अमित पांडे: संपादक
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुछ घटनाएं प्रतीकात्मक दिखाई देती हैं, लेकिन उनके प्रभाव दूरगामी होते हैं। यदि ईरान द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने का निमंत्रण वास्तव में भेजा गया है, तो यह केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है। यह भारत की विदेश नीति की उस जटिल संरचना की परीक्षा है जिसे नई दिल्ली पिछले एक दशक से बड़ी सावधानी से संतुलित करती रही है। प्रधानमंत्री मोदी तेहरान जाते हैं या नहीं, यह प्रश्न जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह समझना है कि भारत आखिर किस भू-राजनीतिक चौराहे पर खड़ा है।
भारत की विदेश नीति लंबे समय तक गुटनिरपेक्षता की अवधारणा से संचालित होती रही। लेकिन आज की दुनिया शीत युद्ध की दुनिया नहीं है। अब देशों को केवल दो खेमों में से किसी एक का चयन नहीं करना पड़ता, बल्कि अनेक शक्ति केंद्रों के साथ समानांतर संबंध बनाए रखने पड़ते हैं। भारत ने भी यही रणनीति अपनाई। उसने अमेरिका के साथ रक्षा और प्रौद्योगिकी साझेदारी बढ़ाई, इज़राइल के साथ सुरक्षा सहयोग को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा संबंध बनाए रखे तथा ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह और मध्य एशिया तक पहुंच की रणनीति को आगे बढ़ाया। यही बहुध्रुवीय संतुलन भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि माना गया।
लेकिन पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने इस संतुलन को अभूतपूर्व दबाव में ला दिया है। यदि प्रधानमंत्री मोदी खामेनेई के अंतिम संस्कार में स्वयं शामिल होते हैं, तो यह संदेश केवल तेहरान तक सीमित नहीं रहेगा। इसे वाशिंगटन और तेल अवीव भी ध्यान से पढ़ेंगे। अमेरिका और इज़राइल लंबे समय से ईरान को क्षेत्रीय अस्थिरता का प्रमुख स्रोत बताते रहे हैं। ऐसे समय में भारत के प्रधानमंत्री की तेहरान में उपस्थिति को केवल शोक-संवेदना के रूप में नहीं देखा जाएगा, बल्कि उसके राजनीतिक और रणनीतिक अर्थ भी निकाले जाएंगे।
दूसरी ओर यदि भारत निमंत्रण को बहुत निम्न स्तर पर स्वीकार करता है या उससे दूरी बनाता है, तो ईरान में यह धारणा मजबूत हो सकती है कि नई दिल्ली ने अपनी पश्चिम एशिया नीति को पूरी तरह अमेरिका और इज़राइल की प्राथमिकताओं के अनुरूप ढाल लिया है। यही वह कूटनीतिक दुविधा है जिसने भारत को एक कठिन स्थिति में ला खड़ा किया है।
भारत और ईरान के संबंधों का महत्व केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि सामरिक भी है। चाबहार बंदरगाह भारत की मध्य एशिया और अफगानिस्तान नीति का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। पाकिस्तान के भूभाग का उपयोग किए बिना मध्य एशिया तक पहुंचने की भारत की रणनीति ईरान पर निर्भर करती है। अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) भी भारत, रूस और ईरान को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण परियोजना है। यूक्रेन युद्ध और वैश्विक व्यापार मार्गों में बदलाव के बाद इस परियोजना का महत्व और बढ़ गया है।
यही कारण है कि भारत ईरान को केवल एक पश्चिम एशियाई देश के रूप में नहीं देखता, बल्कि उसे यूरेशियाई भू-राजनीति के प्रवेश द्वार के रूप में भी देखता है। यदि नई दिल्ली ईरान से दूरी बनाती है, तो उसकी कीमत केवल कूटनीतिक नहीं होगी, बल्कि आर्थिक और सामरिक भी होगी।
लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पिछले एक दशक में भारत और इज़राइल के संबंध अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए हैं। रक्षा तकनीक, ड्रोन, साइबर सुरक्षा, मिसाइल प्रणाली और खुफिया सहयोग के क्षेत्र में इज़राइल भारत का एक महत्वपूर्ण साझेदार बन चुका है। अमेरिका के साथ भारत की बढ़ती रणनीतिक साझेदारी ने भी इस समीकरण को और मजबूत किया है। क्वाड, इंडो-पैसिफिक रणनीति और उच्च प्रौद्योगिकी सहयोग के कारण वाशिंगटन आज नई दिल्ली का सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक साझेदार माना जाता है।
ऐसे में भारत की चुनौती केवल ईरान और इज़राइल के बीच संतुलन बनाने की नहीं है, बल्कि दो अलग-अलग भू-राजनीतिक दृष्टिकोणों के बीच संतुलन बनाने की है। एक ओर अमेरिका-इज़राइल धुरी है, दूसरी ओर रूस-ईरान की रणनीतिक निकटता है। भारत दोनों से संबंध बनाए रखना चाहता है, लेकिन दोनों धुरियों के बीच बढ़ता टकराव उसके लिए विकल्पों को सीमित कर रहा है।
इस पूरे परिदृश्य में एक और महत्वपूर्ण पहलू है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। भारत आज दो समानांतर व्यापार और संपर्क गलियारों पर काम कर रहा है। पहला है चाबहार और INSTC, जो ईरान के माध्यम से मध्य एशिया और रूस तक पहुंच प्रदान करता है। दूसरा है भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC), जिसमें भारत, यूएई, सऊदी अरब, इज़राइल और यूरोपीय देश शामिल हैं। दोनों परियोजनाएं भारत की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा हैं। लेकिन यदि पश्चिम एशिया में ध्रुवीकरण बढ़ता है, तो इन दोनों परियोजनाओं के बीच संतुलन बनाए रखना कठिन हो सकता है।
डोनाल्ड ट्रंप की वापसी ने इस समीकरण को और जटिल बना दिया है। ट्रंप प्रशासन की पहचान ही ईरान के प्रति कठोर नीति रही है। यदि भविष्य में वाशिंगटन ईरान के खिलाफ आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ाता है, तो भारत पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है। रूस से तेल खरीद को लेकर भारत पहले ही पश्चिमी आलोचनाओं का सामना कर चुका है। हालांकि नई दिल्ली ने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए अपना रुख बनाए रखा, लेकिन इससे यह स्पष्ट हो गया कि वैश्विक शक्ति राजनीति में रणनीतिक स्वायत्तता की कीमत भी चुकानी पड़ती है।
पाकिस्तान का पहलू भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यदि इस अवसर पर पाकिस्तान उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजता है और भारत की उपस्थिति अपेक्षाकृत कमजोर रहती है, तो तेहरान में पाकिस्तान को अतिरिक्त कूटनीतिक अवसर मिल सकते हैं। भारत के नीति-निर्माता इस संभावना को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते।
वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी तेहरान जाएंगे या नहीं। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत उस रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रख पाएगा, जिसकी चर्चा वह पिछले कई वर्षों से करता रहा है। विदेश नीति का मूल्यांकन केवल भाषणों से नहीं होता; उसका परीक्षण ऐसे ही कठिन क्षणों में होता है जब हर निर्णय किसी न किसी शक्ति केंद्र को असहज करता है।
ईरान का यह निमंत्रण वस्तुतः एक अंतिम संस्कार का निमंत्रण नहीं है। यह भारत की विदेश नीति की अग्निपरीक्षा का निमंत्रण है। मोदी तेहरान जाएं, उपराष्ट्रपति को भेजें या किसी अन्य प्रतिनिधि को, हर विकल्प का अपना संदेश होगा। लेकिन एक बात स्पष्ट है—नई दिल्ली का निर्णय केवल तेहरान में नहीं पढ़ा जाएगा। उसे वाशिंगटन, तेल अवीव, मॉस्को, बीजिंग और रियाद में भी उतनी ही गंभीरता से देखा जाएगा।
इसीलिए यह घटना एक व्यक्ति या एक समारोह से कहीं बड़ी है। यह उस बदलती विश्व व्यवस्था का प्रतिबिंब है, जिसमें भारत जैसे देशों को मित्रताओं के बीच नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों के बीच चुनाव करना पड़ रहा है। और शायद यही इक्कीसवीं सदी की सबसे कठिन कूटनीतिक चुनौती भी है।






