई ने गिरफ्तारी से कहीं बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
क्या यह सिर्फ एक फील्ड अधिकारी की करतूत थी—
या एक सख्ती से केंद्रीकृत प्रोजेक्ट कंट्रोल सिस्टम में पहली दरार
वह ट्रैप जिसने तूफान खड़ा किया
सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार, CBI की एंटी-करप्शन ब्यूरो ने:
• एक औपचारिक शिकायत पर कार्रवाई की,
• कथित मांग का सत्यापन किया,
• ट्रैप बिछाया, और
• दुबे सहित निजी व्यक्तियों को लेन-देन के दौरान गिरफ्तार किया।
इसके बाद लखनऊ, देवरिया, गाजीपुर और भुवनेश्वर में तलाशी ली गई, जहाँ से नकदी और दस्तावेज मिलने की खबर है।
कागज़ पर यह एक सामान्य ट्रैप केस लगता है।
लेकिन ठेकेदारों और PSU पर्यवेक्षकों के बीच इस गिरफ्तारी ने WAPCOS में टेंडर कैसे चलते हैं, इस पर गहरी जांच की मांग तेज कर दी है।
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क्या कोई प्रोजेक्ट मैनेजर बड़े टेंडर तय कर सकता है?
CPSE व्यवस्था से परिचित खरीद विशेषज्ञों का कहना है कि उच्च मूल्य के कंसल्टेंसी और निर्माण ठेके आमतौर पर मुख्यालय स्तर की कई परतों से गुजरते हैं।
उद्योग के जानकार बताते हैं कि:
• तकनीकी स्वीकृतियाँ केंद्रीय स्तर पर जांची जाती हैं,
• वित्तीय सहमति ऊपरी स्तर पर होती है, और
• फील्ड प्रोजेक्ट मैनेजर आमतौर पर सीमित दायरे में काम करते हैं।
*इस संरचनात्मक वास्तविकता ने ठेकेदार जगत में यह सवाल खड़ा किया है कि *Dubeyवास्तव में अकेले काम नहीं कर रहे थे|
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मुख्यालय की स्वीकृति श्रृंखला पर नजर
गिरफ्तारी के बाद ठेकेदारों की चर्चाओं में बार-बार मुख्यालय की टेंडर स्वीकृति प्रक्रिया पर ध्यान गया है।
कई ठेकेदार-पक्ष के स्रोतों का आरोप है कि टेंडर प्रोसेसिंग से जुड़े अधिकारी — विशेषकर अमिताभ त्रिपाठी— विभिन्न परियोजनाओं की औपचारिक स्वीकृति श्रृंखला का हिस्सा रहे और मौखिक निर्देश दिए जाते थे।
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धामा के तहत केंद्रीकरण पर उठे सवाल और चिंता
विवाद तब और गहरा गया जब WAPCOS ने हाल में निर्माण परियोजनाओं की महत्वपूर्ण निगरानी वरिष्ठ अधिकारी प्रदीप कुमार धामा के अधीन समेकित कर दी।
समर्थक इसे रिश्वत दक्षता सुधार बताते हैं।
लेकिन ठेकेदार समुदाय के आलोचकों का दावा है कि इस कदम ने:
• मुख्यालय नियंत्रण को और कड़ा किया,
• फील्ड स्तर की स्वतंत्रता घटाई,
• परियोजना दृश्यता को सीमित दायरे में केंद्रित किया, और
• WAPCOS के साथ काम करने की लागत बढ़ा दी।
॰ प्रदीप धामा एक कथित रिश्वतखोर है और उसके शिंदे तथा मंत्री के साथ घनिष्ठ संबंद बन चुके हैं जिसमे सुमिर चावला की अहम भूमिका है । सूत्रों के मुताबिक़ अब एजेंसी की इनपर( सुमिर और प्रदीप ) कड़ी नजर है और जल्दी ही गिरफ्तार हो सकते हैं ।
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‘इंटरफेस लेयर’ पर भी सवाल
ठेकेदार हलकों में एक और मुद्दा बार-बार सामने आ रहा है — कुछ व्यक्तियों की कथित भूमिका, जो ठेकेदारों और सिस्टम के बीच संपर्क सुविधा प्रदान करते बताए जाते हैं।
इन अनौपचारिक चर्चाओं में सुमिर चावला और विमल चंदर के नाम प्रभावशाली ऑपरेशनल कड़ी के रूप में लिए जाते हैं जो रिश्वत इकठा कर्त्ते हैं ।
अब तक:
• WAPCOS ने इन धारणाओं पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।
• आरोपों की एजेंसी ने पुष्टि की है और कुछ और गिरफ्तारियां होनी निश्चिंत हैं ।
प्रेस सूत्रों का यह भी दावा है कि शिंदे से मिलने या बात करने के प्रयास सुमिर चावला द्वारा रोके गए ।
भ्रष्टाचार-रोधी विशेषज्ञों का कहना है कि कई PSU मामलों में जांच एजेंसियाँ केवल रिश्वत लेन-देन ही नहीं, बल्कि उसे संभव बनाने वाली संस्थागत संरचना पर भी ध्यान देती हैं।
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विजिलेंस की भूमिका पर बहस
इस गिरफ्तारी ने यह बहस भी तेज कर दी है कि क्या पहले मिले संकेतों — जिनमें मीडिया रिपोर्ट और आंतरिक इनपुट शामिल थे — पर पर्याप्त सतर्कता दिखाई गई।
कुछ हितधारकों का आरोप है कि प्रतिक्रिया अपर्याप्त रही।
शिल्पा शिंदे तथा अन्य विजिलेंस अधिकारी ने उपलब्ध संकेतों अनदेखी की जब कड़ी कार्रवाई की जरूरत थी।
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आगे क्या?
कानूनी रूप से मामला अभी गिरफ्तार व्यक्तियों तक सीमित एक ट्रैप केस है।
लेकिन दुबे प्रकरण ने जांच का दायरा व्यापक कर दिया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि जांच आगे बढ़ती है तो असली परीक्षा होगी:
• टेंडर स्वीकृति की वास्तविक श्रृंखला,
• मुख्यालय संचार रिकॉर्ड,
• हालिया केंद्रीकरण का प्रभाव, और
• क्या कथित मांग व्यक्तिगत थी या प्रणालीगत।
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PSU गलियारों में गूंजता बड़ा सवाल
क्या दुबे की गिरफ्तारी कहानी का अंत है…
*या बहुत बड़ी कहानी की शुरुआत+?







