हरेन्द्र प्रताप की विशेष रिपोर्ट
रीवा, 6 मार्च। आकाशवाणी रीवा सहित देश भर में फैला हुआ सरकारी रेडियो का महत्वपूर्ण जनसंचार नेटवर्क भारतीय नौकरशाही की उपेक्षा का शिकार है। इस संवेदनशील विशाल संगठन में विभिन्न प्रकार के अति महत्वपूर्ण कार्यक्रम बंद कर दिये गये हैं। यहां तक कि अनेक रेडियो स्टेशन बंदी के कगार पर हैं।
भारतीय प्रसारण सेवा के सैकड़ों पद इस समय उपेक्षा के शिकार हैं और वर्षों से खाली पड़े हैं। देश भर के आकाशवाणी केन्द्रों में प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव ( पेक्स ), ट्रांसमिशन एक्जीक्यूटिव ( ट्रेक्स) या ड्यूटी अफसर तथा एनाउंसर के सैकड़ों पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं। आकाशवाणी रीवा का केन्द्र भी बंदी की कगार पर है। यहां पर सिर्फ दो पेक्स हैं और स्थानीय स्टेशन मुख्य रूप से आकाशवाणी भोपाल के कार्यक्रमों से कामचलाऊ रूप से संचालित हो रहा है।
संयोगवश इस पत्रकार ने आज 1992 के बाद यानि लगभग 34 वर्षों के बाद आकाशवाणी रीवा का मुआयना किया तो स्थिति भयावह नजर आयी। ऐसा लग रहा है कि यह स्टेशन देश के अनेक स्टेशनों की तर्ज पर बस दम तोड़ने ही वाला है !
गौरतलब है कि वर्ष 2014 में केन्द्र में सत्ता परिवर्तन के बाद आकाशवाणी में सकारात्मक विकास के संकेत मिले थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में ” मन की बात ” कार्यक्रम ने आकाशवाणी परिवार के अंदर भी विकास और विस्तार को लेकर भरोसे की एक नई उम्मीद विकसित की थी। मन की बात ने निर्विवाद रूप से देश में रेडियो को फिर से जिंदा किया और इसकी लोकप्रियता जनसंचारीय सीमा को भी लांघने में सफल रही। रेडियो ने इस मामले में आधुनिक जनसंचार के हर उपकरण का सदुपयोग किया। ऐसा लगा कि सरकारी रेडियो का सकारात्मक रूप से कायाकल्प हो जाएगा। लेकिन संगठनात्मक रूप से आकाशवाणी का वह विकास नहीं हो पाया जिसकी आकाशवाणी परिवार और आम श्रोताओं को अपेक्षा थी। परिणाम यह हुआ कि मन की बात कार्यक्रम तो लोकप्रियता में आगे निकल गया लेकिन आकाशवाणी स्वयं सांगठनिक विकास के मामले में पिछड़ गयी !
एक विरोधाभास यह भी है कि जहां देश भर में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में अनुबंध पर लोग वर्षों से मासिक सैलरी उठा रहे हैं, वहीं आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों में कैजुअल उद्घोषक और अन्य कैजुअल स्टाफ महीने में आज भी अधिकतम सिर्फ छह दिन की ड्यूटी कर रहे हैं। यह समानता के अधिकार का भी उल्लंघन है।
एक आंकड़े के अनुसार, तकरीबन हर राज्य में आकाशवाणी के केन्द्र उलटी दिशा में विकसित हो रहे हैं जो इस क्षेत्र में भविष्य के लिए खतरे का संकेत है। इस क्षेत्र के विशेषज्ञों ने इन तमाम मामलों में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में उच्च स्तर से हस्तक्षेप की मांग की है।













