अमित पांडे: संपादक
युद्धों को अक्सर नष्ट हुए शहरों, सैन्य हताहतों और भू-राजनीतिक परिणामों के आधार पर समझा जाता है। लेकिन उनके सबसे गहरे प्रभाव कई बार उन स्थानों पर दिखाई देते हैं जो युद्धभूमि से हजारों किलोमीटर दूर होते हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष—जिसमें अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है—पहली नज़र में एशिया के खेतों से दूर लगता है। परंतु वास्तविकता यह है कि आधुनिक युद्धों के पर्यावरणीय और आर्थिक प्रभाव कृषि व्यवस्था को गहराई से प्रभावित करते हैं। कृषि किसी भी अर्थव्यवस्था का वह क्षेत्र है जो सबसे अधिक प्राकृतिक परिस्थितियों—मौसम, वर्षा, तापमान और वातावरण की स्थिरता—पर निर्भर करता है। जब युद्ध इन संतुलनों को बिगाड़ता है, तो उसका असर दूर-दराज़ के कृषि क्षेत्रों तक पहुँचता है।
आधुनिक युद्ध केवल सैन्य टकराव नहीं रह गए हैं; इनमें बड़े पैमाने पर बम, मिसाइलें, युद्धक विमान और ईंधन आधारित सैन्य मशीनरी का उपयोग होता है। इससे वातावरण में भारी मात्रा में धुआँ, कार्बन उत्सर्जन और विषैले कण फैलते हैं। कई वैज्ञानिक अध्ययनों में यह बताया गया है कि सैन्य गतिविधियाँ वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान कुवैत के तेल कुओं में लगी आग इसका बड़ा उदाहरण है। उस समय जलते हुए तेल से निकलने वाले धुएँ ने पूरे क्षेत्र के वातावरण को प्रभावित किया था और कई महीनों तक सूर्य के प्रकाश को कम कर दिया था। इससे क्षेत्रीय मौसम चक्र और तापमान में बदलाव देखा गया।
कृषि उत्पादन ऐसे ही सूक्ष्म पर्यावरणीय संतुलनों पर निर्भर करता है। फसलों की वृद्धि के लिए तापमान, नमी, वर्षा और सूर्य के प्रकाश का सही संयोजन आवश्यक होता है। वातावरण में प्रदूषण बढ़ने से बादलों के निर्माण, वर्षा चक्र और तापमान के पैटर्न में परिवर्तन हो सकता है। जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान या वर्षा में थोड़ा सा भी बदलाव फसलों की उत्पादकता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। धान, गेहूँ और मक्का जैसी मुख्य खाद्यान्न फसलें विशेष रूप से मौसम की स्थिरता पर निर्भर करती हैं। यदि फूल आने या दाने बनने के समय मौसम में असामान्य परिवर्तन हो जाए, तो उत्पादन में भारी गिरावट हो सकती है।
एशिया की स्थिति इस दृष्टि से और भी संवेदनशील है। इस महाद्वीप में विश्व की आधे से अधिक आबादी रहती है, जबकि कृषि योग्य भूमि सीमित है। भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों की कृषि व्यवस्था मुख्यतः मानसून वर्षा पर आधारित है। यदि वातावरण में प्रदूषण या युद्धजनित धुएँ के कारण मानसून चक्र प्रभावित होता है, तो उसका सीधा असर खेती पर पड़ सकता है। कई पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि वायुमंडल में एरोसोल और प्रदूषण की वृद्धि मानसून के स्वरूप को बदल सकती है, जिससे वर्षा का वितरण असमान हो सकता है।
युद्ध का प्रभाव केवल मौसम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह कृषि से जुड़ी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को भी प्रभावित करता है। आधुनिक खेती ऊर्जा, उर्वरकों और परिवहन पर निर्भर करती है। पश्चिम एशिया विश्व ऊर्जा बाजार का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। यदि इस क्षेत्र में युद्ध के कारण तेल की आपूर्ति बाधित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ जाती हैं। इसका सीधा असर किसानों पर पड़ता है, क्योंकि सिंचाई, ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और उर्वरक उत्पादन सभी ऊर्जा पर निर्भर हैं।
कृषि अर्थशास्त्रियों के अनुसार उर्वरकों की कीमतें विशेष रूप से ऊर्जा बाजार से जुड़ी होती हैं। नाइट्रोजन उर्वरक बनाने में प्राकृतिक गैस का उपयोग होता है। इसलिए जब तेल और गैस की कीमतें बढ़ती हैं, तो उर्वरकों की लागत भी बढ़ जाती है। इससे खेती की लागत बढ़ती है और छोटे किसानों पर आर्थिक दबाव बढ़ जाता है।
एक और वैज्ञानिक चिंता वातावरण में फैलने वाले कणों से जुड़ी है। बड़े पैमाने पर विस्फोट और आग से निकलने वाला धुआँ सूर्य के प्रकाश को धरती तक पहुँचने से रोक सकता है। सूर्य का प्रकाश पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के लिए आवश्यक होता है। यदि यह प्रक्रिया बाधित होती है, तो पौधों की वृद्धि धीमी हो सकती है और उत्पादन घट सकता है। खाड़ी युद्ध के बाद हुए कई अध्ययनों में पाया गया था कि धुएँ और कालिख के कारण सूर्य की किरणें कम हो गई थीं, जिससे पर्यावरण और कृषि दोनों प्रभावित हुए।
हालाँकि आधुनिक कृषि तकनीक—जैसे उन्नत बीज, सिंचाई व्यवस्था और उर्वरक—उत्पादन बढ़ाने में मदद करती हैं, लेकिन वे प्राकृतिक मौसम चक्र का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकतीं। प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक और नोबेल पुरस्कार विजेता नॉर्मन बोरलॉग ने एक बार कहा था कि “प्रयोगशाला में वर्षा नहीं बनाई जा सकती और न ही प्रकृति के मौसम चक्र को पूरी तरह बदला जा सकता है।” यह कथन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि कृषि अंततः प्रकृति के साथ एक साझेदारी है।
एशिया के किसानों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि वे पहले से ही जलवायु परिवर्तन, अनिश्चित मानसून और मिट्टी की उर्वरता में गिरावट जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। यदि वैश्विक संघर्षों के कारण वातावरण और ऊर्जा बाजार दोनों अस्थिर हो जाते हैं, तो कृषि व्यवस्था पर दोहरा संकट आ सकता है—एक पर्यावरणीय और दूसरा आर्थिक।
इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारों को ऐसे अप्रत्यक्ष प्रभावों के लिए तैयारी करनी चाहिए। उर्वरकों का रणनीतिक भंडार, बेहतर मौसम पूर्वानुमान प्रणाली और कृषि के लिए वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत कुछ हद तक जोखिम को कम कर सकते हैं। लेकिन अंततः यह समस्या केवल तकनीकी समाधान से हल नहीं हो सकती, क्योंकि कृषि की मूलभूत निर्भरता प्रकृति और मौसम पर ही रहती है।
युद्ध की त्रासदी यही है कि उसका प्रभाव केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं रहता। जब पश्चिम एशिया के आसमान में बम गिरते हैं, तो उनके पर्यावरणीय और आर्थिक प्रभाव हजारों किलोमीटर दूर एशिया के खेतों तक पहुँच जाते हैं। इस परस्पर जुड़े हुए विश्व में यदि एक क्षेत्र का वातावरण युद्ध से प्रभावित होता है, तो दूसरे क्षेत्र की मिट्टी भी उसके प्रभाव से अछूती नहीं रह सकती।









