हरेन्द्र प्रताप की विशेष रिपोर्ट
नई दिल्ली, 22 फरवरी। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कारण नोबेल पुरस्कार, पुरस्कार समिति और मेरा भाव बढ़ गया ! ट्रम्प साहेब के प्रयासों से यह भी साबित हो गया कि नोबेल पुरस्कार को मैनेज नहीं किया जा सकता है। इस योगदान के लिए मैं ट्रम्प साहेब को नमस्कार करता हूं।
भारत के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने ये विचार दिल्ली में पिछले दिनों पद्मश्री डॉ. श्याम सिंह शशि स्मृति व्याख्यानमाला में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किये। इस अवसर पर उन्होंने नोबेल पुरस्कार के महत्व और नोबेल शांति पुरस्कार तथा अन्य नोबल पुरस्कार के अंतर पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि शांति का नोबेल पुरस्कार पाने के बावजूद पहले लोग उन्हें उतनी गंभीरता से नहीं लेते थे लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा नोबेल शांति पुरस्कार पाने की आतुरता दिखाये जाने के बाद लोगों का मेरे और नोबेल पुरस्कार के प्रति सम्मान और बढ़ गया। विशेष कर भारत में लोग मुझे अधिक गंभीरता से लेने लगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि मानवता का सर्वोच्च सम्मान है नोबल पुरस्कार।
उन्होंने कहा कि आज की शिक्षा दुनिया को प्रतियोगिता सिखा रही है जो बेहद क्रूर एवं आक्रामक है। वर्ष 2014 में शांति के क्षेत्र में पहली बार नोबेल पुरस्कार पाने वाले श्री सत्यार्थी ने कहा कि दुनिया में जो लोग मानवता की भलाई चाहते हैं वे एक साथ मिलकर एक ऐसा यज्ञ करें जिससे ज्ञान की अग्नि प्रज्जवलित हो सके।
उन्होंने स्पष्ट किया कि विद्या का अर्थ है मुक्ति और यदि हम दूसरों को धक्का मार कर आगे बढ़ना चाहते हैं तो यह शिक्षा नहीं है। उन्होंने बताया कि दुनिया ने सब कुछ सीख लिया लेकिन साथ चलना नहीं सीखा जबकि साथ चलने में ही सब की भलाई है। उन्होंने आगाह किया कि विद्या को व्यापार नहीं बनाना चाहिए।







