अमित पांडे: संपादक
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, जिसे महामना मदन मोहन मालवीय ने दान और परोपकार की नींव पर मानवता का मंदिर बनाकर खड़ा किया था, आज राजनीति और सौदेबाज़ी के जाल में उलझा हुआ है। गंगा और वरुणा के तट पर खड़ा यह संस्थान कभी स्वतंत्रता आंदोलन का पालना था, जहाँ वैदिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का संगम होता था। आज वही विश्वविद्यालय अपनी ज़मीनें दान कर रहा है—कभी चौधरी लॉन, कभी ट्रॉमा सेंटर, और अब गोडौलिया—मानो शिक्षा और परंपरा की धरोहर प्रशासनिक सुविधा के नाम पर नीलाम हो रही हो। सवाल उठता है कि विश्वविद्यालय की ज़मीन और संकाय कभी “अतिरिक्त” नहीं होते, तो फिर बार-बार यह संपत्ति क्यों छोड़ी जा रही है?
रजिस्ट्रार की नियुक्ति में भी यही राजनीति झलकती है। प्रो. रंजन श्रीवास्तव को बारहवें स्थान पर रहते हुए चुना गया, जबकि नियम केवल सात नामों की अनुमति देता था। यह नियुक्ति न केवल विधिक रूप से गलत है बल्कि संस्थागत ईमानदारी पर भी प्रश्नचिह्न है। पहले आईआईटी-बीएचयू में कार्यवाहक रजिस्ट्रार रहते हुए उन पर नियुक्तियों में गड़बड़ी के आरोप लगे थे और हटाए भी गए थे, लेकिन बीएचयू प्रशासन ने इन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया। यह चयन सामाजिक प्रतिनिधित्व की भी अनदेखी है। ओबीसी और दलित समुदायों की हिस्सेदारी को दरकिनार कर फिर एक सवर्ण प्रभुत्व को मज़बूत किया गया।
प्रो. एम.पी. सिंह, पूर्व विधि संकाय सदस्य, का दर्द और गहरा है। उनका कहना है कि महामना का सपना था कि शिक्षा परंपरा और आधुनिकता का संगम बने, लेकिन आज यह सपना राजनीति और पूँजीवाद की भेंट चढ़ रहा है। वे बताते हैं कि इतिहास की किताबों में अब यह पढ़ाया जा रहा है कि राणा प्रताप ने अकबर को हराया, या कुतुबमीनार हिन्दू और जैन मंदिरों की नींव पर बनी। यह सब शिक्षा की अकादमिक भावना को तोड़कर उसे विचारधारा का औज़ार बना रहा है।
ट्रॉमा सेंटर को सर सुंदरलाल अस्पताल में मिलाने का प्रस्ताव भी इसी प्रवृत्ति का हिस्सा है। यह वही ट्रॉमा सेंटर है जिसे पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने स्वतंत्र इकाई के रूप में स्थापित किया था। अब इसे एक विभागीय निदेशक के अधीन कर देना कानूनी और नैतिक दोनों दृष्टि से गलत है। इसी तरह महात्मा पंडित मदन मोहन मालवीय कैंसर सेंटर अब टाटा मेमोरियल कैंसर के हाथों में है, जो निजी संस्था होते हुए भी बीएचयू की ज़मीन पर काम कर रही है।
विश्वविद्यालय की गोशाला तक को नहीं बख्शा गया। गायों की संख्या घटा दी गई, और गोबर-गोमूत्र पर होने वाले शोध को किनारे कर दिया गया। सौंदर्यीकरण के नाम पर सैकड़ों साल पुराने पेड़ काट दिए गए, प्रदूषण बढ़ा और ताज़ी हवा घट गई। यह सब उस संस्थान में हो रहा है जिसे कभी परंपरा और आधुनिकता के संतुलन का प्रतीक माना जाता था।
स्थानीय लोग अस्सी, लंका और संकटकमोचन के अड्डों पर बैठकर पूछते हैं कि विश्वविद्यालय पढ़ने-लिखने और शोध करने के बजाय राजनीति का अड्डा क्यों बन गया है। गोडौलिया की ज़मीन पार्किंग के लिए दान कर दी गई, लेकिन क्या विश्वविद्यालय को कोई लाभ मिला? क्या छात्रों और शिक्षकों को मुफ्त सुविधा मिलेगी या यह केवल एकतरफ़ा सौंपा गया? यही हाल नरिया की ज़मीन का हुआ जहाँ शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान बना, लेकिन विश्वविद्यालय को कोई फायदा नहीं मिला।
यह सब उस दर्शन के विपरीत है जिसे महामना ने गढ़ा था। उनका सपना था कि जब शासन और राजनीति अपनी नैतिकता खो दें तो विश्वविद्यालय समाज को मार्ग दिखाए। लेकिन आज बीएचयू मार्गदर्शक नहीं, अनुयायी बन गया है। शिक्षा का मंदिर अब राजनीति का विस्तार बन गया है।
सच्चाई यह है कि संस्थान धीरे-धीरे अपनी आत्मा खो रहा है। कभी शिमला की हवेली, कभी बरकच्छा की ज़मीन, कभी रामापुरा की हवेली, कभी रेवाकोटी का छात्रावास—सब बिकते चले गए। गोडौलिया की ज़मीन इस लंबे नाटक का नया अध्याय है। राष्ट्रीय परीक्षाएँ जैसे नीट और एनटीए अब पैसे कमाने के साधन बन गए हैं। वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों की जगह ठेकेदार और राजनेता परिषदों में बैठे हैं।
प्रो. एम.पी. सिंह का कहना है कि जब विश्वविद्यालय ही अपनी आत्मा बेच देंगे तो समाज को मार्ग कौन दिखाएगा? जब शिक्षा ही सौदेबाज़ी बन जाएगी तो नागरिकता, सुधार और परिवर्तन का पाठ कौन पढ़ाएगा? उनका दर्द इस बात से है कि बीएचयू अब सरकार की छवि चमकाने में अधिक व्यस्त है, बजाय इसके कि वह अपनी धरोहर और अकादमिक गरिमा की रक्षा करे।
अगर यही क्रम चलता रहा तो काशी का यह मंदिर याद किया जाएगा, लेकिन ज्ञान और संस्कृति के केंद्र के रूप में नहीं—बल्कि उस संस्थान के रूप में जिसने खुद को टुकड़ों-टुकड़ों में बेच दिया, जब तक कि केवल उसकी स्मृति ही शेष रह गई।







