सरकार किसी की हो, हालात में सुधार नहीं !
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस सिर्फ औपचारिकता !
हरेन्द्र प्रताप सिंह
भारत में समय-समय पर केंद्र एवं राज्य में सरकार बदल जाती है लेकिन नहीं बदलती है तो लाखों कामकाजी महिलाओं की तकदीर और तस्वीर ! उनके लिए निर्धारित मुफ्त सरकारी सुविधाएं और अन्य सुविधाएं भी उन्हें अनेक बार तिरस्कृत भाव से दी जाती हैं। इसका अनोखा उदाहरण है डी टी सी बस में मुफ्त यात्रा सुविधा और मेटरनिटी लीव !
सरकार किसी भी राजनीतिक दल की हो, गरीब और मध्यम वर्ग की कामकाजी महिलाओं का मानसिक, आर्थिक और शारीरिक शोषण निर्बाध गति से जारी रहता है। सरकारी नौकरी, अनुबंध वाली सरकारी नौकरी, प्राइवेट नौकरी तथा असंगठित क्षेत्र की नौकरी में और पीएच.डी. शोधकर्ताओं, महिला मजदूरों और घरेलू महिला वर्कर्स के साथ क्रूर व्यवहार और अशोभनीय आचरण किया जाता है। बहुत बड़ी संख्या में भारतीय महिलाएं अपना शोषण कराने के लिए विवश रहती हैं। आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर बड़ी – बड़ी घोषणाओं के बीच इस स्मरणीय दिन भी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में दिल्ली परिवहन सेवा में अनुबंध पर कार्यरत सैकड़ों महिलाएं अपना शोषण कराने के लिए मजबूर हैं। उनके लिए स्थाई नौकरी एक दिवास्वप्न की तरह है।
पिछले कुछ दशकों से देश में सरकारी और निजी क्षेत्र के मेलजोल से लाखों नौकरियों का इस तरह से सृजन किया गया है कि सस्ते दर पर सफाईकर्मी, चौकीदार, एम टी एस, डाटा एंट्री ऑपरेटर, लेडी बस कंडक्टर , ड्राइवर, नर्स एवं अन्य प्राइवेट कर्मचारी बहाल हो रही हैं। इन्हें रखने और हटाने का मूल आधार यह है कि किस हद तक वे कामकाजी महिलाएं हर तरह से समझौता करने के लिए तैयार रहती हैं। उन्हें नौकरी में प्रवेश करते समय, नौकरी से हट कर फिर से नौकरी में लगते समय, किसी – किसी नौकरी में हर महीने कमिशन देने और ऑफिस से लेकर घर तक सेवा करने के लिए विवश होना पड़ता है। बड़े – बड़े सरकारी विभाग, मंत्रालय, कार्यालय के सबसे बड़े अधिकारी से लेकर सबसे छोटे कर्मचारी तक इस अतिरिक्त कमाई एवं लाभ के चेन में शामिल हैं।
शिक्षा मंत्रालय, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, एम एस एम ई मंत्रालय, रेलवे मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, डी आर डी ओ, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण दर्जनों सरकारी महकमे और ठेके पर काम कर रही निजी कंपनियां इस गोरखधंधे में शामिल हैं। यदि किसी पीड़ितy स्त्री ने दबी जुबान से भी कभी आवाज उठाई या पचास हजार रुपए या दो-तीन महीने की सैलरी तय समय पर देने में आनाकानी की तो उसे दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर फेंक दिया जाता है। यह मानसिक, शारीरिक और आर्थिक शोषण का एक ऐसा घिनौना अंडरवर्ल्ड है जिसमें डरी-सहमी स्त्रियों की संख्या लाखों में है और यह ” बंधुआ नौकरी उद्योग ” सरकार की नजरों के सामने खुल्लमखुल्ला चल रहा है।
ऐसी कामकाजी महिलाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के आयोजन, सम्मान एवं धूम – धड़ाके का कोई औचित्य नहीं है। परिवार वाली महिलाएं लाचारी में अपना हर तरीके से शोषण कराने के लिए तैयार हैं। यही कारण है कि यह व्यवसाय तेजी से पनप रहा है। पीएच. डी. में प्रवेश से लेकरy डिग्री पूरी होने तक की अंतर्कथा गाइड प्रोफेसरों और व्यवस्थापक प्रोफेसरों को मालामाल कर रही हैं। शोषक प्रोफेसरों की संख्या देश में हजारों में है। हालांकि अनुबंध पर काम करने वाली शोषित सहायक प्रोफेसरों की संख्या भी काफी है।दुखद यह है कि ईमानदार और विद्वान प्रोफेसर भी ऐसे प्रोफेसरों के कारण बदनाम समुदाय के प्रतिनिधि या सदस्य बन कर विवादास्पद हो रहे हैं या सशंकित भाव से देखें जाते हैं। नकली शोध या स्तरहीन शोध अथवा अयोग्य गाइड या शोधकर्ता का विषय तो देश में अंतहीन कथा की तरह अलग से है। काशी का संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय हो या रीवा का अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय अथवा राष्ट्रीय राजधानी का दिल्ली विश्वविद्यालय या बिहार का मुंगेर विश्वविद्यालय, ये सब तथा इनकी तरह अन्य संस्थान – संगठन महिलाओं के विभिन्न मामलों में विवादास्पद हैं।
अनुबंध आधार पर या असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को अन्य नुकसान भी उठाने पड़ते हैं। उन्हें न तो छुट्टी मिलती है और न ही बोनस ! मेडिकल सुविधा और अन्य सुविधाएं तो सपने भर दिखाती हैं। गलती से यदि कोई शादीशुदा स्त्री गर्भवती हो गई तो नियमानुसार छुट्टी से लौटने के बाद उसकी बहुत तरीके से सदा के लिए छुट्टी की जाती है।
एक अध्ययन से पता चलता है कि इस तरह की नौकरी में अविवाहित स्त्रियों को अधिक पसंद किया जाता है। अविवाहित स्त्रियों को हर तरीके से काबू करना इस नवगठित सिस्टम के लिए आसान होता है।









