अमित पांडेय
नई दिल्ली से आई खबरों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भारत ने वाशिंगटन में लॉबिंग फर्म क्यों और कब हायर की। यह वही समय था जब पहलगाम हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान पर जवाबी कार्रवाई की और फिर ऑपरेशन सिंदूर के तहत संघर्षविराम की घोषणा हुई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसका श्रेय खुद को दिया, जबकि भारत ने लगातार कहा कि यह सैन्य कमांडर स्तर की बातचीत का नतीजा था। लेकिन घटनाक्रम की तारीखें और लॉबिंग फर्म के साथ हुए समझौते यह संकेत देते हैं कि पर्दे के पीछे कहीं न कहीं अमेरिकी सत्ता केंद्रों से संवाद चल रहा था।
22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की मौत हुई। इसके दो दिन बाद यानी 24 अप्रैल को भारत ने एसएचडब्ल्यू पार्टनर्स एलएलसी नामक अमेरिकी लॉबिंग फर्म से एक साल का करार किया, जिसके तहत हर महीने 1.5 लाख डॉलर यानी लगभग 16.2 करोड़ रुपये सालाना भुगतान तय हुआ। 7 मई को भारत ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और पाकिस्तान में आतंकी ढांचे को ध्वस्त किया। और फिर 10 मई को ट्रंप ने घोषणा की कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम कराया है। उसी दिन भारतीय दूतावास ने व्हाइट हाउस के चीफ ऑफ स्टाफ, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अधिकारियों से संपर्क किया। यह स्पष्ट नहीं है कि बातचीत संघर्षविराम से पहले हुई या बाद में, लेकिन यह तय है कि उस दिन दोनों पक्षों में गहन संवाद हुआ।
लॉबिंग फर्म का नेतृत्व जेसन मिलर कर रहे थे, जो ट्रंप के चुनाव अभियानों और ट्रांजिशन टीमों में वरिष्ठ सलाहकार रह चुके हैं। उनकी रिपब्लिकन सर्किलों में गहरी पैठ है। समझौते के अनुसार यह फर्म भारत को रणनीतिक परामर्श, योजना और अमेरिकी प्रशासन, कांग्रेस, थिंक टैंक और शैक्षणिक संस्थानों के साथ संबंधों में मदद करने वाली थी। सवाल यह है कि क्या भारत ने यह कदम पाकिस्तान पर जवाबी कार्रवाई से पहले ही उठा लिया था और क्या यह लॉबिंग ट्रंप को भारत के प्रति नरम करने में सफल रही।
लेकिन घटनाक्रम यहीं नहीं रुका। अगस्त में ट्रंप ने भारतीय सामानों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया और उसी महीने इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत रूस से तेल खरीदकर यूक्रेन युद्ध को फंड कर रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यह असल में मुक्त व्यापार वार्ता में दबाव बनाने का औजार था। अब लॉबिंग फर्म के सामने नई चुनौती थी—भारत के लिए लाभकारी व्यापार समझौता सुनिश्चित करना। इसके लिए उन्होंने भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर, विदेश सचिव, उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और भारतीय राजदूत के लिए अमेरिकी अधिकारियों से मुलाकातें तय करने की कोशिश की। साथ ही प्रधानमंत्री मोदी के सोशल मीडिया पोस्ट्स को अमेरिकी प्रशासन तक पहुँचाने का काम भी किया।
भारत ने इस रिपोर्ट का खंडन नहीं किया बल्कि कहा कि यह “मानक प्रथा” है। पाकिस्तान ने भी उसी समय वाशिंगटन में लॉबिंग की और भारत से तीन गुना ज्यादा खर्च किया। अमेरिका में लॉबिंग कानूनी रूप से मान्य है और इसमें कोई राजनीतिक बाधा नहीं होती। यह भी पहली बार नहीं है जब भारत ने लॉबिंग का सहारा लिया। 2017 में एच-1बी वीज़ा विवाद के दौरान भी रिश्ते तनावपूर्ण हुए थे। उससे पहले परमाणु समझौते के समय भी भारतीय-अमेरिकी संगठनों ने लॉबिंग की थी। 2004 में अमेरिकी सीनेट में भारत कॉकस बना, जो किसी एक देश के लिए पहली बार हुआ था।
लेकिन समय बदल चुका है। दिसंबर 2025 में न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट ने बताया कि भारतीय-अमेरिकी सफलता की कहानी अब दबाव में है। प्रवासियों के प्रति बढ़ती शत्रुता, वीज़ा प्रतिबंध और सांस्कृतिक विवादों ने अनिश्चितता पैदा कर दी है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या भारत की लॉबिंग रणनीति अब भी उतनी प्रभावी है जितनी पहले थी।
मूल प्रश्न यही है कि क्या भारत ने लॉबिंग फर्म को पाकिस्तान पर कार्रवाई से पहले ही हायर किया था। क्या यह फर्म ट्रंप को भारत के पक्ष में करने में सफल रही, जबकि पिछले नौ महीनों में उन्होंने पाकिस्तान के साथ अधिक निकटता दिखाई है। और सबसे अहम, क्या मोदी के पोस्ट्स और आधिकारिक मुलाकातें अमेरिकी टैरिफ की बर्फ पिघला पाएंगी। भारत ने करोड़ों रुपये खर्च किए, लेकिन क्या इसका प्रतिफल मिला।
यह विवाद केवल भारत-अमेरिका संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक आर्थिक राजनीति का हिस्सा है। जब तेल, व्यापार और सुरक्षा के मुद्दे आपस में जुड़ते हैं तो छोटे-छोटे निर्णय भी बड़े परिणाम देते हैं। भारत के लिए यह समय कठिन है क्योंकि एक ओर उसे पाकिस्तान और चीन से सुरक्षा चुनौतियाँ हैं, दूसरी ओर अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव। ऐसे में लॉबिंग का सहारा लेना शायद अनिवार्य हो, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि भारत अपनी आर्थिक और कूटनीतिक ताकत को इस तरह गढ़े कि उसे किसी लॉबिंग फर्म पर निर्भर न रहना पड़े।













