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भारत की पाकिस्तान नीति और FATF पर फिर से कूटनीतिक दांव

पाकिस्तान को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की ग्रे लिस्ट में दोबारा शामिल कराने के लिए भारत एक बार फिर से अंतरराष्ट्रीय मंच पर सक्रिय होता दिखाई दे रहा है। ऐसा उस समय हो रहा है जब भारत, इस्लामाबाद को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से ऋण मिलने से रोकने में विफल रहा है।

News Desk by News Desk
May 23, 2025
in संपादकीय
भारत की पाकिस्तान नीति और FATF पर फिर से कूटनीतिक दांव
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लेखक: अमित पांडेय

पाकिस्तान को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की ग्रे लिस्ट में दोबारा शामिल कराने के लिए भारत एक बार फिर से अंतरराष्ट्रीय मंच पर सक्रिय होता दिखाई दे रहा है। ऐसा उस समय हो रहा है जब भारत, इस्लामाबाद को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से ऋण मिलने से रोकने में विफल रहा है। भारत की यह कोशिशें, जहां एक ओर अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ उसकी सख्त नीति को दर्शाती हैं, वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक स्तर पर उसे मिल रही चुनौतियों और विफलताओं को भी उजागर करती हैं।

सूत्रों के अनुसार, दक्षिण ब्लॉक के शीर्ष भारतीय अधिकारियों ने बताया कि भारत ने पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को प्रायोजित करने से संबंधित एक नया डोज़ियर FATF के समक्ष प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही यह भी उम्मीद जताई जा रही है कि FATF खुद भी पाकिस्तान की गतिविधियों की समीक्षा के बाद ऐसे निष्कर्षों पर पहुंचेगा, जो उसे दोबारा ग्रे लिस्ट में डालने का आधार बना सकते हैं। 2022 में पाकिस्तान को FATF की ग्रे लिस्ट से यह शर्त रखते हुए हटाया गया था कि वह आतंक वित्तपोषण और मनी लॉन्ड्रिंग को रोकने के लिए उपयुक्त कानून बनाएगा। लेकिन अब तक ऐसे किसी ठोस कानून का प्रभावी कार्यान्वयन नहीं हुआ है, जिससे भारत को यह कहने का अवसर मिला है कि पाकिस्तान अपने वादों पर खरा नहीं उतरा।

भारत यह तर्क भी दे रहा है कि FATF की कार्रवाई उसकी रिपोर्ट से परे, अपने स्वतंत्र मूल्यांकन के आधार पर होनी चाहिए। इसका उद्देश्य पाकिस्तान के वित्तीय अपराधों और आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों को उजागर करना है। हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले, जिसमें 26 भारतीय नागरिक मारे गए, ने भारत की इस चिंता को और बल दिया है। भारत का यह रुख सिर्फ FATF तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य बहुपक्षीय मंचों पर भी वह पाकिस्तान की आलोचना कर रहा है।

हालांकि, भारत को हाल ही में कूटनीतिक मोर्चे पर एक महत्वपूर्ण झटका लगा है। IMF द्वारा पाकिस्तान को एक अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का ऋण स्वीकृत किया गया, जिसे भारत रोकने का पूरा प्रयास कर रहा था। भारत ने IMF के सभी सदस्यों से बातचीत कर यह समझाने की कोशिश की कि पाकिस्तान को दिया गया हर ऋण, अंततः उसके हथियार खर्च में वृद्धि का कारण बनता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने IMF प्रमुख क्रिस्टालिना जॉर्जिएवा से भी सीधे बात की, लेकिन उनकी कोशिशें सफल नहीं हो पाईं।

विशेषज्ञों और पूर्व राजनयिकों का मानना है कि भारत की यह कूटनीतिक विफलता उसकी साख पर सवाल खड़ा करती है। पाकिस्तान को IMF से मिलने वाले फंड पर रोक लगाना भारत के लिए एक रणनीतिक जीत हो सकती थी, लेकिन अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के व्यवहार ने यह दिखा दिया कि भारत की चिंताओं को अभी भी उस स्तर पर तवज्जो नहीं मिलती, जिसकी उसे अपेक्षा थी। एक वरिष्ठ सूत्र के अनुसार, अमेरिका की मौजूदा विदेश नीति में पाकिस्तान को लेकर उदार रुख बरकरार है, और यह भारत की कोशिशों में सबसे बड़ा अवरोध साबित हुआ।

भारत की मीडिया रणनीति पर भी सवाल उठने लगे हैं। अंदरूनी राजनीतिक हलकों में यह चर्चा चल रही है कि सरकार की मीडिया प्रबंधन टीमें एक वैकल्पिक नैरेटिव स्थापित करने में लगी हुई हैं—यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि भारत असफल नहीं हुआ है, बल्कि यह एक जटिल अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया का हिस्सा था जिसमें भारत की भूमिका सीमित थी। एक राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार, यह नैरेटिव आगामी चुनावों के मद्देनज़र तैयार किया गया है ताकि सरकार की विदेश नीति को लेकर कोई नकारात्मक छवि न बने।

इन सभी घटनाओं के बीच भारत की नीति अब FATF के जरिए पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाने की ओर मुड़ गई है। लेकिन यह सवाल भी खड़ा हो गया है कि क्या FATF में पाकिस्तान को दोबारा ग्रे लिस्ट में डालना संभव हो पाएगा, या यह भी एक और कूटनीतिक संघर्ष का हिस्सा बनकर रह जाएगा। भारत को अपनी कोशिशें सिर्फ डोज़ियर तक सीमित नहीं रखनी होंगी, बल्कि उसे वैश्विक मंचों पर अपनी विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को फिर से स्थापित करना होगा। जब तक भारत यह साबित नहीं कर पाता कि उसकी चिंताएं सिर्फ रणनीतिक नहीं, बल्कि वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ एक ठोस चेतावनी हैं, तब तक उसे इस तरह की कूटनीतिक चुनौतियों का सामना करते रहना पड़ेगा।

भारत की यह स्थिति एक बड़े सबक की ओर संकेत करती है: अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नैतिक तर्क तब तक प्रभावी नहीं होते जब तक उनके पीछे ठोस राजनयिक समर्थन और कूटनीतिक ताकत न हो। FATF की ग्रे लिस्टिंग हो या IMF फंडिंग रोकने का प्रयास—इन दोनों मोर्चों पर भारत को अब रणनीति में नए दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो न केवल प्रतिक्रियात्मक हो, बल्कि दूरदर्शिता और वैश्विक संवाद पर आधारित भी हो।

(लेखक, समाचीन विषयों के गहन अध्येता, युवा चिंतक व राष्ट्रीय-आंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक हैं, रणनीति, रक्षा और तकनीकी नीतियों पर विशेष पकड़ रखते हैं।)

Tags: FATF में पाकिस्तान की ग्रे लिस्टिंगFinancial Action Task Force और भारतIMF और भारत-पाक संबंधजम्मू-कश्मीर आतंकी हमला 2025पाकिस्तान आतंकवाद और भारत की रणनीतिपाकिस्तान को IMF लोन विवादभारत की विदेश नीति और वैश्विक कूटनीतिभारत पाकिस्तान नीति 2025
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