सहकारिता मंत्रालय द्वारा 9 और 10 अप्रैल, 2026 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी में आयोजित 7वें राष्ट्रीय समीक्षा सम्मेलन में सहकारी क्षेत्र के विभिन्न आयामों में सुधार को और गहराई देने, संस्थागत क्षमता को सुदृढ़ करने तथा बैंकिंग, डेयरी, वित्तीय तंत्र और उभरते सहकारी मॉडलों सहित प्रमुख क्षेत्रों में क्रियान्वयन को तेज करने पर विशेष जोर दिया गया। विचार-विमर्श में यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि अब ध्यान योजनाओं के निर्माण से आगे बढ़कर उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर होना चाहिए, ताकि नीतिगत पहलों के ठोस परिणाम जमीनी स्तर पर दिखाई दें।
इस दो दिवसीय राष्ट्रीय समीक्षा सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय के सचिव डॉ. आशीष कुमार भुटानी ने कहा कि सुधारों का अगला चरण जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन, हितधारकों के बीच बेहतर समन्वय और संसाधनों के समयबद्ध उपयोग पर आधारित होगा। उन्होंने कहा कि अब तक उल्लेखनीय प्रगति हुई है, लेकिन नियमित समीक्षा से आगे बढ़ते हुए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि क्रियान्वयन की गति नीति की भावना के अनुरूप हो, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां प्रगति अपेक्षित स्तर पर नहीं रही है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि त्वरित निर्णय प्रक्रिया और संस्थानों के बीच बेहतर तालमेल से ही ठोस और स्थायी परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।PACS कंप्यूटरीकरण और विस्तार के संबंध में डॉ. भुटानी ने कहा कि चल रहे चरणों को समयबद्ध तरीके से पूरा करना और भविष्य के विस्तार के लिए गति बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि गुणवत्तापूर्ण परिणाम सुनिश्चित करने के लिए मजबूत क्रियान्वयन तंत्र और सतत निगरानी जरूरी है। उन्होंने क्रियान्वयन एजेंसियों की जवाबदेही तय करने और उनके प्रदर्शन के आधार पर मूल्यांकन करने पर जोर दिया, साथ ही संस्थागत सहयोग तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता बताई, ताकि योजनाओं का सुचारु कार्यान्वयन सुनिश्चित हो सके। उन्होंने निरंतर प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर भी बल दिया और कहा कि प्रणालियां ऐसी हों जो योजना अवधि समाप्त होने के बाद भी प्रभावी और टिकाऊ बनी रहें।सहकारी क्षेत्र में भंडारण अवसंरचना पहल की समीक्षा करते हुए सहकारिता सचिव ने कहा कि समयबद्ध क्रियान्वयन, विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय और संचालन संबंधी चुनौतियों के समाधान के लिए नवाचारी दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, जिसमें भूमि उपलब्धता को सुगम बनाना और प्रक्रियाओं को सरल करना शामिल है। इसी प्रकार संस्थागत सुदृढ़ीकरण के संदर्भ में उन्होंने डेयरी और मत्स्य जैसे क्षेत्रों में सहकारी संस्थानों के विस्तार की आवश्यकता पर जोर दिया, जिसे क्षमता निर्माण, अंतराल की पहचान और लक्षित हस्तक्षेपों के माध्यम से आगे बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने राज्यों को गैर-कार्यशील संस्थाओं के संबंध में आवश्यक कदम उठाने और संरचनाओं को सुदृढ़ करने की भी सलाह दी।सहकारिता सचिव ने PACS के व्यवसायिक विविधीकरण पर जोर देते हुए कहा कि उन्हें अतिरिक्त आय सृजन गतिविधियों को अपनाकर गांव स्तर पर बहु-सेवा केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जिससे उनकी आर्थिक क्षमता और सेवा दायरा दोनों बढ़ सके।सहकारी बैंकिंग के संदर्भ में डॉ. भुटानी ने साइबर सुरक्षा को मजबूत करने, सुरक्षित डिजिटल प्लेटफॉर्म अपनाने और परिचालन दक्षता बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि सहकारी बैंक बदलती वित्तीय जरूरतों के अनुरूप अधिक सक्षम और विश्वसनीय बन सकें। राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) की भूमिका का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह विभिन्न क्षेत्रों में समयबद्ध और लचीली वित्तीय सहायता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, और इस दिशा में आगे भी प्रयास जारी रहेंगे।बहु-राज्य सहकारी संस्थाओं के संदर्भ में सचिव ने राज्यों से आग्रह किया कि वे उपलब्ध प्लेटफॉर्म और सेवाओं का सक्रिय रूप से उपयोग करें, जिनमें विपणन, ब्रांडिंग और गुणवत्तापूर्ण इनपुट शामिल हैं, ताकि सहकारी सदस्यों को अधिकतम लाभ मिल सके। डेयरी क्षेत्र में उन्होंने सहकारी संरचनाओं को मजबूत करने और मूल्य श्रृंखला में किसानों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया, जिससे सहकारी मॉडल का पूरा लाभ जमीनी स्तर तक पहुंचे। उन्होंने राज्यों से सफल और टिकाऊ सहकारी मॉडलों को अपनाने और उन्हें स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार लागू करने का भी आह्वान किया।उभरती सहकारी डिजिटल पहलों का उल्लेख करते हुए डॉ. भुटानी ने ‘भारत टैक्सी’ का विशेष रूप से जिक्र किया और कहा कि स्थापित निजी एग्रीगेटर्स की कड़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद यह प्लेटफॉर्म लगातार अपना विस्तार कर रहा है। उन्होंने बताया कि लखनऊ, मुंबई और नासिक जैसे शहरों में सॉफ्ट लॉन्च शुरू हो चुके हैं और आने वाले वर्षों में इसे राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने की योजना है, जो सहकारी आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है।विचार-विमर्श का सार प्रस्तुत करते हुए सहकारिता सचिव ने कहा कि सम्मेलन में सुधारों के अगले चरण के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की स्पष्ट पहचान की गई है, जिनमें फंड के बेहतर उपयोग, सहकारी बैंकिंग प्रणाली को मजबूत करना, एनसीडीसी के माध्यम से क्षेत्रीय वित्तपोषण को बढ़ाना, सहकारी संस्थानों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना तथा डेयरी एवं संबद्ध क्षेत्रों में योजनाओं के क्रियान्वयन को गति देना शामिल है। उन्होंने कहा कि भविष्य की प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि जमीनी स्तर पर संस्थानों, संसाधनों और क्रियान्वयन तंत्र के बीच कितना प्रभावी तालमेल स्थापित किया जाता है, जिससे सहकारी सदस्यों को प्रत्यक्ष लाभ मिल सके।सम्मेलन का एक प्रमुख फोकस सहकारी बैंकिंग संस्थानों के विविधीकरण और आधुनिकीकरण पर रहा, जिसमें जिला केंद्रीय सहकारी बैंक (DCCBs), राज्य सहकारी बैंक (StCBs) और शहरी सहकारी बैंक (UCBs) शामिल हैं। चर्चाओं में इनके व्यवसायिक दायरे को बढ़ाने, PACS के माध्यम से ऋण वितरण को सुदृढ़ करने और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के उपयोग से कार्यक्षमता एवं पहुंच बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया गया। साथ ही अल्पकालिक एवं दीर्घकालिक ऋण के संतुलन, साइबर सुरक्षा को मजबूत करने और तकनीक आधारित समाधानों को अपनाने पर भी विशेष जोर दिया गया, ताकि सहकारी बैंक बदलती वित्तीय आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक सक्षम बन सकें।सम्मेलन में राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) द्वारा एक विशेष सत्र आयोजित किया गया, जिसमें किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), मत्स्य, चीनी, खाद्य प्रसंस्करण और गहरे समुद्र में मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में वित्तीय सहायता के विस्तारित अवसरों की जानकारी दी गई। इस सत्र में राज्यों और सहकारी संस्थानों से उपलब्ध वित्तीय संसाधनों का अधिकतम उपयोग करते हुए सहकारी उद्यमों को विस्तार देने और स्थायी आजीविका के अवसर सृजित करने पर जोर दिया गया।‘सहकारिता में सहकार’ विषय पर हुई चर्चाओं में PACS, डेयरी सहकारी संस्थानों, फेडरेशनों और सहकारी बैंकों के बीच बेहतर एकीकरण पर बल दिया गया, जिससे वैल्यू चेन को अधिक कुशल बनाया जा सके और आर्थिक व्यवहार्यता को सुदृढ़ किया जा सके। इसी क्रम में श्वेत क्रांति 2.0 पर हुई चर्चाओं में दुग्ध संग्रहण बढ़ाने, डेयरी अवसंरचना को मजबूत करने और सहकारी आधारित मूल्य श्रृंखलाओं का विस्तार करने पर जोर दिया गया, जिसमें राज्यों और प्रमुख डेयरी संस्थानों की सक्रिय भागीदारी रही।राज्यों के सफल अनुभवों पर आधारित एक विशेष सत्र, विशेषकर उत्तर प्रदेश के ‘सहकार से समृद्धि’ मॉडल, में जिला स्तर पर नवाचारों और विस्तार योग्य मॉडलों को प्रस्तुत किया गया। इस सत्र में यह रेखांकित किया गया कि प्रशासनिक समन्वय, संस्थागत तालमेल और स्थानीय नेतृत्व के माध्यम से सहकारी क्षेत्र में प्रभावी और मापनीय परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। वहीं ‘सहकार संवाद’ सत्र के माध्यम से सफल सहकारी संस्थानों, एफपीओ, फेडरेशनों और वित्तीय संस्थानों के बीच जमीनी अनुभवों, चुनौतियों और नवाचारों का आदान-प्रदान हुआ।मीडिया एवं संचार रणनीति पर आयोजित एक विशेष सत्र में सहकारी क्षेत्र से जुड़ी सकारात्मक कहानियों को व्यापक रूप से प्रसारित करने, जन-जागरूकता बढ़ाने और “Perform and Inform” दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया गया, ताकि सहकारी मॉडल के प्रति विश्वास और सहभागिता को मजबूत किया जा सके।सम्मेलन का समापन इस साझा संकल्प के साथ हुआ कि केंद्र, राज्य और सहकारी संस्थान मिलकर सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाएंगे, क्रियान्वयन तंत्र को और सुदृढ़ करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि सहकारिता से जुड़ी पहलें ग्रामीण समुदायों और व्यापक अर्थव्यवस्था के लिए ठोस और दीर्घकालिक परिणाम लेकर आएं।







