अमित पांडे: संपादक
उधम सिंह नगर की हालिया घटना, जहाँ एक नमाज़ी को खुले में इबादत करने में असुविधा और विरोध का सामना करना पड़ा, केवल एक स्थानीय विवाद नहीं है बल्कि उत्तराखंड की राजनीति और सामाजिक संरचना का गहरा संकेत है। यह घटना उस तनाव को उजागर करती है जो धार्मिक स्वतंत्रता और साम्प्रदायिक संतुलन के बीच लगातार बढ़ रहा है।
समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो धार्मिक कर्मकांड केवल आस्था का प्रदर्शन नहीं होते, बल्कि वे सामाजिक पहचान और सामूहिकता का हिस्सा होते हैं। जब किसी समुदाय को अपने धार्मिक अभ्यास में बाधा दी जाती है, तो यह केवल व्यक्तिगत असुविधा नहीं बल्कि सामूहिक असुरक्षा का अनुभव बन जाता है। उधम सिंह नगर की घटना इसी असुरक्षा का प्रतीक है।
धामी सरकार के शासनकाल में उत्तराखंड को “धार्मिक पर्यटन” और “सांस्कृतिक गौरव” के नाम पर प्रस्तुत किया गया है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि इस गौरव के पीछे अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता पर दबाव बढ़ा है। नमाज़ पढ़ने पर आपत्ति जताना या उसे रोकना इस प्रवृत्ति का हिस्सा माना जा रहा है। यह प्रवृत्ति समाजशास्त्र में “मेजॉरिटेरियनिज़्म” यानी बहुसंख्यकवाद की राजनीति कहलाती है, जहाँ बहुसंख्यक समुदाय की सांस्कृतिक प्राथमिकताओं को ही राज्य की नीति बना दिया जाता है।
ऐतिहासिक रूप से भारत का लोकतंत्र धार्मिक विविधता और सह-अस्तित्व पर आधारित रहा है। लेकिन जब किसी राज्य में अल्पसंख्यक समुदाय को अपने धार्मिक अभ्यास में असुविधा होती है, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण का संकेत है। समाजशास्त्री इसे “सांस्कृतिक वर्चस्व” की प्रक्रिया मानते हैं, जहाँ एक समुदाय की परंपराएँ दूसरे समुदाय की स्वतंत्रता पर हावी हो जाती हैं।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो ऐसी घटनाएँ सत्ता के लिए दोहरे लाभ का साधन बनती हैं। एक ओर बहुसंख्यक समुदाय को यह संदेश दिया जाता है कि उनकी सांस्कृतिक प्राथमिकताएँ ही राज्य की नीति हैं, दूसरी ओर अल्पसंख्यक समुदाय को दबाव में रखकर राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया जाता है। उधम सिंह नगर की घटना इसी ध्रुवीकरण की राजनीति का हिस्सा है।
समाजशास्त्र में यह भी कहा जाता है कि जब धार्मिक स्वतंत्रता पर दबाव बढ़ता है तो सामाजिक विश्वास और सामूहिकता कमजोर होती है। इससे समाज में “हम बनाम वे” की भावना पैदा होती है, जो लंबे समय में सामाजिक संघर्ष और अस्थिरता को जन्म देती है। उत्तराखंड जैसे राज्य, जहाँ पर्यटन और सांस्कृतिक विविधता आर्थिक और सामाजिक जीवन का आधार हैं, वहाँ इस तरह की अस्थिरता राज्य की पहचान को ही कमजोर कर सकती है।
धामी सरकार के आलोचक कहते हैं कि यह घटना शासन की प्राथमिकताओं का नमूना है। धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। जबकि समर्थक इसे “सांस्कृतिक अनुशासन” का हिस्सा बताते हैं। लेकिन समाजशास्त्रीय विश्लेषण यह कहता है कि किसी भी लोकतांत्रिक राज्य में धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित करना सामाजिक संतुलन को तोड़ता है।
उधम सिंह नगर की घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या उत्तराखंड का लोकतंत्र केवल बहुसंख्यक समुदाय की प्राथमिकताओं पर आधारित होगा या फिर वह सभी समुदायों की स्वतंत्रता और सुरक्षा को समान महत्व देगा। यह सवाल केवल एक जिले का नहीं है, बल्कि पूरे राज्य और देश के लोकतांत्रिक भविष्य का है।
समापन में कहा जा सकता है कि नमाज़ पर असुविधा की यह घटना धामी शासन की राजनीति का प्रतीक है, जहाँ धार्मिक स्वतंत्रता और साम्प्रदायिक संतुलन पर दबाव बढ़ रहा है। समाजशास्त्र के हिसाब से यह प्रवृत्ति सामाजिक विश्वास को कमजोर करती है और लोकतंत्र की नींव को हिलाती है। यदि इस पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया तो उत्तराखंड की सामाजिक संरचना और लोकतांत्रिक पहचान दोनों पर गहरा असर पड़ेगा।






