भारत की आर्थिक स्थिति आज उस मुकाम पर है जहाँ चमकदार नारों और “विकसित भारत” के दावों के पीछे गहरी दरारें साफ़ दिख रही हैं। महँगाई लगातार बढ़ रही है, पूँजी का पलायन तेज़ है, उत्पादन संकट गहराता जा रहा है और बैंकिंग घोटाले आम नागरिक के विश्वास को तोड़ रहे हैं। मई 2026 में सेंसेक्स छह साल का सबसे खराब प्रदर्शन करता है, विदेशी निवेशक 55,000 करोड़ से अधिक पूँजी बाहर ले जाते हैं और रुपया रिकॉर्ड स्तर पर गिरता है। यह वही परिदृश्य है जो 1991 के भुगतान संकट और 2008 की मंदी की याद दिलाता है—जब चेतावनी को नज़रअंदाज़ करने की कीमत देश ने भारी चुकाई थी।
कृषि क्षेत्र में हालात और गंभीर हैं। खाद की कीमतें दोगुनी हो चुकी हैं, ऊर्जा दरें ऊँची हैं और मध्य पूर्व में युद्ध के कारण निर्यात ठप पड़ा है। पंजाब, हरियाणा और नासिक के किसान अपनी उपज फेंकने को मजबूर हैं क्योंकि उन्हें बाज़ार नहीं मिल रहा। तेल और डीज़ल की कीमतें उनकी आय को और घटा रही हैं। यदि किसानों की गरिमा और आजीविका ही छिन जाए तो अर्थव्यवस्था का ढाँचा टिकेगा कैसे।
सरकार ने 5 जून 2026 को विदेशी निवेशकों पर कर छूट देकर उन्हें सरकारी बॉन्ड में निवेश के लिए प्रेरित करने की कोशिश की, लेकिन यह नीति असंगति का प्रतीक बन गई। 2023 में भारी कर लगाए गए थे, अब छूट दी जा रही है। चीन, जापान, कोरिया, ताइवान, ब्रिटेन और अमेरिका में कर ढाँचे स्थिर हैं, वहीं भारत की नीतियाँ बार बार बदलती हैं। यही अस्थिरता निवेशकों को सुरक्षित ठिकानों की ओर धकेल रही है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वही बड़े उद्योगपति जिन्हें सरकार ने पैकेज और रियायतें दीं, वे करदाताओं के पैसों से लाभ उठाकर विदेशों में निवेश कर रहे हैं। घरेलू बाज़ार में उनकी हिस्सेदारी नगण्य है। यह विश्वासघात न केवल सार्वजनिक बैंकों पर बोझ डालता है बल्कि रोज़गार योजनाओं को भी कमजोर करता है। जब देश को उनकी ज़रूरत है, वे चुप हैं या विदेशों में सुरक्षित ठिकाने तलाश रहे हैं।
रिज़र्व बैंक को भी ब्लूमबर्ग की आलोचना के बाद सफाई देनी पड़ी, जिससे उसकी गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगा। जब संस्थाएँ अपनी साख बचाने के लिए सड़क पर उतरें तो यह केवल आर्थिक नहीं, नैतिक संकट भी है। कमजोर मानसून की आशंका से खाद्य महँगाई और बढ़ेगी, और रोज़ाना सामने आ रहे घोटाले इस अस्थिरता को और गहरा करेंगे।
आज की स्थिति में बेरोज़गारी दर 8% से ऊपर है, शहरी युवाओं में यह और भी अधिक है। श्रम मंत्रालय के आँकड़े बताते हैं कि 2025 26 में रोज़गार सृजन की गति आधी रह गई। वहीं, IMF और विश्व बैंक की रिपोर्टें चेतावनी देती हैं कि यदि पूँजी पलायन और महँगाई पर अंकुश नहीं लगाया गया तो भारत की वृद्धि दर 5% से नीचे जा सकती है। यह उस देश के लिए गंभीर संकेत है जो खुद को विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बताता है।
सार्वजनिक बैंकों पर एनपीए का बोझ फिर बढ़ रहा है—₹7.5 लाख करोड़ से अधिक। निजी बैंकों में भरोसा डगमगा रहा है और छोटे निवेशक ही बाज़ार को चला रहे हैं। यह वही स्थिति है जो 2008 में अमेरिका में सबप्राइम संकट के दौरान बनी थी, जब आम नागरिक की पूँजी जोखिम में थी। भारत में भी यदि यही ढाँचा कायम रहा तो वित्तीय स्थिरता टूट सकती है।
भारत की समृद्धि का मुखौटा अब पिघल रहा है। यदि सरकार ने भ्रष्टाचार पर अंकुश, किसानों की सुरक्षा, कर ढाँचे की स्थिरता और उद्योगपतियों को घरेलू निवेश के लिए बाध्य करने जैसे ठोस कदम नहीं उठाए, तो देश अपनी संप्रभुता खोकर केवल दूसरों की साम्राज्यवादी पूँजी का आपूर्तिकर्ता बन जाएगा। यह समय है कि भारत अपने भाग्य का हिस्सेदार बने, न कि दूसरों के सपनों का ईंधन।












