हरेन्द्र प्रताप की विशेष रिपोर्ट
प्रयागराज, 20 मार्च। बीसवीं सदी के दो महान भारतीय साहित्यकारों के नाम को लेकर अक्सर भ्रम पैदा हो जाता है। इसी भ्रम का शिकार भारतीय रेल उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी प्रयागराज में इन दिनों हो चुकी है। भारतीय रेल को साहित्यिक ज्ञान और प्रूफरीडिंग को लेकर भी सजग रहना चाहिए ताकि ठीक जंक्शन पर उसकी छवि दुर्घटनाग्रस्त नहीं हो सके !
भारतीय रेल ने प्रयागराज रेलवे स्टेशन पर सांस्कृतिक नगरी की साहित्यिक प्रतिष्ठा को बखूबी दर्शाया है। छायावाद का गढ़ अच्छे प्रयासों से रेलवे स्टेशन पर नये सिरे से रोशन हो रहा है। यहां के निवासी रेलवे स्टेशन पर साहित्यिक प्रदर्शनी देख कर और अपने शहर की थाती को देख कर गौरवान्वित हैं। साथ ही देशी – विदेशी पर्यटकों के लिए भी यह सब आकर्षक और कौतूहल का विषय है !
सरकारी व्यवस्था में प्रायः सोच बहुत अच्छी होती है। लेकिन उसे भारत जैसे देश में गुणवत्ता से कार्यान्वित करना टेढ़ी खीर है। लगातार कम हो रहे सरकारी स्टाफ तथा उसके ठीक विपरीत बढ़ते काम के दबाव के कारण निजी क्षेत्र के प्रोफेशनल के काम को चेक करने का समय किसी सरकारी अधिकारी या विद्वान के पास नहीं है ! यही कारण है कि प्रयागराज जंक्शन पर बौद्धिक दुर्घटना हुई है।
रेलवे स्टेशन पर भारतीय रेल द्वारा आकर्षक ढंग से प्रदर्शित रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी के जीवनवृत्त में लापरवाही से रघुवीर सहाय के नाम का उल्लेख कर दिया गया है। यह लापरवाही इसलिए हुई है कि कलाकार द्वारा तैयार लेखन की चेकिंग एक संपादक या आलोचक की दृष्टि से नहीं की गई है। इसलिए एकाध जगह पर रघुपति की जगह पर रघुवीर दिख रहे हैं जबकि शीर्षक में रघुपति सहाय हैं। सही चेकिंग नहीं होने से यह चूक तो हो ही गई है, साथ ही कुछेक भाषाई त्रुटियां भी नजर आ रही हैं। लिखने वाले और चेक करने वाले दोनों से चूक हुई है जबकि बदनामी भारतीय रेल की हो रही है। स्वाभाविक है कि केंद्र सरकार की साहित्यिक सजगता भी संदेह के घेरे में है !














