अमित पांडे: संपादक
असम विधानसभा चुनावों से पहले मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने राजनीतिक बहस को और तीखा बना दिया है। कांग्रेस ने दावा किया है कि उनकी पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा के पास तीन विदेशी पासपोर्ट हैं और विदेशों में अघोषित संपत्ति है, जिनका उल्लेख चुनावी हलफनामे में नहीं किया गया। पार्टी ने यह भी आरोप लगाया कि सरमा परिवार की संपत्ति का मूल्य हजारों करोड़ रुपये तक हो सकता है। इन आरोपों को लेकर कांग्रेस ने चुनाव आयोग से जांच की मांग की है और इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ छेड़छाड़ बताया है।
हिमंत ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे “घटिया डिजिटल मैनिपुलेशन” कहा और कांग्रेस नेताओं के खिलाफ मानहानि का केस दर्ज करने की घोषणा की। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि “उसे अच्छे से ठीक करूंगा” और राहुल गांधी व गौरव गोगोई को “पप्पू” और “छोटा पप्पू” कहकर चुनौती दी कि उन्हें गिरफ्तार करने के लिए “दूसरा जन्म लेना पड़ेगा।” यह बयान उनके आक्रामक प्रचार शैली और नैरेटिव सेटिंग की क्षमता को दर्शाता है। हिमंत का अंदाज हमेशा से यही रहा है—विपक्ष पर हमला, खुद को राष्ट्रवादी एजेंडे का वाहक बताना और आरोपों को प्रोपेगेंडा करार देना।
कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा ने चुनाव आयोग का दुरुपयोग कर विपक्षी उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित कराया। इससे आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि भाजपा का नया मॉडल संस्थागत नियंत्रण और नैरेटिव मैनेजमेंट पर आधारित है—जहां भ्रष्टाचार के आरोपों को “प्रोपेगेंडा” कहकर खारिज कर दिया जाता है और मीडिया नैरेटिव को आक्रामक बयानों से सेट किया जाता है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि “यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है, जब सत्ता में बैठे लोग खुद को कानून से ऊपर मानने लगते हैं।”
भाजपा की चुनावी मशीनरी में अमित शाह की भूमिका अहम मानी जाती है। विपक्ष का मानना है कि असम में भी वही “बिहार स्टाइल कैंप” होगा, जहां शाह बीस दिन तक रहकर चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। सवाल यह है कि क्या मंत्रालय और प्रशासन भी अब पीएमओ की तरह ठेकेदारी प्रणाली पर चल रहे हैं, जहां असली फैसले दिल्ली से होते हैं और राज्य नेतृत्व केवल नैरेटिव सेट करने का काम करता है। यह मॉडल भाजपा के लिए नया सामान्य बन गया है—जहां भ्रष्टाचार के आरोपों का असर सीमित हो जाता है क्योंकि पार्टी उन्हें आक्रामक प्रचार और संस्थागत शक्ति से दबा देती है।
आर्थिक और सामाजिक आंकड़े भी इस बहस को गहराते हैं। असम में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से ऊपर है, महिला श्रम भागीदारी दर बेहद कम है और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति कमजोर है। शिक्षा में नामांकन बढ़ा है लेकिन गुणवत्ता और रोजगार से जुड़ाव कमजोर है। ऐसे में जब विकास का असर लोगों की जिंदगी में नहीं दिखता, तो चुनावी रणनीति पहचान, राष्ट्रवाद और विपक्ष पर हमले पर केंद्रित हो जाती है। यही कारण है कि भाजपा का नैरेटिव अक्सर भ्रष्टाचार के आरोपों को दबा देता है और जनता का ध्यान सुरक्षा, पहचान और राष्ट्रवादी मुद्दों की ओर मोड़ देता है।
हिमंत का अंदाज यही है कि वे विपक्ष को “पाकिस्तानी एजेंट” और “भ्रष्ट” कहने से नहीं चूकते। यह भाषा उनके समर्थकों को संगठित करती है और विपक्ष को रक्षात्मक स्थिति में डाल देती है। कांग्रेस के पास आरोप हैं, लेकिन उनके पास उतना मजबूत संगठन और नैरेटिव नहीं है। यही वजह है कि आरोप “गले में अटक” जाते हैं और चुनावी असर सीमित रह जाता है।
असम चुनाव इस बात की परीक्षा है कि क्या जनता इन आरोपों को गंभीरता से लेगी या भाजपा का नैरेटिव ही हावी रहेगा। अगर भ्रष्टाचार के आरोपों का असर नहीं होता और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठते रहते हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। भाजपा का नया सामान्य यही है—विकास के दावे, आक्रामक प्रचार, संस्थागत नियंत्रण और विपक्ष पर हमले। असम में यह मॉडल पूरी तरह परखा जाएगा।













