अमित पांडे: संपादक
मध्य प्रदेश सरकार ने हाल ही में स्वीकार किया है कि बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व और उसके आसपास के जंगलों में पिछले ढाई महीने में आठ बाघों की मौत हुई है। यह जानकारी राज्य सरकार ने हाई कोर्ट में दाखिल रिपोर्ट में दी, जब वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने जनहित याचिका दायर कर इस मुद्दे को उठाया। इस खुलासे ने न केवल वन्यजीव संरक्षण की स्थिति पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि मध्य प्रदेश की “टाइगर स्टेट” की पहचान पर भी गहरी चिंता जताई है।
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, इन आठ बाघों में से चार की मौत बिजली के अवैध तारों से करंट लगने से हुई, जबकि बाकी चार प्राकृतिक कारणों से मरे। यह तथ्य कि आधे बाघ मानवीय लापरवाही के कारण मारे गए, वन विभाग की निगरानी और संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाता है। सरकार ने यह भी कहा कि सभी बाघों के शव सुरक्षित मिले और शिकार (poaching) की आशंका नहीं है।
यह घटना ऐसे समय सामने आई है जब मध्य प्रदेश पहले ही बाघों की मौत के मामले में रिकॉर्ड बना चुका है। 2025 में ही राज्य में 54 बाघों की मौत दर्ज की गई थी, जो 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू होने के बाद से सबसे अधिक वार्षिक संख्या है। यह आंकड़ा बताता है कि संरक्षण उपायों के बावजूद बाघों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पा रही है।
भारत की राष्ट्रीय बाघ गणना 2022 के अनुसार देश में कुल 3,682 बाघ हैं, जो 2018 की तुलना में लगभग 24% की वृद्धि है। इस गणना ने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा बाघ आवास वाला देश साबित किया है। इसमें मध्य प्रदेश सबसे आगे है, जहाँ 785 बाघ पाए गए, इसके बाद कर्नाटक में 563 और उत्तराखंड में 560 बाघ दर्ज किए गए।
मध्य प्रदेश में बाघों की मौत का सिलसिला पिछले पाँच वर्षों से लगातार चिंता का विषय रहा है। 2021 में लगभग 40 बाघों की मौत हुई, 2022 में यह संख्या 45 तक पहुँची। 2023 में पूरे भारत में 182 बाघ मरे, जिनमें से लगभग 50 मध्य प्रदेश में थे। 2024 में भारत में 126 मौतें दर्ज की गईं, जिनमें से लगभग 40 मध्य प्रदेश में थीं। 2025 में यह संख्या 166 तक पहुँच गई और अकेले मध्य प्रदेश में 54 बाघों की मौत हुई, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बाघों की मौत के पीछे कई कारक हैं—जंगलों में अवैध बिजली के तार, मानवीय अतिक्रमण, प्राकृतिक संघर्ष और वन्यजीवों के लिए घटती सुरक्षित जगह। बांधवगढ़ और कान्हा जैसे रिज़र्व लंबे समय से बाघों के लिए सुरक्षित माने जाते रहे हैं, लेकिन हाल की घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर खामियाँ हैं।
वन्यजीव कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार को केवल मौतों की गिनती करने से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे। बिजली के तारों को हटाना, जंगलों में निगरानी बढ़ाना, और स्थानीय समुदायों को संरक्षण में शामिल करना बेहद ज़रूरी है। अदालत ने भी सरकार से पूछा है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या रणनीति अपनाई जाएगी।
मध्य प्रदेश की पहचान “टाइगर स्टेट” के रूप में रही है। 2022 की गणना में राज्य में सबसे अधिक बाघ पाए गए थे। लेकिन लगातार हो रही मौतें इस पहचान को कमजोर कर रही हैं। यदि संरक्षण उपायों को सख्ती से लागू नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में बाघों की संख्या पर गंभीर असर पड़ सकता है।
यह संकट केवल वन्यजीव संरक्षण का नहीं है, बल्कि यह पारिस्थितिकी और पर्यटन दोनों पर असर डालता है। बाघों की मौजूदगी ही मध्य प्रदेश के जंगलों को जीवंत बनाती है और पर्यटन उद्योग को सहारा देती है। हर बाघ की मौत न केवल जैव विविधता की हानि है बल्कि राज्य की आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान पर भी चोट है।
आठ बाघों की मौत का यह मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम वास्तव में अपने प्राकृतिक धरोहर की रक्षा कर पा रहे हैं। यह केवल मध्य प्रदेश की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है। यदि हम बाघों को नहीं बचा पाए तो यह हमारी पारिस्थितिकी, हमारी संस्कृति और हमारी जिम्मेदारी पर गहरी विफलता होगी।





