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उत्तराखंड: आपदा और भ्रष्टाचार की दोहरी मार

News Desk by News Desk
July 2, 2026
in संपादकीय
उत्तराखंड: आपदा और भ्रष्टाचार की दोहरी मार
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अमित पांडे: संपादक

उत्तराखंड में इस वर्ष मानसून से पहले ही प्री-मानसून की बारिश ने पहाड़ों को हरियाली से भर दिया। वनाग्नि और मवेशियों के चारे की समस्या स्वतः हल हो गई, मानो प्रकृति ने स्वयं समाधान कर दिया हो। लेकिन राहत के साथ-साथ खतरे भी बढ़े—बादल फटना, भूस्खलन और पहाड़ों का खिसकना यहाँ की नियति है। सवाल यह है कि जब प्रशासन वनाग्नि रोकने के ठोस उपाय नहीं कर पाया, तो क्या वह इन आपदाओं से हुए नुकसान की भरपाई कर पाएगा।

जुलाई 2026 तक की स्थिति बताती है कि इस वर्ष की बारिश और भूस्खलन में दर्जनों लोगों की मौत हुई, सैकड़ों घायल हुए और कई लापता हैं। हजारों पशुधन मारे गए और सड़कों, पुलों व सिंचाई संरचनाओं का नुकसान करोड़ों में आँका गया। सरकार ने कुछ जिलों के लिए राहत राशि स्वीकृत की, लेकिन यह वास्तविक नुकसान की तुलना में बेहद कम है। जिन परिवारों के घर बादल फटने या भूस्खलन में गिर गए, उन्हें आज भी मुआवज़े की स्थिति अस्पष्ट है। विपक्ष का आरोप है कि आपदा राहत फंड का बड़ा हिस्सा अन्य विभागों में स्थानांतरित कर दिया जाता है, जिससे पीड़ितों को सीधा मुआवज़ा नहीं मिलता।

इसी बीच राज्य में भ्रष्टाचार की परतें खुलती चली गईं। हाल ही में सामने आए अल्पसंख्यक छात्रवृत्ति घोटाले में लगभग ₹1.75 करोड़ की राशि फर्जी दस्तावेज़ों और संस्थानों के नाम पर हड़प ली गई। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने SIT जांच के आदेश दिए और “जीरो टॉलरेंस” की नीति का दावा भी किया। लेकिन जनता का सवाल यही है कि अब तक बनी किसी भी SIT जांच से ठोस नतीजा क्यों नहीं निकला। SC/ST छात्रवृत्ति घोटाला, वन भूमि अतिक्रमण, इको-टूरिज़्म स्कैम और आपदा राहत फंड की गड़बड़ियाँ—हर बार सरकार ने सख्ती का दावा किया, लेकिन आज तक किसी बड़े अधिकारी या नेता को जेल नहीं भेजा गया। SIT की रिपोर्टें या तो अधूरी रह गईं या फिर कार्रवाई के नाम पर केवल छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाया गया।

विपक्ष का कहना है कि मुख्यमंत्री धामी की “जीरो टॉलरेंस” नीति केवल कागज़ों पर है। कांग्रेस और अन्य दलों का आरोप है कि SIT का इस्तेमाल जनता को यह दिखाने के लिए किया जाता है कि सरकार सख्त है, जबकि हकीकत में भ्रष्टाचारियों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी वन भूमि अतिक्रमण पर राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी थी, लेकिन अब तक यह साफ नहीं हुआ कि कितनी जमीन मुक्त कराई गई और कितने नेताओं-अधिकारियों पर कार्रवाई हुई।

छात्रवृत्ति घोटाले का असर सबसे गहरा है, क्योंकि यह सीधे उन छात्रों के भविष्य पर प्रहार है जिनके लिए यह योजना बनी थी। जब शिक्षा जैसी संवेदनशील योजना में भी भ्रष्टाचार हो रहा है, तो जनता का भरोसा प्रशासन पर कैसे कायम रहेगा। SIT जांचें बार-बार बनती हैं, लेकिन नतीजे जनता तक नहीं पहुँचते। यही वजह है कि लोग कहते हैं कि SIT का मकसद केवल समय बिताना और जनता के गुस्से को ठंडा करना है।

दरअसल उत्तराखंड की राजनीति में SIT एक तरह का “सुरक्षा कवच” बन चुकी है। जब भी कोई बड़ा घोटाला सामने आता है, सरकार तुरंत जांच का आदेश देती है। मीडिया में सुर्खियाँ बनती हैं, मुख्यमंत्री का सख्त चेहरा दिखता है, लेकिन कुछ महीनों बाद मामला ठंडा पड़ जाता है। जनता को यह भ्रम दिया जाता है कि कार्रवाई हो रही है, जबकि असल में फाइलें धूल फांकती रहती हैं। यही कारण है कि आज तक किसी SIT जांच से बड़े अपराधी जेल नहीं गए।

यह स्थिति बेहद खतरनाक है, क्योंकि इससे जनता का भरोसा लोकतांत्रिक संस्थाओं पर से उठता जा रहा है। जब लोग देखते हैं कि बार-बार घोटाले होते हैं और हर बार जांच का आदेश दिया जाता है लेकिन नतीजा नहीं आता, तो वे मानने लगते हैं कि भ्रष्टाचार व्यवस्था का हिस्सा है। यही कारण है कि उत्तराखंड में आज भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है।

निष्कर्ष यही है कि उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाएँ पहाड़ों की नियति हो सकती हैं, लेकिन उन्हें घातक बनाने का काम भ्रष्टाचार करता है। प्री-मानसून की बारिश ने वनाग्नि को रोक दिया, पर आपदा प्रबंधन विभाग की विफलता ने यह साबित कर दिया कि फंड की हेराफेरी और SIT का दिखावा जनता को राहत नहीं दे सकता। जब तक SIT जांचों से वास्तविक गिरफ्तारी और कठोर सज़ा नहीं होती, तब तक “जीरो टॉलरेंस” का दावा केवल एक राजनीतिक नारा ही रहेगा। जनता को राहत और न्याय तभी मिलेगा जब सरकार दिखावे से आगे बढ़कर असली अपराधियों पर कार्रवाई करेगी। यही वह दोहरी मार है जिससे उत्तराखंड की जनता जूझ रही है।

Tags: Pushkar Singh Dhami Zero ToleranceUttarakhand Bureaucracy Corruption NewsUttarakhand Disaster Relief FundUttarakhand Monsoon Disaster 2026Uttarakhand Scholarship Scam SIT
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