अमित पांडे: संपादक
उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाल ही में एक अहम मोड़ आया जब अदालत ने शंकराचार्य की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए उन्हें राहत दी। यह फैसला केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि राजनीतिक समीकरणों पर भी गहरा असर डालता है। सवाल यह है कि क्या यह राहत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सत्ता समीकरण साधने में सक्षम बनाएगी, या फिर विपक्ष इस घटना को ब्राह्मण समुदाय की अस्मिता से जोड़कर सरकार के खिलाफ माहौल बनाएगा।
ब्राह्मण समुदाय उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने इस समुदाय को अपने साथ जोड़ने में सफलता पाई थी। लेकिन हाल के वर्षों में ब्राह्मण असंतोष की खबरें बार-बार सामने आई हैं। शंकराचार्य और स्वामी आनंदस्वरूप जैसे धार्मिक नेताओं की सक्रियता इस असंतोष को और तेज़ कर सकती है। खासकर जब आनंदस्वरूप ने 8 मार्च को बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है, जिसका उद्देश्य ब्राह्मण समुदाय की रक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना बताया गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि योगी सरकार के लिए यह स्थिति दोहरी चुनौती है। एक ओर उन्हें कानून-व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करना है, दूसरी ओर उन्हें ब्राह्मण समुदाय की नाराज़गी को शांत करना है। यदि यह नाराज़गी बढ़ती है तो भाजपा के लिए चुनावी गणित कठिन हो सकता है।
डेटा देखें तो उत्तर प्रदेश की आबादी में ब्राह्मणों की हिस्सेदारी लगभग 10-12% है। यह संख्या भले ही बहुत बड़ी न लगे, लेकिन चुनावी राजनीति में यह समुदाय निर्णायक साबित होता है क्योंकि यह उच्च मतदान दर और सामाजिक प्रभाव रखता है। 2017 में भाजपा को ब्राह्मण वोटों का बड़ा हिस्सा मिला था, जिससे उसे प्रचंड बहुमत हासिल हुआ। लेकिन यदि यह समर्थन कमजोर होता है तो भाजपा की सीटों पर सीधा असर पड़ सकता है।
विपक्षी दल पहले से ही ब्राह्मण असंतोष को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों ही इस मुद्दे को उठाकर भाजपा पर हमला कर रही हैं। उनका तर्क है कि योगी सरकार ने ब्राह्मण समुदाय को केवल वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया है, लेकिन उनके सम्मान और सुरक्षा की गारंटी नहीं दी। शंकराचार्य की गिरफ्तारी पर रोक को वे इस बात का प्रमाण बता रहे हैं कि सरकार ने धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व को दबाने की कोशिश की थी।
आलोचकों का कहना है कि योगी सरकार की राजनीति “हिंदुत्व” के व्यापक एजेंडे पर केंद्रित है, लेकिन उसमें ब्राह्मण समुदाय की विशिष्ट पहचान और सम्मान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। यही कारण है कि धार्मिक नेताओं के आंदोलनों को ब्राह्मण अस्मिता से जोड़कर देखा जा रहा है। यदि यह आंदोलन व्यापक समर्थन पाता है तो भाजपा के लिए यह गंभीर चुनौती बन सकता है।
दूसरी ओर, भाजपा समर्थक तर्क देते हैं कि अदालत का फैसला योगी सरकार के लिए राहत है क्योंकि इससे यह संदेश गया है कि न्यायिक प्रक्रिया स्वतंत्र है और सरकार ने किसी तरह का दमन नहीं किया। उनका कहना है कि योगी आदित्यनाथ की छवि “कठोर प्रशासक” की है और वह इस तरह की चुनौतियों को संभालने में सक्षम हैं।
समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो यह घटना उत्तर प्रदेश की राजनीति में “सांस्कृतिक अस्मिता बनाम राजनीतिक सत्ता” का संघर्ष है। ब्राह्मण समुदाय अपनी धार्मिक और सामाजिक पहचान को सुरक्षित देखना चाहता है, जबकि सरकार सत्ता समीकरण और कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता देती है। यह संघर्ष यदि संतुलित नहीं हुआ तो सामाजिक असंतोष और राजनीतिक अस्थिरता दोनों बढ़ सकते हैं।
भविष्य की राजनीति के लिए यह घटना संकेत देती है कि भाजपा को ब्राह्मण समुदाय के साथ अपने रिश्ते को और मजबूत करना होगा। केवल हिंदुत्व का व्यापक एजेंडा पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि समुदाय-विशेष की अस्मिता और सम्मान को भी सुनिश्चित करना होगा। विपक्ष इस मुद्दे को भुनाने के लिए तैयार बैठा है और यदि भाजपा ने इसे गंभीरता से नहीं लिया तो चुनावी गणित उसके खिलाफ जा सकता है।
निष्कर्षतः, शंकराचार्य को मिली राहत ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया अध्याय खोल दिया है। योगी आदित्यनाथ के लिए यह सत्ता समीकरण साधने का अवसर भी है और चुनौती भी। यदि वह ब्राह्मण समुदाय की नाराज़गी को शांत कर पाते हैं तो भाजपा की स्थिति मजबूत होगी, लेकिन यदि असंतोष आंदोलन का रूप लेता है तो विपक्ष इसे भुनाकर भाजपा को कठिनाई में डाल सकता है। यह घटना केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से भी निर्णायक है।






