अमित पांडे: संपादक
भारतीय सभ्यता में धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं रहा है। वह समाज को जोड़ने वाली सांस्कृतिक शक्ति, नैतिकता का स्रोत और जनजीवन की आधारशिला रहा है। लेकिन इक्कीसवीं सदी के भारत में धर्म का एक नया रूप भी उभरा है—धर्म एक विशाल अर्थव्यवस्था बन चुका है। मंदिरों में आने वाला चढ़ावा, धार्मिक पर्यटन, भूमि अधिग्रहण, कॉरिडोर निर्माण, कुंभ और महोत्सवों पर होने वाला खर्च, होटल उद्योग, रियल एस्टेट और सरकारी निवेश मिलकर एक ऐसी समानांतर आर्थिक संरचना बना रहे हैं, जिसका आकार लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अयोध्या में दान को लेकर उठे विवाद और उज्जैन में धार्मिक परियोजनाओं तथा भूमि को लेकर उठते प्रश्न केवल अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक-आर्थिक परिवर्तन की अभिव्यक्ति हैं।
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को स्वतंत्र भारत की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक-राजनीतिक घटनाओं में गिना जाता है। करोड़ों लोगों की आस्था और दशकों के आंदोलन के बाद निर्मित यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में स्थापित किया गया। लेकिन जब मंदिर में आने वाले दान और चढ़ावे के प्रबंधन को लेकर अनियमितताओं के आरोप सामने आए और मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल गठित करना पड़ा, तब प्रश्न केवल धन के गायब होने का नहीं था। प्रश्न यह था कि क्या श्रद्धालुओं द्वारा भगवान के नाम पर दिया गया धन भी भ्रष्टाचार और अपारदर्शिता से सुरक्षित नहीं है?
यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में धार्मिक दान को सामान्य आर्थिक लेन-देन की तरह नहीं देखा जाता। एक गरीब किसान, मजदूर, कर्मचारी या व्यापारी जब मंदिर में दान करता है तो वह लाभ कमाने के लिए निवेश नहीं करता, बल्कि विश्वास के आधार पर समर्पण करता है। इसलिए यदि उस धन के उपयोग पर प्रश्न उठते हैं तो चोट केवल आर्थिक नहीं होती, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी होती है। यही कारण है कि अयोध्या का विवाद राजनीतिक बहस से आगे बढ़कर सार्वजनिक विश्वास के संकट का विषय बन गया।
लेकिन यदि अयोध्या दान पेटी का प्रश्न है तो उज्जैन जमीन और धार्मिक विकास की राजनीति का प्रश्न है। महाकाल लोक परियोजना, सिंहस्थ की तैयारियां, धार्मिक पर्यटन का विस्तार और शहरी पुनर्विकास ने उज्जैन को एक नई आर्थिक पहचान दी है। करोड़ों श्रद्धालुओं के आगमन की संभावनाओं ने वहां भूमि के मूल्य, निर्माण गतिविधियों और सरकारी निवेश को अभूतपूर्व स्तर तक पहुंचाया है। इसके साथ ही समय-समय पर भूमि अधिग्रहण, मुआवजा, परियोजनाओं के लाभार्थियों और विकास की दिशा को लेकर बहस भी सामने आती रही है।
अयोध्या और उज्जैन देखने में दो अलग-अलग कथाएं प्रतीत होती हैं, लेकिन वास्तव में दोनों एक ही प्रक्रिया के दो पक्ष हैं। अयोध्या में आस्था धन उत्पन्न करती है और उज्जैन में वही आस्था भूमि और विकास परियोजनाओं का मूल्य बढ़ाती है। एक जगह श्रद्धालु का चढ़ावा आर्थिक संसाधन है, दूसरी जगह श्रद्धालु की उपस्थिति आर्थिक अवसर है। दोनों ही स्थितियों में धर्म एक विशाल आर्थिक परिसंपत्ति के रूप में सामने आता है।
यहीं भारतीय राजनीति की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। पिछले तीन दशकों में धर्म को चुनावी विमर्श का केंद्रीय तत्व बनाया गया है। मंदिर निर्माण, धार्मिक कॉरिडोर, तीर्थ विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण को राजनीतिक उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया गया। लेकिन यदि कोई राजनीतिक व्यवस्था धार्मिक परियोजनाओं का श्रेय लेती है, तो उसे उनकी पारदर्शिता और जवाबदेही की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी होगी। केवल उद्घाटन समारोहों और भव्य आयोजनों से उत्तरदायित्व समाप्त नहीं हो जाता।
वास्तविक समस्या यह है कि भारत में धार्मिक अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ा है, लेकिन उसके नियमन और पारदर्शिता की व्यवस्था उसी अनुपात में विकसित नहीं हुई। एक छोटे व्यापारी को जीएसटी के तहत अपना हिसाब देना पड़ता है, कंपनियों का वैधानिक ऑडिट होता है, सरकारी विभाग नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की जांच के दायरे में आते हैं, लेकिन हजारों करोड़ रुपये की धार्मिक अर्थव्यवस्था अक्सर सार्वजनिक निगरानी से बाहर रहती है। यह स्थिति लोकतांत्रिक जवाबदेही के सिद्धांत से मेल नहीं खाती।
धर्म और पारदर्शिता को परस्पर विरोधी मानना भी एक बड़ी भूल है। वास्तव में पारदर्शिता ही धार्मिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को मजबूत करती है। यदि किसी मंदिर, मठ, ट्रस्ट या धार्मिक संस्था के पास विशाल धनराशि और संपत्ति है तो उसका स्वतंत्र ऑडिट होना चाहिए। दान की गणना, संपत्तियों का प्रबंधन, भूमि आवंटन और विकास परियोजनाओं की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। श्रद्धालुओं को यह जानने का अधिकार है कि उनकी आस्था से प्राप्त संसाधनों का उपयोग किस प्रकार किया जा रहा है।
भारत आज धार्मिक पर्यटन को आर्थिक विकास के महत्वपूर्ण साधन के रूप में देख रहा है। अयोध्या, काशी, उज्जैन, पुरी और अन्य तीर्थस्थलों पर बड़े पैमाने पर निवेश हो रहा है। इससे रोजगार, व्यापार और बुनियादी ढांचे का विस्तार भी हो रहा है। लेकिन यदि इस विकास के साथ पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं जुड़ती, तो वही मॉडल भविष्य में विवादों और अविश्वास का कारण बन सकता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि अयोध्या में कितना दान आया या उज्जैन में कितनी भूमि अधिग्रहित हुई। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत धर्म को केवल राजनीतिक पूंजी और आर्थिक संसाधन के रूप में देखेगा, या उसे सार्वजनिक विश्वास की संस्था के रूप में भी संरक्षित करेगा? क्योंकि आस्था का मूल्य उसकी भव्यता में नहीं, बल्कि उसके प्रति जनता के विश्वास में निहित होता है।
अयोध्या की दान पेटी और उज्जैन की जमीन हमें एक ही चेतावनी देती हैं—जब धर्म अर्थव्यवस्था बनता है तो उसे पारदर्शिता की आवश्यकता और बढ़ जाती है। अन्यथा आस्था का बाज़ार तो विकसित हो जाएगा, लेकिन विश्वास की पूंजी धीरे-धीरे समाप्त होने लगेगी। किसी भी लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा संकट शायद ही कोई हो सकता है।







