अमित पांडे: संपादक
पश्चिम बंगाल में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया ने भारतीय लोकतंत्र के सामने एक गहरी बहस खड़ी कर दी है। लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, जिनमें से 27 लाख से अधिक को अंतिम रूप से अयोग्य घोषित किया गया। यह केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनती दिख रही है। सबसे अधिक असर मुस्लिम बहुल जिलों जैसे मुर्शिदाबाद और मालदा में पड़ा है, जहां लाखों नाम काटे गए। महिलाओं की हिस्सेदारी भी असमान रूप से अधिक है। यह सवाल उठता है कि क्या भाजपा का बंगाल विजय मॉडल वास्तव में विकास पर आधारित है या यह मतदाता सूचियों की राजनीति पर टिका है।
भाजपा का दावा है कि वह विकास की राजनीति करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार कहा है कि 50 हजार करोड़ से कम की परियोजना कहीं नहीं दी जाती। आंकड़ों में देखें तो केंद्र सरकार ने बंगाल को कई योजनाओं के लिए धन आवंटित किया है—प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत, जल जीवन मिशन और डिजिटल इंडिया जैसी योजनाएं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बंगाल के ग्रामीण इलाकों में सड़कें अधूरी हैं, स्वास्थ्य सेवाएं कमजोर हैं, और रोजगार का संकट बना हुआ है। राष्ट्रीय स्तर पर भी यही विरोधाभास दिखता है—GDP वृद्धि दर 6% से ऊपर बताई जाती है, लेकिन बेरोजगारी दर 7.5% के आसपास है। महिला श्रम भागीदारी दर 23% से भी कम है, और ग्रामीण मजदूरी स्थिर है।
तो सवाल उठता है कि जब विकास का दावा इतना बड़ा है, तो भाजपा विपक्ष पर हमलावर क्यों है? इसका उत्तर बंगाल की राजनीति में छिपा है। बंगाल में भाजपा का मुख्य लक्ष्य ममता बनर्जी को कमजोर करना है। लेकिन ममता ने अपने सामाजिक आधार को महिलाओं, मुसलमानों और वंचित समुदायों में मजबूत किया है। यही वे समूह हैं जिनके नाम SIR में सबसे अधिक हटाए गए हैं। आंकड़े बताते हैं कि मुर्शिदाबाद में 11 लाख से अधिक नामों में से 4.5 लाख हटाए गए, जबकि झारग्राम में केवल 1,240। यह असमानता संयोग नहीं लगती।
भाजपा का बंगाल विजय मॉडल इस प्रकार दो हिस्सों में बंटा दिखता है। पहला, विकास का बड़ा दावा—बड़े-बड़े आंकड़े, योजनाओं की घोषणाएं, और राष्ट्रीय स्तर पर “सबका साथ, सबका विकास” का नारा। दूसरा, विपक्ष को कमजोर करने की रणनीति—मतदाता सूचियों की सफाई, विपक्षी नेताओं पर हमले, और संस्थागत नियंत्रण। लेकिन जब विकास जमीन पर नहीं दिखता, तो मतदाता सूचियों की राजनीति ही असली हथियार बन जाती है।
यहां एक और विरोधाभास है। भाजपा केंद्र में विदेशी नीति से लेकर सामाजिक नीति तक अपनी उपलब्धियों का बखान करती है। G20 की अध्यक्षता, डिजिटल इंडिया, और रक्षा बजट में बढ़ोतरी को उपलब्धि बताया जाता है। लेकिन बंगाल में चुनावी रणनीति विकास से हटकर पहचान और मतदाता अधिकारों पर केंद्रित हो जाती है। यही कारण है कि विपक्ष का आरोप है कि भाजपा लोकतंत्र को कमजोर कर रही है।
ममता बनर्जी ने इसे चुनावी मुद्दा बना दिया है। उन्होंने कहा है कि 27 लाख से अधिक मतदाताओं को हटाया गया है और उनकी पार्टी उन्हें कानूनी सहायता देगी। यह सीधे-सीधे भाजपा के मॉडल को चुनौती है—अगर विकास ही असली मुद्दा होता, तो मतदाता सूचियों की सफाई इतनी बड़ी खबर नहीं बनती। ममता ने यह भी कहा कि मुसलमानों, मतुआ समुदाय और राजबंशियों को निशाना बनाया गया है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा का बंगाल विजय मॉडल वास्तव में विकास पर आधारित है या यह केवल संस्थागत शक्ति और मतदाता सूचियों की राजनीति पर टिका है। आंकड़े बताते हैं कि विकास के दावे बड़े हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कमजोर है। और जब विकास का असर लोगों की जिंदगी में नहीं दिखता, तो चुनावी रणनीति पहचान और अधिकारों पर केंद्रित हो जाती है।
आर्थिक आंकड़े भी इस विरोधाभास को उजागर करते हैं। भारत में प्रति व्यक्ति आय 2,500 डॉलर से अधिक बताई जाती है, लेकिन ग्रामीण परिवारों की औसत मासिक आय 10,000 रुपये से कम है। शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात 27% है, लेकिन गुणवत्ता और रोजगार से जुड़ाव कमजोर है। स्वास्थ्य पर खर्च GDP का केवल 2.1% है, जबकि OECD देशों में यह औसतन 8% है। ऐसे में विकास के दावे केवल आंकड़ों में रह जाते हैं, जमीन पर असर नहीं दिखता।
इसलिए बंगाल का चुनाव केवल सत्ता का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता की परीक्षा भी है। अगर विकास के दावे जमीन पर नहीं उतरते और मतदाता अधिकारों को ही हथियार बना लिया जाता है, तो यह मॉडल न केवल बंगाल बल्कि पूरे देश के लिए खतरनाक संकेत है। भाजपा का बंगाल विजय मॉडल इस विरोधाभास का प्रतीक है—विकास का दावा और अधिकारों का क्षरण। यही असली बहस है, और यही वह सवाल है जिसे जनता को तय करना होगा।













