हरेन्द्र प्रताप सिंह
भारतीय जनता पार्टी की सरकार का फरवरी, 2026 में दिल्ली में एक साल पूरा हो गया है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की कार्यशैली और भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली की शासन व्यवस्था में दिलचस्पी पर्दे के पीछे जितनी भी हो, आम लोगों को नजर नहीं आती है। चुनावी वादे को पूरा करने के मामले में भारतीय जनता पार्टी जितनी विफल रही है, उतना शायद ही कोई और खतरा मोल ले सकता है। सामान्य नागरिकों की रोजमर्रा की जरूरत को आसानी से पूरा करने में भी राज्य सरकार विफल रही है। शासन-प्रशासन पर लेफ्टिनेंट गवर्नर विनय कुमार सक्सेना के बयान सुनने को लोग अब तरस गए हैं। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता भी मुख्य भूमिका में नजर नहीं आ रही हैं।
यदि पिछले एक साल के भाजपा शासन काल का विश्लेषण किया जाए तो सरकार के पक्ष में दस में से दो अंक और खिलाफ में आठ अंक दिखाई देते हैं। भाजपा शासन काल के एक साल के बाद सबसे बड़ी उपलब्धि यदि किसी की दिखाई दे रही है तो वह है पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को न्यायालय से मिला आम आदमी पार्टी के लिए बहु प्रतीक्षित न्याय जो इसी फरवरी में हासिल हो गया। मतलब शासन भाजपा का और उपलब्धि आम आदमी पार्टी की ! क्या संयोग है !
यह संयोग महज एक संयोग नहीं है। यह एक संकेत है। इस संकेत का निहितार्थ यह है कि दिल्ली को संभाल कर रखने में भारतीय जनता पार्टी पारंपरिक रूप से विफल है। साथ ही, यदि यही हाल कायम रहा तो दिल्ली में आम आदमी पार्टी की वापसी फिर से हो सकती है।
वैसे भी जो सच आम आदमी पार्टी के शासन काल में नजर आता था, वही अब भारतीय जनता पार्टी के शासन काल में नजर आ रहा है। आम आदमी पार्टी के शासन काल में दिल्ली की तीन बार मुख्यमंत्री रह चुकीं स्व. शीला दीक्षित की कार्यशैली की स्मृति ताज़ा हो उठती थी। शीला दीक्षित आज भी अपने कार्यों के कारण याद की जाती हैं। वहीं वर्तमान दिल्ली में भाजपा के शासन काल में अनेक लोग पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को रोज याद करते हैं। दिल्ली की महिलाएं, डी टी सी का इस्तेमाल करने वाले यात्री और अनुबंध पर काम करने वाले लोग केजरीवाल को विशेष रूप से याद करते हैं।
देखा जाए तो दिल्ली में आज भी शीला दीक्षित जीवित हैं। जगह – जगह उनकी स्मृति ताज़ा हो उठती हैं। सड़क, पुल, पार्क, मेट्रो सब शीला दीक्षित की यादों को बार – बार विकास की मुख्य धारा में जीवंत कर देते हैं। वहीं डी टी सी, सर्वोदय विद्यालय, रैन बसेरा, मोहल्ला क्लीनिक और देवी का रूप धारण कर चुकी मोहल्ला बस आम आदमी पार्टी के शासन की याद दिलाती हैं। भूले – भटके जब कभी सफाई दिख जाती है और पुराने स्टेडियम चमकते दिख जाते हैं तो दिल्ली में नौवें एशियाई खेलों यानि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की स्मृति तरो-ताजा हो उठती है।
भारतीय जनता पार्टी के ताजा एक साल के शासन काल में सबसे संतोषजनक स्थिति है कानून और व्यवस्था की। लेकिन इसका श्रेय मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को न जाकर गृहमंत्री अमित शाह को जाता है क्योंकि दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अधीन है। दिल्ली पुलिस अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों में अच्छा काम कर रही है। लेकिन दिल्ली ट्रैफिक पुलिस घरेलू स्तर पर उतनी ही बदनाम भी हो रही है। कानून – व्यवस्था संगठित अपराधियों के खिलाफ तो फिलहाल बहुत हद तक प्रभावी है लेकिन संगठित गिरोह के खिलाफ यह निष्प्रभावी है। दिल्ली में तीन तरह के संगठित अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। उदाहरण के लिए बच्चों का गायब होना, पार्क के चारों ओर तथा अन्य सार्वजनिक जगहों पर अतिक्रमण का लगातार बढ़ना तथा लड़कियों के खिलाफ अपराध का सिलसिला नहीं रुकना भारतीय जनता पार्टी के शासन की नाकामी को उजागर करने के लिए काफी है।
दिल्ली के मोती बाग स्थित नानकपुरा इलाके और अन्य मोहल्लों में पार्क के चारों ओर झुग्गियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। महानगर में बढ़ती बेरोजगारी छोटे अपराध की संख्या बढ़ा रही है। कोटला मुबारकपुर, पांडव नगर – मदर डेयरी, खानपुर, नांगलोई, उत्तम नगर, गोविंद पुरी, ख्याला, विकास पुरी और सागरपुर जैसे अनेक क्षेत्रों में पॉकेटमार अचानक सक्रिय हो उठे हैं। इनमें महिला पॉकेटमार का गिरोह भी सक्रिय है।
दिल्ली में सड़क – गली से लेकर फुटपाथ तक की हालत बेहद खराब है। सफाई के मामले में दिल्ली बहुत पिछड़ चुकी है। यमुना नदी को फिलहाल भूल जाना ही उचित है लेकिन दिल्ली जल बोर्ड के पास मीटर रीडिंग में लापरवाही और अन्य मामलों को लेकर शिकायतों का अंबार लग चुका है। कूड़ा – कचरा निपटान प्रणाली की हालत भी खस्ता है। डी टी सी बस कहां जा कर सो जाती है, किसी को नहीं मालूम है। हां, ठीक है तो बस एक ही चीज और वह है जय श्री राम का नारा और धार्मिक भाईचारा ! बाहर से होली और ईद की तैयारी शांतिपूर्ण नजर आ रही है। वहीं जल्दी ही सारे चुनावी वादे यदि पूरे नहीं किये गये और विशेष कर दिल्लीवासी महिलाओं के खाते में वादे के मुताबिक हर महीने पूरी धनराशि नहीं डाली गई तो यह नहीं भूलना चाहिए कि दिल्ली की जनता जब बदला लेने उतरती है तो प्याज के आंसू रुलाने में भी देर नहीं लगाती है !







