अमित पांडे: संपादक
नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना केवल एक व्यक्तिगत राजनीतिक निर्णय नहीं है, बल्कि बिहार की राजनीति में एक गहरे बदलाव का संकेत है। यह बदलाव उस लंबे सफर का परिणाम है जिसमें नीतीश ने कभी एक सप्ताह के लिए मुख्यमंत्री पद संभाला, फिर पाँच साल बाद स्थायी मुख्यमंत्री बने और उसके बाद दशकों तक बिहार की राजनीति पर अपना प्रभुत्व बनाए रखा। अब उनका जाना एक नए दौर की शुरुआत है, जिसमें सवाल अधिक हैं और जवाब कम।
नीतीश की सबसे बड़ी ताकत रही उनकी सामाजिक गठजोड़ की राजनीति। उन्होंने ओबीसी और दलित मतदाताओं को एकजुट कर बिहार की चुनावी गणित को अपने पक्ष में किया। यही कारण था कि बार-बार गठबंधन बदलने के बावजूद उन्हें “पलटूराम” कहने वाले आलोचकों का असर सीमित रहा। लेकिन अब जब वे मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जा रहे हैं, भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि क्या वह इस सामाजिक गठजोड़ को बिना नीतीश के बनाए रख पाएगी।
जेडीयू के भीतर भी यह फैसला अचानक नहीं आया। चुनाव से पहले ही दबाव था कि नीतीश को गठबंधन का चेहरा बनाया जाए, जबकि भाजपा इसके पक्ष में नहीं थी। अंततः दबाव में आकर उन्हें नेता घोषित किया गया, लेकिन यह साफ था कि उनकी भूमिका सीमित होने वाली है। ललन सिंह और संजय झा जैसे नेता नेतृत्व परिवर्तन के पक्ष में थे, जबकि शरवन कुमार जैसे वरिष्ठ नेता मानते थे कि नीतीश की छवि चुनावी मुकाबले में ज्यादा सुरक्षित है। यही कारण था कि उन्हें फिर से नेता घोषित किया गया, लेकिन यह संतुलन अस्थायी साबित हुआ।
नीतीश की राजनीति का एक बड़ा अध्याय रहा शराबबंदी। यह निर्णय सामाजिक सुधार के रूप में देखा गया, जिसने गरीब और दलित समुदायों को राहत दी। लेकिन आर्थिक दृष्टि से यह राजस्व के लिए नुकसानदेह साबित हुआ और शराब लॉबी उनके खिलाफ हो गई। तेजस्वी यादव जैसे विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि शराबबंदी के बावजूद उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों से तस्करी जारी रही। फिर भी नीतीश के लिए यह निर्णय प्रतीकात्मक था—यह उनके शासन की नैतिकता और सामाजिक सुधार का हिस्सा था।
नीतीश ने हमेशा वंशवादी राजनीति का विरोध किया। उन्होंने लालू यादव की परिवार-केंद्रित राजनीति की आलोचना की और खुद कभी अपने परिवार को राजनीति में नहीं लाए। लेकिन अब जब उनके बेटे निशांत कुमार के भविष्य को लेकर अटकलें लग रही हैं, तो यह उनके पुराने दर्शन से विरोधाभासी लगता है। क्या यह भाजपा की शर्तों के आगे झुकना है या एक पिता का स्वाभाविक प्रयास कि अपने बेटे का भविष्य सुरक्षित करे? यह सवाल उनके पूरे राजनीतिक सफर को एक नए विरोधाभास में खड़ा करता है।
राष्ट्रीय और वैश्विक परिप्रेक्ष्य भी इस बदलाव को और जटिल बनाते हैं। ईरान-इज़राइल-अमेरिका तनाव, रूसी तेल की राजनीति और व्यापारिक संकट भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल रहे हैं। ऐसे समय में बिहार की राजनीतिक अस्थिरता भाजपा के लिए अतिरिक्त चुनौती है। बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल अपने चुनावों में व्यस्त हैं, लेकिन बिहार का यह बदलाव राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डाल सकता है।
नीतीश का जाना केवल एक युग का अंत नहीं है, बल्कि यह सवाल भी है कि आगे क्या होगा। क्या भाजपा बिना नीतीश के बिहार में अपनी पकड़ मजबूत कर पाएगी? क्या जेडीयू नीतीश के बिना टिक पाएगी? क्या निशांत कुमार राजनीति में आएंगे और अपने पिता की विरासत संभालेंगे, या बिहार फिर से वंशवादी राजनीति को नकार देगा?
नीतीश कुमार की कहानी विरोधाभासों की कहानी है। उन्होंने कभी केंद्रीय राजनीति से दूरी बनाई, फिर सामाजिक सुधारों के जरिए अपनी पहचान बनाई, गठबंधन की राजनीति में माहिर बने और अब राज्यसभा जाकर एक संरक्षक की भूमिका में आ गए हैं। उनका जाना बिहार की राजनीति को रीसेट करता है, लेकिन यह रीसेट अधूरा है। इसमें सवाल ज्यादा हैं, जवाब कम।
बिहार की गलियाँ आज भी आंदोलनों और विरोध से भरी हैं। नीतीश का युग भले समाप्त हो गया हो, लेकिन उनके फैसलों, उनके विरोधाभासों और उनके अधूरे वादों की गूँज आने वाले वर्षों तक बिहार की राजनीति को आकार देती रहेगी। यही कारण है कि नीतीश कुमार का जाना एक अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है—एक ऐसा रीसेट जो बिहार की राजनीति को फिर से परिभाषित करेगा।













