अमित पांडे: संपादक
उत्तर प्रदेश में पिछले दस वर्षों से एक ही राजनीतिक नेतृत्व शासन कर रहा है। इस दौरान सरकार ने कानून-व्यवस्था, निवेश, एक्सप्रेसवे, धार्मिक पर्यटन और बुनियादी ढांचे को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि एक कठोर प्रशासक और अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने वाले नेता की बनाई गई है। लेकिन हाल की कुछ घटनाएं यह प्रश्न उठाने के लिए पर्याप्त हैं कि क्या सुशासन का अर्थ केवल अपराधियों के खिलाफ एनकाउंटर, निवेश सम्मेलनों और विशाल निर्माण परियोजनाओं तक सीमित है, या फिर उसके कुछ अन्य मानदंड भी हैं जिन पर सरकार को परखा जाना चाहिए।
लखनऊ के एक कोचिंग संस्थान में आग लगने से कई छात्रों की मौत और घायल होने की घटना ने एक बार फिर प्रशासनिक लापरवाही की ओर ध्यान खींचा है। यह पहला अवसर नहीं है जब किसी शिक्षण संस्थान, अस्पताल, फैक्ट्री या व्यावसायिक परिसर में सुरक्षा मानकों की अनदेखी के कारण जानें गई हों। देश के विभिन्न हिस्सों में बार-बार ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं। प्रत्येक दुर्घटना के बाद जांच, मुआवजा और कार्रवाई की घोषणा होती है, लेकिन कुछ समय बाद वही समस्याएं फिर सामने आ जाती हैं। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राज्य की नियामक व्यवस्था वास्तव में काम कर रही है या केवल दुर्घटना के बाद सक्रिय होती है।
इसी समय उत्तर प्रदेश में श्रमिकों को कथित रूप से बंधुआ जैसी परिस्थितियों में रखने और उनसे काम कराने के मामले भी सामने आए हैं। यदि किसी राज्य में उद्योग चल रहे हों, निवेश आ रहा हो और आर्थिक विकास के दावे किए जा रहे हों, लेकिन वहीं श्रमिकों को अमानवीय परिस्थितियों में काम करने पर मजबूर होना पड़े, तो विकास के मॉडल पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था की सफलता केवल निवेश की राशि से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से भी मापी जाती है कि वहां काम करने वाले लोगों की सुरक्षा, गरिमा और अधिकार कितने सुरक्षित हैं।
यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है। केंद्र सरकार ने हाल के वर्षों में श्रम कानूनों में व्यापक परिवर्तन किए हैं। इन सुधारों का उद्देश्य उद्योगों के लिए प्रक्रियाओं को सरल बनाना और निवेश को आकर्षित करना बताया गया। लेकिन यदि श्रमिकों के शोषण, बंधुआ मजदूरी और असुरक्षित कार्यस्थलों की घटनाएं जारी रहती हैं, तो यह बहस होना स्वाभाविक है कि क्या नियमन को कमजोर किए बिना विकास का मॉडल संभव नहीं था? आर्थिक विकास और श्रमिक अधिकारों के बीच संतुलन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल आवश्यकता है।
सरकार के समर्थक तर्क देते हैं कि अपराध पर नियंत्रण के लिए एनकाउंटर नीति ने प्रभावी भूमिका निभाई है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून का शासन न्यायिक प्रक्रिया से स्थापित होता है, न कि केवल पुलिस कार्रवाई से। यदि अपराध कम भी हुए हों, तब भी यह पर्याप्त नहीं है कि राज्य को सुशासन का आदर्श घोषित कर दिया जाए। सुशासन का अर्थ केवल अपराधियों को पकड़ना नहीं, बल्कि ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था विकसित करना भी है जिसमें छात्र सुरक्षित हों, श्रमिक सुरक्षित हों, धार्मिक संस्थाओं में पारदर्शिता हो और आम नागरिक को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए किसी दुर्घटना या त्रासदी का इंतजार न करना पड़े।
अयोध्या में दान और चढ़ावे के प्रबंधन को लेकर उठे विवाद भी इसी व्यापक बहस का हिस्सा हैं। यदि सरकार धार्मिक परियोजनाओं को अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती है, तो उन परियोजनाओं से जुड़ी संस्थाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी उससे अलग नहीं की जा सकती। इसी प्रकार यदि निवेश और औद्योगिक विकास को उपलब्धि बताया जाता है, तो श्रमिकों की स्थिति और कार्यस्थलों की सुरक्षा भी मूल्यांकन का हिस्सा होनी चाहिए।
किसी भी सरकार का मूल्यांकन केवल उसकी सफलताओं से नहीं होता। उसका वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होता है कि वह अपनी विफलताओं को किस प्रकार स्वीकार करती है और उन्हें सुधारने के लिए क्या कदम उठाती है। यदि हर दुर्घटना को अपवाद और हर आलोचना को राजनीति कहकर टाल दिया जाए, तो शासन की जवाबदेही कमजोर पड़ने लगती है।
दस वर्षों का समय किसी भी सरकार के लिए पर्याप्त माना जाता है। इतने लंबे कार्यकाल के बाद जनता यह अपेक्षा करती है कि बुनियादी प्रशासनिक ढांचा मजबूत होगा, सुरक्षा मानकों का पालन होगा, श्रमिकों के अधिकार संरक्षित होंगे और संस्थागत जवाबदेही स्थापित होगी। यदि इसके बावजूद बार-बार ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, तो यह प्रश्न पूछना लोकतंत्र का अधिकार ही नहीं, बल्कि उसका दायित्व भी है।
आखिरकार सुशासन का अर्थ केवल एक्सप्रेसवे, निवेश सम्मेलन, धार्मिक कॉरिडोर या एनकाउंटर के आंकड़े नहीं हैं। सुशासन का वास्तविक अर्थ है—सुरक्षित नागरिक, जवाबदेह संस्थाएं, न्यायपूर्ण प्रशासन और ऐसी व्यवस्था जिसमें किसी छात्र की जान लापरवाही से न जाए, किसी मजदूर को बंधुआ बनाकर न रखा जाए और किसी नागरिक को यह महसूस न हो कि राज्य केवल निर्माण कर रहा है, शासन नहीं।
यही वह कसौटी है जिस पर किसी भी सरकार को परखा जाना चाहिए। क्योंकि विकास का सबसे बड़ा प्रमाण कंक्रीट की इमारतें नहीं, बल्कि नागरिकों का सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन होता है।







