सुप्रीम कोर्ट ने आर्केस्ट्रा, डांस बार, मसाज पार्लर, नौटंकी और स्पा जैसे संस्थानों में बच्चों, विशेषकर नाबालिग लड़कियों को काम पर रखे जाने को “अत्यंत गंभीर मुद्दा” करार देते हुए केंद्र सरकार, श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, विधि एवं न्याय मंत्रालय, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) को नोटिस जारी किया है। प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने यह नोटिस जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) की एक जनहित याचिका पर जारी किया। याचिका में बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 की उस विधायी चूक को चुनौती दी गई है, जिसके कारण ऐसे व्यवसाय अधिनियम की अनुसूची के भाग-ए में दर्ज “खतरनाक व्यवसायों एवं प्रक्रियाओं” की सूची से बाहर हैं। बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के 250 से भी ज्यादा सहयोगी हैं।
याचिका में इस मुद्दे की गंभीरता और व्यापकता पर बल देते हुए कहा गया है कि कानून में मौजूदा इस खामी का फायदा उठाकर संगठित ट्रैफिकिंग गिरोह ऐसे संस्थानों में बच्चों, खासकर 18 साल से कम की लड़कियों के यौन शोषण, बंधुआ मजदूरी और उत्पीड़न कर रहे हैं। जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन ने मांग की है कि मसाज पार्लरों, आर्केस्ट्रा, डांस बार, डांस ट्रूप, स्पा और इसी तरह के अन्य संस्थानों को अधिनियम की अनुसूची के भाग-बी से हटाकर भाग-ए में शामिल किया जाए। ताकि इन क्षेत्रों में बाल श्रम पर पूर्ण और कठोर प्रतिबंध सुनिश्चित हो सके।
जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की जनरल काउंसेल रचना त्यागी ने कहा, “आज का दिन बाल संरक्षण तंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे संस्थान बच्चों का रोजगार के नाम पर केवल शोषण ही नहीं बल्कि ट्रैफिकिंग, यौन उत्पीड़न और संगठित अपराध के प्रवेश द्वार भी हैं। हमें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप कमजोर और असुरक्षित बच्चों की सुरक्षा को मजबूत करेगा और कानून की उन खामियों को दूर करेगा, जो अब तक उन्हें बड़े खतरे में डालती रही हैं।”
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी अनुरोध किया कि एनसीपीसीआर को ऐसे संस्थनों में काम करते पाए गए बच्चों के बचाव, पुनर्वास और उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए एक मानक कार्यप्रणाली (एसओपी) बनाने का आदेश दिया जाए। जनहित याचिका में इस बात पर जोर दिया है कि कानून में मौजूद इन विधायी गैप्स का फायदा उठाकर ट्रैफिकर बच्चों के संगठित शोषण को सामान्य नौकरी का रूप देकर छिपाते हैं। इसलिए बचाए गए बच्चों पर फिर से ट्रैफिकिंग के जाल में फंसने खतरा बना रहता है।
जनहित याचिका में बताया गया है, “दिसंबर 2025 से अब तक याचिकाकर्ता और उसके सहयोगी संगठनों ने लगातार 11 छापेमारी अभियान चलाए, जिनमें से नौ आर्केस्ट्रा और दो मसाज पार्लर शामिल हैं। इन अभियानों में आर्केस्ट्रा से 85 और मसाज पार्लरों से पांच, यानी कुल 90 नाबालिगों को मुक्त कराया गया।”
याचिका में यह भी कहा गया कि मार्च 2025 से मई 2026 के बीच जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन और उसके सहयोगी संगठनों ने बिहार, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और दिल्ली में पुलिस और प्रशासन के साथ मिलकर आर्केस्ट्रा से 212 और मसाज पार्लरों व स्पा से 12 नाबालिगों को मुक्त कराया। इस तरह इन राज्यों में कुल 224 बच्चों को शोषण के चंगुल से निकालकर मुक्त कराया गया।













