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Home संपादकीय

रूसी तेल पर अमेरिकी रहम: भारत की गरिमा कहाँ?

News Desk by News Desk
March 6, 2026
in संपादकीय
रूसी तेल पर अमेरिकी रहम: भारत की गरिमा कहाँ?
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अमित पांडे: संपादक

अमेरिका द्वारा भारत को केवल 30 दिनों के लिए रूसी कच्चा तेल खरीदने की “अनुमति” देना एक ऐसा कदम है जिसने भारत की ऊर्जा नीति और संप्रभुता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह निर्णय उस समय आया जब खाड़ी क्षेत्र में युद्ध ने ऊर्जा आपूर्ति को संकट में डाल दिया है और भारत घरेलू रसोई गैस की भारी कमी से जूझ रहा है।

कतर, जो भारत का प्रमुख एलपीजी आपूर्तिकर्ता है, ने ईरानी ड्रोन हमले के बाद अपने सबसे बड़े एलएनजी संयंत्र रस लाफान को बंद कर दिया। ऊर्जा मंत्री साद अल-काबी ने चेतावनी दी कि यदि युद्ध तुरंत समाप्त भी हो जाए तो उत्पादन सामान्य होने में “सप्ताहों से महीनों” का समय लगेगा। भारत के लिए यह स्थिति बेहद गंभीर है क्योंकि लगभग 85% कच्चे तेल और 45-50% एलएनजी की जरूरतें आयात से पूरी होती हैं। इनमें से लगभग 40% आयात हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर आता है, जहां टैंकर यातायात पूरी तरह ठप हो चुका है।

ऐसे समय में अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने भारतीय रिफाइनरियों को “अस्थायी छूट” दी है कि वे समुद्र में फंसे रूसी तेल को खरीद सकते हैं। लेकिन यह छूट केवल 30 दिनों की है और इसमें कोई दीर्घकालिक सुरक्षा नहीं है। अमेरिका ने साफ कहा है कि यह “स्टॉपगैप” उपाय है ताकि वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बनी रहे, साथ ही भारत को अमेरिकी तेल खरीदने के लिए प्रेरित किया जा सके।

यहां सवाल उठता है कि क्या भारत की विदेश नीति अब अमेरिका की शर्तों पर तय होगी? क्या भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए किसी अन्य देश से “दया” की अपेक्षा करनी चाहिए? विपक्ष का तर्क है कि यह भारत की संप्रभुता के लिए अपमानजनक है। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि यह भाषा उन देशों के लिए इस्तेमाल होती है जो प्रतिबंधित हैं, न कि भारत जैसे जिम्मेदार साझेदार के लिए।

आंकड़े बताते हैं कि भारत ने 2022 के बाद से रूसी तेल आयात में भारी वृद्धि की है। 2025 के अंत तक भारत प्रतिदिन लगभग 1.5 मिलियन बैरल रूसी तेल आयात कर रहा था, जिससे घरेलू कीमतें स्थिर रखने में मदद मिली। लेकिन अब जब अमेरिका केवल “समुद्र में फंसे” तेल की खरीद की अनुमति देता है, भारत को स्पॉट कीमतों पर भुगतान करना होगा। गोल्डमैन सैक्स ने चेतावनी दी है कि कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं, जबकि जेपी मॉर्गन ने $120 तक पहुंचने की संभावना जताई है।
भारत ने पहले ही दो रूसी जहाजों से लगभग 14 लाख बैरल तेल खरीद लिया है और तीसरा जहाज भारतीय बंदरगाह की ओर बढ़ रहा है। अनुमान है कि करीब 9.5 मिलियन बैरल रूसी तेल भारत के नजदीकी समुद्री मार्गों में मौजूद है। लेकिन चीन जैसे बड़े खरीदारों से प्रतिस्पर्धा भारत के लिए चुनौती बनी हुई है।

घरेलू स्तर पर सरकार ने रिफाइनरियों को आदेश दिया है कि वे प्रोपेन और ब्यूटेन का इस्तेमाल केवल एलपीजी उत्पादन के लिए करें और इसे घरेलू ग्राहकों तक ही पहुंचाएं। इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी कंपनियों को निर्देश दिया गया है कि वे पेट्रोकेमिकल उत्पादन में इन गैसों का उपयोग न करें।

इस पूरी स्थिति का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यही है कि क्या भारत की ऊर्जा नीति और विदेश नीति अब अमेरिका की “अनुमति” पर निर्भर करेगी? विपक्ष इसे भारत की संप्रभुता पर सीधा हमला मानता है और सरकार की चुप्पी को “समर्पण” कहता है। समर्थक पक्ष यह तर्क देता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में परस्पर निर्भरता स्वाभाविक है और संकट के समय व्यावहारिक कदम उठाना जरूरी है।

लेकिन जनता के मन में यह सवाल गूंज रहा है कि 1.4 अरब लोगों का देश, जिसने दशकों तक गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता पर गर्व किया है, आज किसी अन्य देश से “दया” की अपेक्षा क्यों कर रहा है। यह बहस केवल तेल की कीमतों की नहीं है, बल्कि भारत की गरिमा, स्वतंत्रता और वैश्विक पहचान की है।

अमेरिका की यह “अस्थायी छूट” भारत की ऊर्जा जरूरतों को कुछ समय के लिए राहत दे सकती है, लेकिन यह भारत की विदेश नीति पर गहरे सवाल छोड़ जाती है। क्या भारत अपनी संप्रभुता बनाए रखते हुए वैश्विक बाजार में टिक पाएगा, या उसकी नीतियां अब वाशिंगटन की शर्तों पर तय होंगी? यही वह बहस है जो आने वाले समय में भारतीय राजनीति और जनता के बीच और तेज होगी।

Tags: Economic AnalysisEnergy SecurityGlobal NewsIndia Russia RelationsInternational PoliticsMiddle East WarOil MarketStrait of HormuzUS Sanctions
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