मेरे चाचा विद्याधर उपाध्याय ने स्वाधीनता पूर्व मैट्रिक, आईए, बीए-सभी की जाली डिग्री ली थी तथा बेसिक हाई स्कूल अगियांव के प्रधानाध्यापक भी बन गये थे। कभी क्लास में नहीं पढ़ाया। शिक्षा विभाग के अधिकारियों के यहां फल, सब्जी पहुँचाया करते थे जिनमें अधिकांश अपने गाँव के खेत, बगीचों से सूर्योदय पूर्व चोरी कर लाते थे। अपना नाम ‘विद्याधर’ जीवन भर नहीं लिख सके। कई प्रकार से लिखते थे-बिदाधर, बिद्दाधर, बिदेधर, बीदाधर आदि।
पटना विश्वविद्यालय के कुलपति महेन्द्र प्रताप तथा उनके एजेंट बागेश्वरी नाथ सहाय पेपर लीक करने का धन्धा चला रहे थे। उसका विरोध करने गया तो वे मौन व्रत पर बैठ गये। मुझे सभी पत्रकारों को जबाब देना पड़ा। महेन्द्र प्रताप के अनुसार उसी रात बीबीसी तथा पेकिंग रेडियो के हिन्दी समाचार में मेरा कथन सुनाया गया था। इन लोगों ने ४ वर्ष राष्ट्रीय छात्रवृत्ति मिलने के बाद मेरा मैट्रिक परीक्षाफल रद्द करवा दिया। पर प्रोविजनल प्रमाण पत्र के आधार पर प्री विज्ञान, बीएससी-१, तथा बीएससी-२ में उसी विश्वविद्यालय में प्रवेश हो चुका था। इसके विश्वव्यापी प्रचार के कारण मेरे एक पोस्टकार्ड पर अनुरोध करने पर केवल +२ मार्कशीट के आधार पर १९७३ में भारतीय वन सेवा में बैठने की अनुमति दी थी, जिसकी लिखित परीक्षा में मैं प्रथम हुआ था।
किन्तु बीएससी में फेल होने के कारण हर इन्टरव्यू में मुझे सबसे कम अंक मिलता था-मेरे रिजल्ट को जाली मानते थे। किन्तु नियुक्ति के लिए मैट्रिक प्रमाण पत्र आवश्यक था। बिहार माध्यमिक विद्यालय परीक्षा समिति के क्लर्कों ने तो मेरा काम कर दिया था, पर उयके चेयरमैन वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शे. च. हंसदा बिना ५० रुपये घूस के काम करने पर तैयार नहीं थे। उनके क्लर्कों ने कहा भी कि ४०,००० जाली प्रमाण पत्र के लिए उनका ५० रुपए रेट था, किन्तु मेरा प्रमाण पत्र असली था। मेरे संघर्ष तथा पंचायती राज मन्त्री श्री श्यामाचरण तुबिद की डांट से उनका स्टेनो तथा अन्य अधिकारी बहुत प्रभावित हुए तथा उनके विरुद्ध कई कागजात दिये जो मुझे समझ में नहीं आया। स्टेनो ने उनके बेटे की छात्रवृत्ति के लिए बनवाया जाली आय प्रमाण पत्र दिया था।
हंसदा का सचिव स्तर का मासिक वेतन ३,००० रुपए था पर तहसीलदार से अपनी वार्षिक आय २,७०० का प्रमाण पत्र बनवाया था। यह प्रमाण पत्र लेकर निकट के बुद्ध मार्ग थाना में गया। एक वृद्ध सब इंस्पेक्टर बहुत प्रसन्न हुए तथा कह कि इतना पक्का केस जीवन में कभी नहीं देखा था, पर वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के विरुद्ध केस करना उनके लिए सम्भव नहीं है। अतः उसकी बहुत सी फोटो प्रति (उस समय इसके लिए बड़ा कैमरा होता था) बना कर बिहार तथा भारत सरकार को भेजा था। मैंने पढ़ा भी नहीं तथा दस्तखत कर दिया था। पता नहीं इस केस में जेल गये, या ४०,००० जाली प्रमाण पत्र केस में। पर उनके जेल जाने के बाद ही १९७५ में मुझे मैट्रिक प्रमाण पत्र मिला-परीक्षा के ९ वर्ष बाद। वर्त्तमान स्थिति में जीवन भर नहीं मिलता।









