115 साल से मां की प्रतिमा को असली सोने से सजाता रहा है बिहार का ये पंडाल संघ

Sonu Nigam19 October 20262 min read0 viewsबिहार
115 साल से मां की प्रतिमा को असली सोने से सजाता रहा है बिहार का ये पंडाल संघ

बिहार के पूर्वी चंपारण जिले का मोतिहारी शहर इन दिनों शारदीय नवरात्र की भक्ति में डूबा हुआ है। जहां पूरा देश मां दुर्गा की आराधना कर रहा है, वहीं मोतिहारी का ऐतिहासिक भवानी मंडप अपनी एक सदी से भी ज्यादा पुरानी विरासत को संजोए हुए है। यहां बंगाली समाज द्वारा आयोजित दुर्गा पूजा न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि यह बंगाली संस्कृति और परंपराओं का एक अनूठा संगम भी है, जो पिछले 115 वर्षों से निरंतर जारी है।

इस गौरवशाली परंपरा की शुरुआत साल 1912 में हुई थी। उस दौर में चंपारण में बसे कुछ बंगाली परिवारों ने यादव लाल साह के प्रांगण में पहली बार मां दुर्गा की स्थापना की थी। समय के साथ इस आयोजन ने एक स्थायी रूप लिया। दिलचस्प बात यह है कि नील आंदोलन के दौरान देशबंधु चितरंजन दास जब मोतिहारी आए, तो उन्होंने यहां के बंगाली समाज की आर्थिक मदद की, जिससे पूजा के लिए एक स्थायी स्थान मिल सका। इसके साथ ही अंग्रेज अधिकारी डब्ल्यू. एस. इरविन ने भी जमीन उपलब्ध कराने में सहयोग किया था। साल 1922 में ज्ञान बाबू चौक स्थित भवानी मंडप में इस परंपरा को मजबूती मिली, हालांकि 1934 के भीषण भूकंप ने मंडप को नुकसान पहुंचाया, लेकिन स्थानीय लोगों के सहयोग से इसे फिर से खड़ा किया गया।

सोने के आभूषणों का श्रृंगार और ढाक की थाप

भवानी मंडप की दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी विशेषता देवी की प्रतिमा का श्रृंगार है। बताया जाता है कि यह चंपारण का इकलौता ऐसा पूजा स्थल है जहां मां दुर्गा की प्रतिमा को असली सोने के आभूषणों से सजाया जाता है। इस आयोजन को पूरी तरह बंगाली रंग देने के लिए मूर्तिकार और ढाक बजाने वाले कलाकारों को विशेष रूप से पश्चिम बंगाल से बुलाया जाता है।

यहां की पूजा में बंगाली रीति-रिवाजों का सख्ती से पालन किया जाता है। षष्ठी के दिन 'देवी बोधन' से शुरू होकर अष्टमी की 'संधि पूजा' और दशमी के 'सिंदूर खेला' तक हर रस्म पूरी श्रद्धा से निभाई जाती है। ढाक की गूंज, शंखनाद, उलुध्वनि और धुनुची नृत्य का माहौल श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देता है। शाम की आरती के बाद यहां सांस्कृतिक कार्यक्रमों का दौर चलता है, जिसमें रवींद्र संगीत की प्रस्तुतियां मुख्य आकर्षण होती हैं।

आज के समय में शिक्षा और रोजगार की तलाश में कई बंगाली परिवार मोतिहारी छोड़कर दूसरे शहरों में बस गए हैं, जिससे यहां बंगाली समाज की संख्या कम हुई है। लेकिन जो लोग यहां रह गए हैं, उन्होंने अपनी विरासत को मरने नहीं दिया। बंगाली इंस्टीट्यूट और दुर्गा पूजा समिति के प्रयासों से यह परंपरा आज भी जीवित है। बंगाली समाज की यह मान्यता है कि नवरात्र में मां दुर्गा अपने मायके आती हैं और दशमी को विसर्जन के साथ विदा होती हैं, जिसे पूरे शहर के लोग मिलकर देखते हैं।

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