अमित पांडे: संपादक
बनारस की गलियों में जो हंसी-ठिठोली, बहस और मस्ती कभी थमती नहीं थी, वह अब महज़ सन्नाटे में बदल गई है। परवतीया, जो अस्सी चौराहे पर अपने बच्चों के साथ पकौड़े बेचती थी, अब अपने ठेले के पास बैठी है लेकिन चूल्हा जलाने के लिए गैस नहीं है। चाय-सुट्टा बार खाली पड़ा है, पप्पू की चाय पर होने वाली बहसें थम गई हैं। यह सन्नाटा केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि आर्थिक गवाही है।
जनवरी 2026 में भारत की महंगाई दर 2.75% तक पहुँच गई, जो आठ महीनों में सबसे ऊँची थी। खाद्य महंगाई 2.13% तक बढ़ गई और व्यक्तिगत देखभाल की वस्तुओं की कीमतें लगभग 19% तक उछल गईं। आँकड़े भले ही मामूली लगें, लेकिन असलियत यह है कि गरीब आदमी, जो अपनी आय का अधिकांश हिस्सा भोजन और ईंधन पर खर्च करता है, सबसे ज़्यादा दबाव में है।
बेंगलुरु में 30% होटल बंद हो गए, मुंबई में 50% और कोलकाता में भी लगभग यही हाल है। वाराणसी में पर्यटन का चरम मौसम रद्दीकरण और खाली कमरों में बदल गया। दुकानदार, कारीगर और गाइड सबकी रोज़ी-रोटी छिन गई। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हॉस्टल कैंटीन भी संकट में हैं—थाली की कीमत बढ़ाएँ तो छात्र नहीं झेल पाएँगे, और अगर वही कीमत रखें तो मालिक टिक नहीं पाएगा।
युद्ध ने केवल स्थानीय नहीं, वैश्विक संकट पैदा किया है। होरमुज़ की खाड़ी, जहाँ से भारत की 87% ऊर्जा आयात होती है, ईरान ने रोक दी है। फ्रांस और अमेरिका ने रास्ता खोलने की कोशिश की, लेकिन भौगोलिक संरचना बड़ी नौसैनिक ताक़तों को रोक देती है। ईरान की छोटी-फुर्तीली नौकाएँ छिपकर हमला करती हैं। इज़राइल ने ईरान के डिस्टिलेशन प्लांट पर हमला किया, और जवाबी कार्रवाई में तेल कुओं और रिफ़ाइनरी पर हमले शुरू हो गए। नतीजा यह हुआ कि अरब दुनिया का लगभग 70% तेल उत्पादन ठप हो गया।
भारत, जो अमेरिकी दबाव में रूस से दूरी बना चुका था, अब मजबूरी में उसी रूस पर निर्भर है। लेकिन रूस इसे व्यापार मानता है, दोस्ती नहीं। वह अंतरराष्ट्रीय कीमत से 4 डॉलर अधिक वसूल रहा है। अमेरिका, जिसने पहले भारत को रूसी ऊर्जा खरीदने से रोका था, अब चुपचाप अनुमति दे रहा है। यह विरोधाभास स्पष्ट है—कल जो मना था, आज वही ज़रूरी है।
परिणाम भारत के लिए विनाशकारी हैं। छोटे उद्योग बंद हो रहे हैं, फैक्ट्रियाँ ईंधन के बिना चल नहीं पा रही हैं। मज़दूर, खासकर दिहाड़ी पर काम करने वाले, बेरोज़गार हो रहे हैं। सबसे ज़्यादा चोट उन पर है जो रोज़ कमाते और रोज़ खाते हैं।
वैश्विक बाज़ार भी हिल गया है। तेल की कीमतें फरवरी 2026 से 25% बढ़ चुकी हैं। IMF ने चेतावनी दी है कि वैश्विक वृद्धि 1.2% तक घट सकती है। डॉव जोन्स 8% गिरा, लंदन का FTSE 6% और एशियाई बाज़ारों में 5–7% की गिरावट आई। भारत में सेंसेक्स तीन हफ़्तों में 9% गिरा और ₹15 लाख करोड़ की संपत्ति मिट गई। रुपया 85 प्रति डॉलर तक गिर गया।
पर्यटन, जो भारत की अर्थव्यवस्था का नया इंजन बन रहा था, चरम मौसम में ही टूट गया। वाराणसी में 40% बुकिंग रद्द हो गईं। मंत्रालय ने अनुमान लगाया कि केवल पहली तिमाही में ही ₹12,000 करोड़ का नुकसान हुआ है।
कृषि भी संकट में है। फसल कटने के बाद भंडारण और परिवहन के लिए तेल चाहिए, लेकिन संकट ने इसे असंभव बना दिया है। भंडार कुछ समय राहत देंगे, लेकिन बढ़ती लागत नियंत्रण से बाहर जा रही है।
संसद में समाधान खोजने के बजाय आरोप-प्रत्यारोप पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। हैदराबाद विश्वविद्यालय ने ऊर्जा संकट के कारण दो सप्ताह की छुट्टी घोषित कर दी। आम आदमी, जिसके पास केवल छोटी रोज़ी-रोटी है, पूरी तरह असहाय है।
चार्ल्स डिकेन्स ने डेविड कॉपरफ़ील्ड में लिखा था कि डॉलर को पैनी में बदलकर धन को बड़ा दिखाया जा सकता है। आज वही भ्रम अर्थव्यवस्था पर छाया है। आँकड़े सजाए जा सकते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि महंगाई, बंद कारखाने और बेरोज़गारी को छिपाया नहीं जा सकता।
निष्कर्ष साफ़ है: युद्ध ने तेल को हथियार बना दिया है और पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को लहूलुहान कर दिया है। भारत, जो पर्यटन और आयात पर निर्भर है, महंगाई, गिरते बाज़ार और टूटते उद्योगों के बोझ तले दब गया है। बनारस की ख़ामोशी केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि आर्थिक प्रतीक है—एक राष्ट्र की हंसी, बहस और रोज़ी-रोटी सब उस आग में जल रही है जो दूर तेल कुओं से उठी है।







