अमित पांडे: संपादक
भारत अक्सर स्वयं को एक गंभीर, जिम्मेदार और परिपक्व लोकतंत्र के रूप में प्रस्तुत करता है, लेकिन हर सप्ताह कुछ ऐसी खबरें सामने आ जाती हैं जो इस दावे को खुद ही कटघरे में खड़ा कर देती हैं। हाल ही में आई दो खबरें—एक में पुलिस थाने से जब्त 200 किलो गांजा चूहों द्वारा खा जाने का दावा और दूसरी में ‘राष्ट्रीयता जाँच’ जैसे संवेदनशील विचार का हास्यास्पद प्रयोग—दरअसल किसी स्टैंड-अप कॉमेडी शो की स्क्रिप्ट जैसी लगती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यह सब किसी मंच पर नहीं, बल्कि देश के प्रशासनिक ढाँचे के भीतर घट रहा है।
चूहों द्वारा 200 किलो गांजा खा जाने की कहानी पहली बार में सुनने में जितनी मज़ेदार लगती है, उतनी ही गहरी चिंता भी पैदा करती है। सवाल यह नहीं है कि चूहे गांजा खा सकते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि एक सरकारी थाने में जब्त नशीले पदार्थों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी। क्या चूहे ताले तोड़कर, बोरे खोलकर, महीनों तक निश्चिंत होकर गांजा खाते रहे और किसी अधिकारी की नज़र तक नहीं पड़ी? या फिर यह कहानी किसी बड़े प्रशासनिक घोटाले को ढकने के लिए गढ़ी गई एक बेहद कमजोर पटकथा है? जब भी सरकारी तंत्र अपनी लापरवाही या भ्रष्टाचार पर जवाब देने की स्थिति में आता है, तब ‘चूहे’, ‘दीमक’ या ‘बारिश’ जैसे बहाने अचानक सक्रिय हो जाते हैं। यह महज़ संयोग नहीं, बल्कि जवाबदेही से बचने की एक पुरानी और जानी-पहचानी रणनीति है।
दूसरी ओर, ‘राष्ट्रीयता जाँच’ जैसी अवधारणा का हास्यास्पद रूप भी उतना ही चिंताजनक है। किसी व्यक्ति की देशभक्ति या नागरिकता को ऐसे अजीब-ओ-गरीब मानकों पर परखने की कोशिश, जो तर्क और संवैधानिक मूल्यों से कोसों दूर हों, लोकतंत्र को मज़ाक में बदल देती है। जब राष्ट्रीय पहचान को गंभीर दस्तावेज़ों, कानूनों और संवैधानिक प्रक्रियाओं के बजाय सतही संकेतों या बयानबाज़ी से जोड़ दिया जाता है, तब यह पूरी प्रक्रिया किसी स्टैंड-अप कॉमेडी से कम नहीं लगती। फर्क बस इतना है कि यहाँ हँसी के पीछे डर छिपा होता है—डर इस बात का कि कल किसी और की बारी हो सकती है।
इन दोनों घटनाओं को अगर अलग-अलग देखा जाए, तो वे अजीब, हास्यास्पद या मनोरंजक लग सकती हैं। लेकिन जब इन्हें एक साथ रखा जाए, तो एक बड़ा और गंभीर चित्र उभरता है। यह उस प्रशासनिक संस्कृति का प्रतिबिंब है जहाँ गैर-जिम्मेदारी को सामान्य मान लिया गया है और संवेदनशील मुद्दों को भी हल्केपन से लिया जा रहा है। चूहों द्वारा गांजा खाने की कहानी सिर्फ एक मज़ाक नहीं, बल्कि यह बताती है कि कानून लागू करने वाली संस्थाओं के भीतर निगरानी, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व किस हद तक कमजोर हो चुके हैं। वहीं ‘राष्ट्रीयता जाँच’ का तमाशा यह दर्शाता है कि कैसे गंभीर संवैधानिक अवधारणाओं को राजनीतिक या प्रचारात्मक हथियार में बदला जा रहा है।
भारत जैसे देश में, जहाँ समस्याओं की कोई कमी नहीं—गरीबी, बेरोज़गारी, स्वास्थ्य संकट, शिक्षा की गिरती गुणवत्ता—वहाँ इस तरह की खबरें एक अजीब विडंबना पैदा करती हैं। एक तरफ़ सत्ता और व्यवस्था गंभीरता का दावा करती हैं, दूसरी तरफ़ ज़मीनी हकीकत ऐसी घटनाओं के रूप में सामने आती है जो पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर देती हैं। यह हँसी इसलिए भी कड़वी है क्योंकि इसके पीछे आम नागरिक की असहायता छिपी है। वह देखता है, सुनता है, मुस्कराता है, फिर चुपचाप अगली खबर का इंतज़ार करने लगता है।
अंततः सवाल यह नहीं है कि भारत में अजीब खबरें क्यों आती हैं। असली सवाल यह है कि क्या हम इन्हें सिर्फ मनोरंजन की तरह लेते रहेंगे, या फिर इनके पीछे छिपी गंभीर सच्चाइयों पर भी ध्यान देंगे। जब चूहे गांजा खा जाएँ और राष्ट्रीयता जाँच मज़ाक बन जाए, तब समस्या चूहों या मज़ाक की नहीं होती, समस्या उस सिस्टम की होती है जो इन्हें संभव बनाता है। जब तक जवाबदेही, तर्क और संवैधानिक मूल्यों को मज़बूती से नहीं अपनाया जाएगा, तब तक ‘द ग्रेट इंडियन बिज़ार’ हर हफ्ते नई हास्यास्पद सुर्खियाँ देता रहेगा—और हम हँसते-हँसते धीरे-धीरे संवेदनहीन होते चले जाएँगे।







