नई दिल्ली: देश के पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSU) और जल शक्ति मंत्रालय के गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के एक बड़े खुलासे के बाद सरकारी कंपनियों में चल रहे संगठित और व्यवस्थित भ्रष्टाचार (Systematic Corruption) का भंडाफोड़ हुआ है। WAPCOS लिमिटेड और NPCC द्वारा मामलों को सीधे सीबीआई (CBI) को सौंपे जाने के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि यह महज कुछ अधिकारियों की व्यक्तिगत वित्तीय हेरफेर नहीं, बल्कि अरबों रुपये के प्रोजेक्ट्स को हथियाने का एक समानांतर सिंडिकेट है।
टर्नओवर का फर्जीवाड़ा और रिश्वत के पक्के सबूत: कैसे काम करता था सिंडिकेट?
विजिलेंस सर्किल और जांच से जुड़े आधिकारिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे घोटाले का पैटर्न बेहद शातिराना है। संवेदनशील सरकारी प्रोजेक्ट्स और टेंडर्स में हिस्सा लेने के लिए चुनिंदा प्राइवेट कंपनियों के टर्नओवर को कागजों पर कृत्रिम रूप से (Artificially) बढ़ाकर दिखाया जाता था, ताकि वे तकनीकी रूप से पात्रता (Eligibility) हासिल कर सकें।
इसके बाद, इनपुट्स बताते हैं कि अंदरूनी अधिकारियों की मिलीभगत और दस्तावेजी हेरफेर (Document Forgery) के जरिए प्रतिस्पर्धी बोलियों को दरकिनार कर दिया जाता था और पहले से तय ‘खास’ खिलाड़ियों को ही बार-बार लाभ पहुंचाया जाता था। इस पूरे खेल में रिश्वत मांगे जाने के पुख्ता ऑडियो और डिजिटल रिकॉर्डेड सबूत भी एजेंसियों के हाथ लगे हैं, जो यह साबित करते हैं कि यह कोई इकलौती घटना (Isolated Incident) नहीं बल्कि एक सुनियोजित नेक्सस है।
रडार पर आए कई बड़े नाम: टॉप पदों की रेस और रसूख का खेल
सीबीआई और विजिलेंस की इस संयुक्त घेरेबंदी में पहले से ही आर के अग्रवाल, संजय शर्मा और धर्मेंद्र मुद्गल जांच का सामना कर रहे हैं। लेकिन हालिया विजिलेंस इनपुट्स के मुताबिक, अब जांच का दायरा तेजी से बढ़ते हुए सीमा शर्मा, मनोरंजन पाही, संजय बोहिदार, दीपांक अग्रवाल, रजत जैन, दीपक लखनपाल और अमिताभ त्रिपाठी तक पहुंच गया है।
इसी कड़ी में एक बेहद रसूखदार नाम प्रदीप कुमार का भी उभरकर सामने आया है, जो कथित तौर पर इस समय पीएसयू में शीर्ष पदों (Top Bureaucratic Posts) की दौड़ में शामिल बताए जा रहे हैं। चर्चाएं यह भी हैं कि प्रदीप कुमार और इस सिंडिकेट के एक अन्य संदिग्ध सुमिर चावला के संबंध प्रशासनिक हलकों में बेहद मजबूत हैं, जिसके कारण अब तक इनके खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई से बचा जाता रहा। हालांकि, सीबीआई की एंट्री के बाद अब इन रसूखदारों की मुश्किलें बढ़ना तय माना जा रहा है।
‘फिक्सर इकोसिस्टम’ की पहचान: खेल प्राधिकरण से लेकर पुरातत्व विभाग तक फैलीं जड़ें
जांच का सबसे गंभीर पहलू वह ‘फिक्सर नेटवर्क’ है जो पर्दे के पीछे रहकर अधिकारियों, बिचौलियों और निजी ठेकेदारों के बीच एक लिंक चैनल (मध्यस्थ) के रूप में काम करता था। इस इंटरमीडियरी नेटवर्क में सुमिर चावला का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है, जो कथित तौर पर बड़े प्रोजेक्ट्स में “फैसिलिटेशन” और अनौपचारिक प्रभाव के नाम पर मोटी रकम की डीलिंग्स को अंजाम देता था।
इस सिंडिकेट की जड़ें केवल जल शक्ति मंत्रालय तक ही सीमित नहीं हैं। सूत्रों के मुताबिक, अब उन सभी कॉन्ट्रैक्ट्स की फाइलें खंगाली जा रही हैं जो स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI), आयुष मंत्रालय (AYUSH), ओडिशा के खेल प्रोजेक्ट्स, हरियाणा की राज्य यूनिवर्सिटीज और आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) से जुड़े हुए हैं। इन सभी संस्थानों में सीमित ठेकेदारों को बार-बार टेंडर अलॉट किए जाने का एक ही जैसा सस्पेक्टेड पैटर्न देखने को मिला है।






