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लद्दाख की पुकार और सत्ता की चुप्पी : राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की लड़ाई

News Desk by News Desk
September 24, 2025
in संपादकीय
लद्दाख की पुकार और सत्ता की चुप्पी : राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की लड़ाई
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संपादक अमित पांडे

लद्दाख आजादी के बाद से ही केंद्र और राज्य के बीच खिंची रस्साकशी का हिस्सा रहा है। 2019 में जब जम्मू-कश्मीर को bifurcate करके अलग-अलग दो केंद्रशासित प्रदेश बनाए गए, तो लद्दाख ने इसे अपनी जीत माना था। वर्षों से मांग रही थी कि लद्दाख को सीधे दिल्ली से शासित किया जाए ताकि कश्मीर की राजनीति की परछाई से मुक्ति मिल सके। परंतु पाँच वर्ष बीतते ही वही लद्दाख आज सड़कों पर है, चार लोगों की मौत हो चुकी है, और प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक तक को अपना अनशन तोड़ना पड़ा। सवाल यह है कि जिस बदलाव को उत्सव के रूप में मनाया गया था, वह आक्रोश और हिंसा में कैसे बदल गया?


इसका उत्तर गहराई से लद्दाख की सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं में छिपा है। लद्दाख भौगोलिक दृष्टि से एक ठंडा रेगिस्तान है, जिसकी कुल जनसंख्या 3 लाख से कुछ अधिक है। इनमें से 80% से अधिक लोग अनुसूचित जनजाति वर्ग में आते हैं। यह आँकड़ा अपने आप में बताता है कि यहाँ छठी अनुसूची के प्रावधान कितने प्रासंगिक हो सकते हैं। छठी अनुसूची, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244 के तहत, आदिवासी क्षेत्रों को विशेष स्वायत्तता देती है—भूमि, संस्कृति और स्थानीय प्रशासन पर नियंत्रण। यही वह आश्वासन था जो 2019 में दिया गया, परंतु पाँच साल बाद भी धरातल पर इसका कोई ठोस स्वरूप नहीं दिखा।


वांगचुक और लेह एपेक्स बॉडी (LAB) तथा करगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (KDA) के आंदोलन का सार यही है कि बिना संवैधानिक गारंटी के लद्दाख की विशिष्ट पहचान और संसाधनों की सुरक्षा संभव नहीं। जब जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा पुनः दिला दिया गया और वहाँ विधानसभा चुनाव भी संपन्न हो गए, तो लद्दाख के लोग खुद को और अधिक उपेक्षित महसूस करने लगे। वहाँ की जनता ने देखा कि जहाँ जम्मू-कश्मीर को जनप्रतिनिधित्व और नीति-निर्माण का अवसर मिला, वहीं लद्दाख को केवल एक उपराज्यपाल और केंद्र के अफसरों की निगरानी पर छोड़ दिया गया।


लद्दाख के लोग सबसे अधिक चिंतित भूमि अधिकारों को लेकर हैं। पहले अनुच्छेद 370 और उससे जुड़े प्रावधानों के कारण गैर-स्थानीय लोगों को यहाँ भूमि खरीदने की अनुमति नहीं थी। यह सुरक्षा कवच अब हट चुका है। एक ठंडे रेगिस्तान में जहाँ खेती योग्य भूमि पहले से ही बहुत कम है, वहाँ बाहरी पूंजी और उद्योग के आगमन से स्थानीय लोगों के विस्थापन का खतरा वास्तविक हो गया है। आंकड़े बताते हैं कि लद्दाख की कुल भूमि का मात्र 0.2% ही खेती योग्य है। ऐसी स्थिति में भूमि की सुरक्षा केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न है।


सोनम वांगचुक का यह कहना बिल्कुल तर्कसंगत है कि अगर केंद्र सरकार ने छठी अनुसूची का वादा पूरा किया होता तो आज की हिंसा और अविश्वास की स्थिति नहीं बनती। हिंसा के दृश्य निश्चित ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं, परंतु यह भी सच है कि यह निराशा और अधीरता का परिणाम है। लगातार शांतिपूर्ण धरनों और अनशनों के बावजूद जब केंद्र केवल बैठकें टालता रहा और ठोस निर्णय नहीं लिया, तब युवाओं के सब्र का बाँध टूटा।


आंकड़ों से स्पष्ट है कि लद्दाख के लिए विकास का मॉडल केवल दिल्ली से आदेश भेजने से सफल नहीं हो सकता। 2011 की जनगणना के अनुसार यहाँ की साक्षरता दर 77% है, परंतु बेरोजगारी की दर लगातार बढ़ रही है। पर्यटन पर निर्भर अर्थव्यवस्था कोविड के बाद से पहले ही हिल चुकी है। अब भूमि और संसाधनों पर असुरक्षा की भावना युवाओं में और बेचैनी फैला रही है। यही वजह है कि आंदोलन केवल कुछ बुज़ुर्ग नेताओं का मुद्दा न रहकर पूरे समाज का आंदोलन बन चुका है।


लद्दाख का संघर्ष हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या केंद्र केवल प्रशासनिक इकाई समझकर वहाँ के लोगों की सांस्कृतिक और सामाजिक आकांक्षाओं को नजरअंदाज कर सकता है? अगर असम, मिज़ोरम, त्रिपुरा और मेघालय जैसे राज्यों में छठी अनुसूची की व्यवस्था लागू हो सकती है तो लद्दाख के लिए क्यों नहीं? वहाँ भी अधिकांश जनसंख्या जनजातीय है, वहाँ भी सांस्कृतिक पहचान अलग है, और वहाँ भी संसाधनों पर बाहरी दबाव का डर वास्तविक है।


हिंसा कभी समाधान नहीं होती। सोनम वांगचुक जैसे लोग इसी बात पर जोर देते रहे हैं कि आंदोलन को शांतिपूर्ण रखा जाए ताकि यह राष्ट्रीय हित में भी स्वीकार्य हो और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की छवि पर धब्बा न लगे। परंतु सत्ता की जिद और संवाद की देरी ने हालात को इस मोड़ पर ला दिया कि मौतें हो गईं और बीजेपी का कार्यालय तक जलाया गया। यह स्थिति न तो सरकार के लिए सम्मानजनक है, न ही लद्दाख के समाज के लिए।


अब भी देर नहीं हुई है। केंद्र सरकार को यह समझना होगा कि राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची केवल राजनीतिक नारे नहीं, बल्कि वहाँ के लोगों की आत्मा से जुड़े प्रश्न हैं। जब तक इस प्रश्न का सम्मानजनक समाधान नहीं होता, तब तक लद्दाख की शांति केवल दिखावा होगी। लोकतंत्र केवल आदेशों से नहीं चलता, वह विश्वास से चलता है। और आज लद्दाख उस विश्वास की तलाश में है।

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