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Home संपादकीय

लोकतंत्र का स्वरूप और लद्दाख की चुनौती

News Desk by News Desk
November 29, 2025
in संपादकीय
लोकतंत्र का स्वरूप और लद्दाख की चुनौती
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अमित पांडे: संपादक

लोकतंत्र का मूल आधार यह है कि सत्ता का विकेंद्रीकरण हो, निर्णय लेने की प्रक्रिया जनता के निकटतम स्तर पर हो और प्रशासनिक ढांचे में पारदर्शिता तथा जवाबदेही बनी रहे। लेकिन हाल ही में केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा लद्दाख के उपराज्यपाल की वित्तीय शक्तियों को सीमित कर देना और 100 करोड़ रुपये तक की परियोजनाओं की स्वीकृति को सीधे मंत्रालय के अधीन कर देना इस आधारभूत सिद्धांत पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यह कदम केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का मामला नहीं है, बल्कि लोकतंत्र के स्वरूप और उसकी आत्मा से जुड़ा हुआ है।

लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद से ही वहां के लोगों की सबसे बड़ी मांग रही है कि उन्हें पूर्ण राज्य का दर्जा मिले या कम से कम छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा दी जाए। यह मांग इसलिए उठी क्योंकि स्थानीय समुदायों को डर है कि उनकी संस्कृति, पर्यावरण और आजीविका बाहरी हस्तक्षेप से प्रभावित होगी। ऐसे समय में जब स्थानीय नेतृत्व और जनता अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठा रही है, केंद्र द्वारा वित्तीय शक्तियों को अपने हाथ में लेना लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की भावना के विपरीत प्रतीत होता है।

लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव कराना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि जनता के चुने हुए या नियुक्त प्रतिनिधि स्थानीय स्तर पर निर्णय ले सकें। जब वित्तीय शक्तियां दिल्ली में बैठे मंत्रालय के हाथों में केंद्रित हो जाती हैं, तो स्थानीय प्रशासन की भूमिका मात्र औपचारिक रह जाती है। इससे जनता और प्रशासन के बीच दूरी बढ़ती है और लोकतंत्र का वह स्वरूप कमजोर होता है जिसमें जनता को सीधे निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी का अवसर मिलता है।

इतिहास गवाह है कि जब भी सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण हुआ है, लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हुई हैं। जवाहरलाल नेहरू ने संसद में कहा था कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह स्थानीय आकांक्षाओं को सुनता है और उन्हें निर्णय प्रक्रिया में स्थान देता है। इसी तरह बी.आर. अंबेडकर ने संविधान सभा में चेतावनी दी थी कि यदि लोकतंत्र केवल औपचारिकता बनकर रह जाए और जनता की वास्तविक भागीदारी न हो, तो वह टिकाऊ नहीं रह सकता। लद्दाख के संदर्भ में यह चेतावनी आज और भी प्रासंगिक हो जाती है।

केंद्र सरकार का तर्क यह हो सकता है कि बड़े वित्तीय निर्णयों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए मंत्रालय की निगरानी आवश्यक है। लेकिन यह तर्क तभी स्वीकार्य होता है जब स्थानीय संस्थाओं को पूरी तरह अक्षम या भ्रष्ट साबित किया जाए। लद्दाख में जनता की मांग यह नहीं है कि केंद्र पूरी तरह पीछे हट जाए, बल्कि यह है कि स्थानीय नेतृत्व को पर्याप्त अधिकार मिले ताकि वे अपनी परिस्थितियों और प्राथमिकताओं के अनुसार निर्णय ले सकें। लोकतंत्र का सार यही है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया स्थानीय वास्तविकताओं से जुड़ी हो।

आज की स्थिति में यह कदम जनता के बीच असंतोष को और गहरा कर सकता है। लद्दाख में पहले ही रोजगार, पर्यावरण और सांस्कृतिक संरक्षण को लेकर आंदोलन चल रहे हैं। यदि स्थानीय प्रशासन को वित्तीय निर्णयों में हाशिए पर धकेला जाएगा, तो जनता का विश्वास और भी कमजोर होगा। लोकतंत्र का स्वरूप तभी मजबूत होता है जब जनता यह महसूस करे कि उसकी आवाज सुनी जा रही है और उसके प्रतिनिधि वास्तविक शक्ति रखते हैं।

गांधीजी ने कहा था कि लोकतंत्र का अर्थ है जनता की भागीदारी और उसकी सक्रियता। यदि निर्णय केवल ऊपर से थोपे जाएं, तो वह लोकतंत्र नहीं बल्कि नौकरशाही का शासन बन जाता है। लद्दाख के मामले में यही खतरा दिखाई देता है। केंद्र का यह कदम लोकतंत्र को केवल औपचारिकता में बदल सकता है, जहां जनता की आकांक्षाएं और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका गौण हो जाती है।

इसलिए यह आवश्यक है कि लोकतंत्र के स्वरूप पर गंभीर विमर्श हो। क्या लोकतंत्र का अर्थ केवल केंद्र की निगरानी है, या फिर यह जनता की सक्रिय भागीदारी और स्थानीय नेतृत्व की शक्ति है? यदि हम लोकतंत्र को उसकी आत्मा के साथ जीवित रखना चाहते हैं, तो लद्दाख जैसे क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन को अधिक अधिकार देने होंगे। अन्यथा लोकतंत्र का स्वरूप धीरे-धीरे खोखला होता जाएगा और जनता का विश्वास टूटेगा।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह विविधता को स्वीकार करता है और स्थानीय आकांक्षाओं को सम्मान देता है। यदि यह ताकत कमजोर होती है, तो लोकतंत्र केवल नाम भर रह जाएगा। लद्दाख की चुनौती हमें यही याद दिलाती है कि लोकतंत्र का स्वरूप केवल सत्ता के केंद्रीकरण से नहीं, बल्कि जनता की भागीदारी और स्थानीय नेतृत्व की शक्ति से तय होता है।

Tags: Ladakh Autonomy DemandLadakh Cultural Protection ConcernLadakh Environmental IssueLadakh Financial Powers ControversyLadakh Governance CrisisLadakh Local Rights IssueLadakh Sixth Schedule Demand
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